कमेन्टरी - गुरचरण दास

गुरचरण दास

इस पेज पर गुरचरण दास के लेख दिये गये हैं। उनके लेख विभिन्न भारतीय एवं विदेशी शीर्ष पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते हैं। इसके अलावा उन्होने कई बेस्टसेलर किताबें भी लिखी हैं।

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राजनीति थोड़े वक्त का खेल होता है, जबकि अर्थव्यवस्था लंबे समय का। दोनों आखिर में मिलते हैं, लेकिन बीच के समय में वे विपरीत दिशाओं में जाते लगते हैं। इस विरोधाभास के कारण ज्यादातर लोगों का निराश होना अपरिहार्य है। अपनी सरकार की पहली वर्षगांठ पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यही समस्या है। अच्छे रिकॉर्ड के बावजूद वे अपने समर्थकों की असाधारण रूप से ऊंची अपेक्षाओं को मैनेज करने में नाकाम रहे। मुख्य प्राथमिकताओं पर निगाह न रख पाने से योजनाएं अमल में लाने की उनकी
Published on 1 Jun 2015 - 19:58
गर्मी की छुटि्टयां और भारतीय रेल का अटूट संबंध रहा है। हर भारतीय मन में रेलवे को लेकर छुटि्टयों में की गई यात्रा की कोई न कोई रूमानी याद जरूर होती है। आज ये रूमानी यादें धुंधला गई हैं, क्योंकि सत्तारूढ़ नेताओं ने इसके साथ निजी जागीर जैसा व्यवहार कर इसे कुचल डाला है। रेलवे भारतीय व्यवस्था का लघु रूप है- अक्षम, भ्रष्ट, राजनीतिकरण से बेजार, गैर-जरूरी स्टाफ के बोझ से चरमराती असुरक्षित सेवा। सरकारी एकाधिकार और धन-आवंटन में राजनीति के कारण निवेश व टेक्नोलॉजी के लिए पैसे की तंगी इसकी मूल समस्या
Published on 28 Apr 2015 - 20:29
किसी भी राष्ट्र की उन्नति की दिशा में एक महान और आकर्षक कदम है, उसका गरीबी से समृद्धि और पारम्परिकता से आधुनिकता की ओर बढ़ना। 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद भारत अभी हाल ही में सनसनीखेज रूप से मुक्त बाजार तंत्र के रूप में उभरा है और इसने विश्वव्यापी सूचना अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में खुद को बढ़ाना और फैलाना शुरू कर दिया है। औद्योगिक क्रान्ति को पिछले पचास वर्षों से निरंतर घुन की तरह चाटने वाला 'पुराना केन्द्रीय नौकरशाही शासन' अब धीमी गति से ही सही किन्तु निश्चित तौर पर अन्त की ओर बढ़
Published on 10 Mar 2015 - 20:19

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