'आज़ादी समर्थक अभियान' की पैट्री फ्रीडमैन द्वारा की गई आलोचना मूलतः सही है। कम से कम तीस साल हो गए जबकि शैक्षिक अर्थशास्त्र में मुक्त-बाजार के विचार का वर्चस्व रहा है। आज़ादी समर्थक विचारकों के पास पर्याप्त धन है और प्रभाव भी। इन तमाम प्रोत्साहक घटनाओं के बाद भी सरकार का कुल आकार बढ़ता ही जा रहा है। अमेरिका में दोनों ही राष्ट्रीय दल, वाकई शब्दों में न सही काम के लिहाज से तो सरकार के आकार को बढ़ाने और आज़ादी को कम करने के ही काम के प्रति समर्पित हैं। सही विचार और उनके प्रभावी तरीके से प्रचार ने राजनीति में पर्याप्त बेहतर परिवर्तन नहीं किए हैं। हमें विचार और उनका उचित तरीके से प्रचार की जरुरत है, लेकिन केवल इतनी ही रणनीति पर्याप्त नहीं होगी।

यह दावा गलत होगा कि विचारों का कोई मायने नहीं होता या लोकतांत्रिक राजनीति आज़ादी को प्रोत्साहन देने में हमेशा ही नाकाम होती है। एक उल्लेखनीय ऐतिहासिक उदाहरण ब्...

पैट्री के तर्कों में निजी विचारों की खासी झलक है। मैं उनके लक्ष्य को साझा करता हूं, उनकी एक ज्यादा मुक्त समाज में रहने की कोशिश को भी। वे जिसे 'लोक अभियान (folk activism)' कहते हैं और जिसे निश्चित तौर पर उम्मीदहीन बताकर खारिज करते हैं-उसे मैं अपनाता हूं। मेरे पूरे पेशेवर कैरियर में मैंने पत्रकारिता की है, इसमें अधिकांश हिस्सा परोक्ष या अपरोक्ष तौर पर आज़ादी का ही संदेश लिए रहा है।

पैट्री की ही तरह मैं भी कुछ छोटे समुदाय बनाने के तात्कालिक प्रयास करता रहा हूं। ऐसे समुदाय जो, ज्यादा आज़ादी और कम बाहरी नियंत्रण के कारण, विशिष्ट अमेरिकी जीवन से अलग होते हैं। कम से कम प्रयोगात्मक समुदाय/कला समारोह बर्निंग मैन के लिहाज से। इस साझा नजरिये और अनुभव से मैं इस बात को लेकर निश्चित (certain) हूं कि पैट्री सकारात्मक तौर पर सही है-केवल उन जगहों को छोड़कर जहां मुझे यकीन है कि वे गलत हैं।

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भूमिकाः भविष्य के एक नाटकीय आदर्शलोक या थोड़ी सी आज़ादी हासिल करने की बजाय वास्तविक तौर पर मुक्त समाज में रहना मेरी दिली तमन्ना है। मैं इस खयाली पुलाव के साथ आज़ादी की वकालत करता रहा कि महज इससे ही यह संभव हो जाएगा। हालांकि, हाल ही में मैंने मुक्त समाज बनाने को अपना पूर्णकालिक काम बना लिया है और इससे मुझे अपने आरामकुर्सी में बैठकर हासिल दर्शन की बनिस्बत एक नया नाटकीय नजरिया मिला है। मेरा नया नजरिया यह है कि कई आज़ादी के समर्थकों, समूहों और थिंक टैंकों (और दुखद तौर पर कई बार मुझे मिलाकर) का समर्थन का रास्ता कुछ और नहीं बस समय की बर्बादी है।

बहस ने हमारे सिद्धांतों को और अधिक तराश दिया है। शैक्षिक अनुसंधान ने हमारी समझ का दायरा विस्तृत कर दिया है। लेकिन जहां तक वास्तविक मुक्त देश की कल्पना है तो वह अभी भी हकीकत से दूर ही है। हमारी बहस न केवल एक तय रणनीति से आती है बल्कि इसके पीछे हमारा सहज अंतर्ज्ञ...

क्यों बातें बेहतर होने पर ज्यादा खराब लगने लगती हैं?

अर्थशास्त्र के पेशे में इस बात को लेकर कोई शक नहीं है कि आय असमानता को लेकर आम सोच दिशाहीन करने वाली है। साथ ही इस बात के भी पक्के प्रमाण हैं कि अब तक जिन रुझानों का अध्ययन किया गया है, वे वास्तविक असमानता में इजाफे को कुछ ज्यादा ही बढ़ा-चढ़ाकर बताते हैं। विल (विलकिंसन) ने इस क्षेत्र में इनमें ज्यादा महत्वपूर्ण ताजा जानकारियों को संक्षेप में अच्छी तरह से पेश किया है। वह यह कह सकते थे कि जब घर बनाम व्यक्ति (लोग आजकल अकेले रहने के लिहाज से ज्यादा सक्षम/इच्छुक हैं, जिससे औसत में गिरावट हो सकती है) की तुलना करने पर तो असमानता और अधिक गुमराह करने वाली हो सकती है या फिर ज्यादा आप्रवास (कम आय वाले अप्रवासी हो सकता है कि स्थानीय लोगों की आय में इजाफे का आभास दें, लेकिन हो सकता है कि वे आय के वितरण को बढ़ाकर मापे गए औसत को और कम कर दें) मामले को उलझा सकता है या फिर...

उपलब्ध सर्वश्रेष्ठ आंकड़ों के मुताबिक 1979 में  कर कटौती के बाद अमेरिकी निवासियों के शीर्ष एक फीसदी लोगों की औसत आय लगभग 340,000 डॉलर थी। 2006 तक यही आय बढ़कर 1,200,000 डॉलर तक पहुंच गई थी। इसकी तुलना में निचले 60 फीसदी घरों में औसत आय में 1979 के 29,000 डॉलर की तुलना में हल्का सा इजाफा होकर यह 35,000 डॉलर हो सकी। इस दौरान कुल कमाई के लिहाज से जहां शीर्ष एक फीसदी की आय 7 फीसदी से बढ़कर 16 फीसदी हो गई, वहीं निचले तीन स्तरों के लोगों की आय 36 फीसदी से गिरकर 28 फीसदी हो गई। यह आय असमानता में पर्याप्त बढ़ोत्तरी है। बहुत कम ही सामाजिक वैज्ञानिक इस हकीकत से इनकार करते हैं। उनके बीच की बहस का मुद्दा लक्षणों, समय, आकार और कारणों तक ही सीमित होती है।

लेकिन इस बात को लेकर काफी कम सहमति है कि क्या, और अगर ऐसा है तो कितने स्तर तक, हमें इस घटनाक्रम को लेकर चिंतित होना चाहिए। असमानता को लेकर संदेहवादियों...

मैं विल विलकिनसन की इस बात से सहमत हूं कि अगर अलग से सोचा जाए तो समाज में आय का वितरण हमें इस बारे में ज्यादा कुछ नहीं बता पाता कि समाज न्यायपूर्ण है या अन्यायपूर्ण। फिर भी एक समतावादी होने के नाते मैं सोचती हूं कि जब एक कारण के संदर्भ में सोचा जाता है तो धन और आय का काफी महत्व होता है। आर्थिक असमानता उस वक्त आपत्तिजनक हो जाती है जब यह लोगों, खासतौर पर कमजोर तबके को बेहतर हालात में रहने की स्थितियों के बावजूद बुरे हालात में रहने पर मजबूर करती है। यह उस वक्त भी आपत्तिजनक है जब साफ दिखाई देता है कि सरकार का झुकाव भी बेहतर तबके की ओर ही है। अमेरिका में तो आर्थिक असमानता इन दोनों ही कारणों से आपत्तिजनक है।

आर्थिक असमानता के लोगों की बेहतरी में सेंध लगाने के कई तरीके हैं। (मैं यह दावा नहीं करती कि दूसरों के बेहतर होने की केवल जागरुकता ही लोगों को बुरा बना देती हैः मैं वास्तविक शिकायत को ईर्ष्या का कार...

बराक ओबामा के चुनाव से पहले आय में असमानता एक गर्म मुद्दा था। इसका ज्यादातर श्रेय न्यूयॉर्क टाइम्स के दमदार स्तंभकार और अर्थशास्त्र के नोबल पुरस्कार विजेता पॉल क्रुगमैन को जाना चाहिए। अमेरिका में आय में असामनता को लेकर उनकी चेतावनी भरी आक्रामक किताब द कांशंस ऑफ ए लिबरल ने इस विषय को जनता के बीच काफी लोकप्रिय बना दिया, जो ओबामा के पद संभालने के बाद और मंदी के पैर जमा लेने के बाद काफी शांत हो गया था। क्रुगमैन का तर्क है कि आय में बढ़ते अंतर कारण ढांचागत समस्या नहीं मुख्य तौर पर राजनीतिक है। इस स्थिति में सुधार के लिए राजनीतिक खासतौर पर पुनर्वितरण से जुड़े कदम की जरुरत है। शायद एक डेमोक्रेटिक राष्ट्रपति और वाशिंगटन में कांग्रेस में बहुमत के कारण ही क्रुगमैन जैसे समतावादी उदारवादियों (egalitarian liberal) में यह भाव पैदा हुआ होगा कि मामला अब सक्षम हाथों में है और वक्त आने पर इस पर ध्यान दिया जाएगा। लेकिन अब जबकि बेरोजगारी और बढ़ती गरीब...

डेविड श्मिट्ज और जेसन ब्रेनन के आलेख “आज़ादी की अवधारणाएं” पर फिलिप पेटिट की प्रतिक्रिया

इसैया बर्लिन (Isaiah Berlin) द्वारा प्रसिद्ध बना दिए गए शब्दों को इस्तेमाल करके और इसमें तोड़-मरोड़ की बात को भी स्वीकारते हुए जेसन ब्रेनन और डेविड श्मिट्ज, नकारात्मक और सकारात्मक आज़ादी के बीच अंतर के जिक्र के साथ अपनी बात शुरु करते हैं। आपके पास 'एक्स' काम करने की नकारात्मक आज़ादी होती है जब कोई आपका ऐसा करने में विरोध नहीं करता, भले ही विरोध चाहे जो हो; आपके पास 'एक्स' काम करने की सकारात्मक आज़ादी (या प्रभावी) होती है और साथ में आपके पास यह काम करने की क्षमता भी होती है। वे इस मिथक को भी, जो कि उनको दिखाई देता है, तोड़ने की कोशिश करते हैं कि आज़ादी की ये दो संकल्पनाएं सरकार की भूमिका की दो संकल्पनाओं के साथ जोड़ी बनाती हैं, क्रमशः दक्षिणपंथी और वामपंथी। चूंकि ये संकल्पनाएं या धारणाएं इस तरह से जोड़ी नहीं बना पाती सो वे कहते ह...

डेविड श्मिट्ज और जेसन ब्रेनन के आलेख “आज़ादी की अवधारणाएं” पर जॉन क्रिसमैन की प्रतिक्रिया

जेसन ब्रेनन और डेविड श्मिट्ज के बेहद रोचक निबंध के कई अंतर्निहित विचारों में से एक यह है कि नकारात्मक और सकारात्मक आज़ादी विचारों का एक समूह है न कि विभाजन। इसी तरह वे ध्यान दिलाते हैं कि, मेरी सोच से सही भी है, नागरिकों को दी जाने वाली आज़ादी के स्तर और प्रकार का फैसला केवल वैचारिक विश्लेषण से ही नहीं किया जा सकता, और (उन शब्दों में जिनका वो इस्तेमाल नहीं करते) आज़ादी एक ऐसा विचार है जिसे चुनौती दी जा सकती है और इसलिए इसका इस्तेमाल राजनीतिक विवादों के निपटारे के लिए नहीं किया जा सकता। क्योंकि ऐसे विवादों के कारण ही इस विचार को लेकर विरोधाभासी विचार जन्म लेते हैं। लेखकों का मुख्य मुद्दा, हालांकि यह है कि कथित नकारात्मक और सकारात्मक आज़ादी के विचारों में वैचारिक अंतर को ज्यादा जरुरी अनुभव आधारित सवाल...

डेविड श्मिट्ज और जेसन ब्रेनन के आलेख “आज़ादी की अवधारणाएं” पर टॉम जी. पामर की प्रतिक्रिया

मेरी राय में इस चर्चा के लिए चुना गया प्रमुख निबंध “आज़ादी की अवधारणाएं” शिक्षाप्रद नहीं उकसाने वाला है। मैं पहले ही इस बात को स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि मैं डेविड श्मिट्ज को पसंद करता हूं, उनका सम्मान करता हूं और उनका प्रशंसक भी हूं, उनको मैं जानता हूं और उनसे मैंने कई सालों तक सीखा है। साथ ही हाल ही में ही मैंने मैकगिल यूनिवर्सिटी में जेसन ब्रेनन के साथ लेक्चर दिया है, जिनसे मैं पहली बार मिला था। वहां उनकी प्रस्तुति ने एक बात साफ कर दी कि वे एक गंभीर विचारक हैं। मैं यह इसलिए लिख रहा हूं क्योंकि हालांकि मैं खुद को इन दोनों के योगदान पर चर्चा में शिरकत के कारण भाग्यशाली समझता हूं, लेकिन मेरी टिप्पणियां इनके खिलाफ होंगी और मैं इस बात पर भी जोर देना चाहूंगा कि विरोधी टिप्पणियों का मतलब द्वे...