ममता बनर्जी की नजर भले ही कोलकाता की 'राइटर्स बिल्डिंग' पर रही हो पर रेलमंत्री के तौर पर उन्होने अपना जो 'विजन' सामने रखा उससे कम से कम ऐसा लगा था कि वह रेलवे के बारे में बहुत ही संजीदगी से सोचती हैं। दिसंबर 2009 में जारी “विजन 2020 डॉक्यूमेंट” को ध्यान में रखते हुए उन्होंने कई प्रावधान किए हैं लेकिन रेल बजट में कहीं-कहीं गुंजाइश रह गई है।
कहा जा सकता है कि इस बार रेल मंत्री के पास एक मौका था, लोकलुभावन से हटकर रेल को विकास के पथ पर कदम ताल मिलाने का मौका देने का क्यो...

“शिक्षा का सबसे असरदार ढंग यही है कि बच्चों को प्यारी चीजों के बीच में खेलने दिया जाए.”
क्लाइमेटगेट-1 ने यह खुलासा किया था कि ईस्ट एंजेलिया यूनिवर्सिटी में ग्लोबल वार्मिंग के खिलाफ जंग छेड़ने वाले जलवायु वैज्ञानिकों ने किस तरह से अपने खिलाफ जाने वाले आंकड़ों को रोककर शैक्षिक पत्रिकाओं में अपने खिलाफ आवाज उठाने वालों का गला घोंटने की कोशिश की थी। क्लाइमेटगेट-2 ने एक और सनसनीखेज खुलासा किया है कि जलवायु परिवर्तन पर अंतरराष्ट्रीय पैनल (आईपीसीसी) ने 2007 की रिपोर्ट में हिमालय के ग्लेशियरों के 2035 तक पिघलने का जो दावा किया था वह विज्ञान नहीं बैठे ठाले अंधेरे में चलाया गया एक तीर था।
दुनिया जबकि साम्यवाद के पतन की 20वीं वर्षगांठ मना रही है, कई विश्लेषकों को याद होगा कि कैसे सोवियत नीतियों की नाकामी ने सरकार को उत्पादन पर ज्यादा अधिकार दे दिया था और साम्राज्यवादी जाल की संज्ञा देकर कैसे विदेश व्यापार और निवेश को हतोत्साहित किया जाता था। भारत जैसे विकासशील देशों ने भी ऐसी ही नीतियों को अपनाया था, जो साम्यवादी नहीं समाजवादी थे। 1930 के दशक में सोवियत संघ द्वारा हासिल आर्थिक मजबूती का भारत कायल था। दरअसल वह दौर पश्चिमी देशों में महामंदी का था।
एक सदी से ज्यादा वक्त हो गया अर्थशास्त्री आदर्श मुद्रा को बनाने या उसे ईजाद करने में जुटे हुए हैं। ऐसी मुद्रा के विस्तृत स्वभाव को लेकर किन्हीं दो अर्थशास्त्रियों तक में सहमति दिखाई नहीं देती। लेकिन फिलहाल वे इसके एक नकारात्मक बिंदु पर तो सहमत दिखाई देते हैं। मुझे शक ही है कि शायद ही कोई अर्थशास्त्री होगा जो अंतरराष्ट्रीय या अमेरिकी मुद्रा प्रणाली का आज की स्थिति में बचाव करना चाहेगा।

