ममता बनर्जी की नजर भले ही कोलकाता की 'राइटर्स बिल्डिंग' पर रही हो पर रेलमंत्री के तौर पर उन्होने अपना जो 'विजन' सामने रखा उससे कम से कम ऐसा लगा था कि वह रेलवे के बारे में बहुत ही संजीदगी से सोचती हैं। दिसंबर 2009 में जारी “विजन 2020 डॉक्यूमेंट” को ध्यान में रखते हुए उन्होंने कई प्रावधान किए हैं लेकिन रेल बजट में कहीं-कहीं गुंजाइश रह गई है।

कहा जा सकता है कि इस बार रेल मंत्री के पास एक मौका था, लोकलुभावन से हटकर रेल को विकास के पथ पर कदम ताल मिलाने का मौका देने का क्यो...

शिक्षा का सबसे असरदार ढंग यही है कि बच्चों को प्यारी चीजों के बीच में खेलने दिया जाए.”

- प्लेटो, महान ग्रीक दार्शनिक

नन्हें फूलों को अच्छे से खिलने पर जोर देते हुए यह कहा था प्लेटो ने। लेकिन मौजूदा परिस्थितियों पर नजर डालें तो पता चलता है कि दुनिया भर में बच्चे भयानक माहौल और खतरनाक परिस्थितियों में जीवन गुजारने पर मजबूर हैं। इस संदर्भ में. हाल ही में पेश संयुक्त राष्ट्र शैक्षणिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (...

क्लाइमेटगेट-1 ने यह खुलासा किया था कि ईस्ट एंजेलिया यूनिवर्सिटी में ग्लोबल वार्मिंग के खिलाफ जंग छेड़ने वाले जलवायु वैज्ञानिकों ने किस तरह से अपने खिलाफ जाने वाले आंकड़ों को रोककर शैक्षिक पत्रिकाओं में अपने खिलाफ आवाज उठाने वालों का गला घोंटने की कोशिश की थी। क्लाइमेटगेट-2 ने एक और सनसनीखेज खुलासा किया है कि जलवायु परिवर्तन पर अंतरराष्ट्रीय पैनल (आईपीसीसी) ने 2007 की रिपोर्ट में हिमालय के ग्लेशियरों के 2035 तक पिघलने का जो दावा किया था वह विज्ञान नहीं बैठे ठाले अंधेरे में चलाया गया एक तीर था।

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दुनिया जबकि साम्यवाद के पतन की 20वीं वर्षगांठ मना रही है, कई विश्लेषकों को याद होगा कि कैसे सोवियत नीतियों की नाकामी ने सरकार को उत्पादन पर ज्यादा अधिकार दे दिया था और साम्राज्यवादी जाल की संज्ञा देकर कैसे विदेश व्यापार और निवेश को हतोत्साहित किया जाता था। भारत जैसे विकासशील देशों ने भी ऐसी ही नीतियों को अपनाया था, जो साम्यवादी नहीं समाजवादी थे। 1930 के दशक में सोवियत संघ द्वारा हासिल आर्थिक मजबूती का भारत कायल था। दरअसल वह दौर पश्चिमी देशों में महामंदी का था।

भारत को 1947 में जाकर आज...

अपनी स्थापना के समय से ही पाकिस्तान एक संवैधानिक संकट से गुजर रहा है और गहरी जड़ों में समाई अन्य समस्याओं की तरह ही इससे निजात पाने में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा। फिर भी, पाकिस्तान को आज़ादी और समृद्धि की दिशा में आगे बढ़ने के लिए इस संकट से हर हाल में उबरना होगा।

भारत की आज़ादी के कुछ समय बाद ही, मुस्लिम लीग ने धार्मिक पहचान के आधार पर पृथकतावादी स्थिति की दिशा में कदम बढ़ाने शुरु कर दिए, उनका तर्क था कि वे मुस...

एक सदी से ज्यादा वक्त हो गया अर्थशास्त्री आदर्श मुद्रा को बनाने या उसे ईजाद करने में जुटे हुए हैं। ऐसी मुद्रा के विस्तृत स्वभाव को लेकर किन्हीं दो अर्थशास्त्रियों तक में सहमति दिखाई नहीं देती। लेकिन फिलहाल वे इसके एक नकारात्मक बिंदु पर तो सहमत दिखाई देते हैं। मुझे शक ही है कि शायद ही कोई अर्थशास्त्री होगा जो अंतरराष्ट्रीय या अमेरिकी मुद्रा प्रणाली का आज की स्थिति में बचाव करना चाहेगा।

हर रोज और घंटे दर घंटे भारी उतार-चढ़ाव देखने वाली विनिमय दर का कोई खुले तौर पर बचाव नहीं करता। भविष्य के...

अब जबकि क्लाइमेट गेट ने जलवायु परिवर्तन के मूल को लेकर चर्चा में तेजी ला दी है। यह सवाल भी उठ खड़ा हुआ है कि आखिर विज्ञान क्या है? यहां कोपेनहेगन में मौजूद नीति निर्धारकों के लिए कुछ विचार पेश हैं।

विज्ञान आलोचना के जरिए ज्ञान हासिल करने की एक प्रक्रिया है। सिद्धांत पेश किए जाते हैं और उनको परखा जाता है और जिनमें खामियां होती हैं, उनको या तो खारिज कर दिया जाता है या फिर उनका नए सिरे से अध्ययन किया जाता है। इस तरह से विज्ञान परीक्षण-गलती-सुधार की प्रक्रिया से होते हुए प्रगति करता...

इस सवाल का जो लगभग अनबूझ जवाब मैंने दिया है उसका महत्व समझने में कुछ पल का वक्त लगेगा, मैं यह कह रहा हूं कि स्कूलों के बीच प्रतिस्पर्धा संबंधित स्कूलों, परिवारों और कुल मिलाकर समाज के लिए या तो अच्छी हो सकती है या फिर बुरी। यह सब परिस्थितियों पर निर्भर है, जिसमें कानून और नीतियों का वह ढांचा भी है जिसके तहत यह प्रतिस्पर्धा हो रही है।

यह बात सामान्य-सी लग सकती है, लेकिन स्कूलों की प्रतिस्पर्धा और बच्च...

भारत शोध और विकास के मुख्य केंद्र के रूप में उभर रहा है, लेकिन क्या यह सिलीकॉन वैली से आगे निकल पाएगा?

जब अमेरिकी भारत के टैक्नोलॉजी सेक्टर के बारे में सोचते हैं, उनके दिमाग में आज भी भारत की छवि एक ऐसे देश के रूप में उभरती है जहां कॉल सेंटर कर्मचारी और निचले दरजे के कंप्यूटर प्रोग्रामर हैं जो डाटाबेसेस की देखभाल और वेबसाइट्स अपडेट करने जैसे काम करते हैं. लेकिन जब पश्चिम गहरी नींद सो रहा था, भारत...

हम साम्यवाद के धराशायी होने की बीसवीं सालगिरह की ओर अग्रसर हैं. यह घटना जनता की नुमाइंदगी के साम्यवादी दावे को व्यापक रूप से नकार देती है. फिर भी, ऐसे साम्यवादी दावे अब भी बरकरार हैं जो कभी-कभार युवाओं की नई पीढ़ी को चौंकाते हैं जिन्हें यह मालूम ही नहीं है कि 9 नवंबर 1989 के दिन बर्लिन की दिवार क्यों गिरी.

कार्ल मार्क्स का कहना था, लोकतांत्रिक पूंजीवाद में अमीर अधिक अमीर हो जाते हैं और गरीब ज...