वर्तमान ही नहीं भविष्य भी अनिश्चित है सुधारों का

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पिछले कुछ समय में यूपीए सरकार की चालढाल देखने के बाद राजनीतिक और आर्थिक क्षेत्रों में यह कहा जा रहा था कि सरकार की निर्णय करने की क्षमता को लकवा मार गया है। कुछ अखबार तो यूपीए को यूनाइटेड पैरालाइजड एलाइंस भी कहने लगे हैं।लेकिन सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु ने जब अमेरिका में एक कार्य़क्रम के दौरान कहा कि अब 2014 के बाद ही आर्थिक सुधार हो पाएंगे तो बवाल मच गया। इसका म

शिक्षा का अधिकार कानून के तहत गुजरात ने बनाए नई राह बनानेवाले नियम

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शिक्षा के क्षेत्र में भारत सरकार की महत्वपूर्ण पहल थी शिक्षा का अधिकार कानून 2009।इस क्षेत्र के कई पर्यवेक्षकों और विशेषज्ञों की दलील थी कि  इस कानून में कई प्रमुख समस्याएं हैं।यह कानून बच्चों और अभिभावकों के हितों पर फोकस करने के बजाय सार्वजनिक क्षेत्र के आश्रित सेवा प्रदाताओं के हितों पर फोकस करता है। शैक्षणिक प्रक्रिया के साधनों पर ज्यादा ध्यान देता है भले ही उसके नती

स्वस्थ समाज के लिए नैतिक आधार जरूरी - पामर

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डा.टाम जी पामर पूंजीवादी दर्शन और नैतिकता के मुखर प्रवक्ता के रूप में जाने जाते हैं। वे जितने अच्छे लेखक है उतने ही प्रभावशाली वक्ता भी। उनकी पुस्तक –रियलाइजिंग फ्रीडम : लिबरेशन थ्योरी,हिस्ट्री एंड प्रैक्टिस – उनके  स्वतंत्रता संबंधी विचारों का सशक्त प्रतिपादन है।पामर आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से राजनीति शासत्र में डाक्टरेट की है  और वाशिंगटन स्थित कैटो इं

क्या हम सभ्य हो रहे हैं ?

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पिछले दिनों स्टीवेन पिंकर जयपुर लिटरेरी फेस्टीवल में भाग लेने आए थे जहां उन्होंने अपने भाषण में जो कहा उसका लब्बोलुबाब यह था कि आदमी अब इंसान बनता जा रहा है। भयानक हिंसक युद्ध पहले से कम हो गए हैं और इसके साथ समाज में हिंसा कम होती जा रही है। उनका यह दावा नया नहीं है। उन्होंने अपनी बहुचर्चित पुस्तक – द बेटर एजिंल्स आफ अवर नेचर-व्बाय वायलेंस इज डीक्लाइंड- में भी यही दावा

रूसी ‘चुनाव’ : सिर्फ धांधली का खेल

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चार दिसंबर को रूस में “चुनाव” हुए। मैंने मतदान में हिस्सा नहीं लिया, क्योंकि यह महज समय की बर्बादी थी, जबकि केंद्रीय चुनाव आयोग इसे “स्टेट ड्यूमा के लिए चुनाव” बता रहा था। उस दिन तक यह स्वयंसिद्ध तथ्य की तरह था कि सत्तारूढ़ यूनाइटेड रशिया पार्टी की झोली में 10.8 करोड़ मतदाताओं में से 4.5 से 5 करोड़ वोट गए। अब इसे मजाक बनाया जा रहा है और यहां तक कहा जा

खाद्य बिल बढ़ा सकता है आर्थिक भार

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कैबिनेट ने खाद्य सुरक्षा बिल को रविवार को स्वीकृति दी, लेकिन भारतीय जनसाधारण को सस्ते भोजन की गारंटी देने वाले इस बिल पर मुहर लगना फिलहाल दूर की कौड़ी लगता है। फिर भी यह बिल  अभी से ही उन अर्थशास्त्रियों को भयभीत कर रहा है, जो इसे खास तौर पर इस समय सरकार पर एक बड़े आर्थिक भार के रूप में देखते हैं।

सामाजिक सुरक्षा के लिए चाहिए पुख्ता स्वास्थ्य और शिक्षा व्यवस्था

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भारत और वैश्विक बिरादरी इस बात को लेकर चर्चा करने लगे हैं कि जिस जनसांख्यिकीय मोर्चे पर भारत लाभ की स्थिति में है, देश को इस सदी के मध्य तक उसका लाभ उठाना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या प्रभाग के आंकड़े तो वास्तव में यह दर्शाते हैं कि वर्ष 2040 तक दक्षिण एशिया की कुल जनसंख्या में 15 से 64 साल की आयु वर्ग के कामकाजी समूह की हिस्सेदारी बढऩे वाली है और नवनिर्माण के दौर से गुजर

देर से उठाया गया सही कदम

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अर्थव्यवस्था को मजबूती देने के लिए रिटेल सेक्टर में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को दी गई अनुमति देर से उठाया गया एक सही कदम है। पिछले दस वर्षो से यह उम्मीद की जा रही थी कि सरकार खुदरा क्षेत्र में भी उदारीकरण की नीतियों को लागू करे, क्योंकि दूसरे देशों की तुलना में हमारा रिटेल सेक्टर काफी पिछड़ा हुआ और असंगठित था। अब जबकि औद्योगिक विकास दर धीमी पड़ रही है और महंगाई पर नियंत्रण पाना

प्राइवेट-पब्लिक पार्टनरशिप का सफल नमूना

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पिछले लगभग एक साल के अंतराल में देश में हुए दो बड़े खेल आयोजनों में भारत की दो अलग-अलग तस्वीरें नजर आईं। गत वर्ष अक्टूबर में हुए कॉमनवेल्थ खेलों का आयोजन पुराने भारत के नेता-बाबू गठबंधन द्वारा किया गया था। फॉर्मूला वन ग्रांप्री का आयोजन नए भारत द्वारा स्थानीय निजी उद्यमियों और वैश्विक व्यवसाय के सहर्ष संयोग से किया गया।

भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे कॉमनवेल्थ गेम्स आयोजन के बारे में आम धारणा है कि उसने देश की छवि पर बट्टा लगाया। दूसरी तरफ फॉर्मूला वन के आयोजन को इस तरह देखा जा रहा है कि उसने वैश्विक जाजम पर इंडिया इंकॉपरेरेशन के पदार्पण की पुष्टि कर दी है। तो क्या इसका अर्थ यह निकाला जाए कि राजनेताओं और नौकरशाहों वाले पुराने भारत पर कॉपरेरेट और शो-बिज पॉवर वाले नए भारत ने बढ़त बना ली है?

सांस्थानिक सुधारों का महत्व

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देश के निजी क्षेत्र और उसके मजबूत नागरिक समाज की चाहे जो भी उपलब्धियां रही हों लेकिन इस बात में कहीं कोई संदेह नहीं है कि अगर भारतीय राज्य की स्पष्ट दिखाई दे रही गड़बडिय़ों में सुधार नहीं लाया गया तो देश बहुत आगे तक नहीं जा पाएगा। भारतीय राज्य की जिन प्रमुख कमियों पर ध्यान केंद्रित है वे हैं भ्रष्टाचार का बढ़ता स्तर और देश के सार्वजनिक जीवन बढ़ता बिकाऊपन। निश्चित रूप से इन ची