अक्षरों के चोर...
इतवार का दिन और दिल्ली में पुस्तक मेला, मुझे वैसे भी पढ़ने-लिखने का थोड़ा शौक रहा है, तो बस मैं पुस्तक मेले के लिए रवाना हो गया। मेरा ऑटो ज्यों ही एक रेड लाइट पर रुका, तो क्या देखता हूं फटेहाल एक किशोर हाथ में कुछ किताबें थामे एकदम मेरे सामने आ गया। उसके पास अरविंद अडिगा की बूकर पुरस्कार प्राप्त व्हाइट टाइगर, चेतन भगत की टू स्टेट्स, फाइव प्वाइंट समवन, अमर्त्य सेन की आर्ग्यूमेंटेटिव इंडियन और स्टेफनी मायर की ट्विलाइट तथा न्यू मून सरीखी कई किताबें उसके पास थीं। मुझसे रहा न गया और मैंने उसे अपने पास बुलाया तो किताबें अपनी असल कीमतों की अपेक्षा आधे से भी कम दामों पर थीं और असली की नकल थीं।
खैर, मैंने कोई किताब खरीदी तो नहीं लेकिन मन थोड़ा अस्थिर हो गया। मुझे उस किताब बेचने वाले लड़के पर कोई गुस्सा नहीं आया, क्योंकि औने-पौने दाम पर किताबें बेचने वाला रोजी-रोटी के खेल में यह नहीं जानता था कि वह ये किताबें इस तरह बेच कर किस गुनाह का भागीदार है. लेकिन इसे व्यवस्था की ही खामी कहा जा सकता है, एक ऐसी रेड लाइट जिस पर पुलिसकर्मी भी खड़े हैं और गैर-कानूनी काम करने वाले भी। किताबें ही नहीं आप नई-नई फिल्मों की पाइरेसी होते हुए सरेआम देख सकते हैं. अक्सर पुलिस सिर्फ नाममात्र के लिए कुछ लोगों को पकड़ लेती है, लेकिन असली लोग पुलिस की गिरफ्त से काफी दूर ही रहते हैं।
बौद्धिक संपदा से जुड़े कानून हमारे यहां किताबों के भीतर ही दबे रहते हैं उन्हें लागू करने वाले या तो इस गैरकानूनी धंधे का हिस्सा हैं या फिर वे आंख मूंद कर बैठे हैं. अगर व्यापक दृष्टिकोण से देखा जाए तो इस सारे काम को बहुत ही सुनियोजित तरीके से अंजाम दिया जाता है, लेकिन हमारा पुलिस प्रशासन तो इस ओर से आंखे ही मुंदे हुए है।
- ऐसे में पाइरेसी के इस बढ़ते धंधे को लेकर आप क्या कहते है?
- आप इस बात से सहमत हैं कि सरकार ने इस ओर से पूरी तरह आंखें मूंदी हुई हैं?
- क्या आप इसे गंभीर अपराध मानते हैं?
