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मंगलवार, जनवरी 27, 2015
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सरकारी कंपनियों को घाटे से उबारने और उनके प्रदर्शन को बेहतर बनाने का एकमात्र तरीका उनका निजीकरण करना ही है। हालांकि विनिवेश के माध्यम से भी सरकारी कंपनियों के प्रदर्शन पर निगाह रखी जा सकती है, लेकिन ऐसा तभी संभव है जबकि कंपनी के कम से कम 51 प्रतिशत शेयर बाजार के पास हो और 49 प्रतिशत व इससे कम ही कंपनियों के पास हो। हालांकि होता अबतक उल्टा ही रहा है। जानेमाने स्तंभकार 'भरत झुनझुनवाला' द्वारा लिखित व  'नवभारत टाइम्स' अखबार में मार्च 26, 2014 को प्रकाशित निम्नलिखित लेख उपरोक्त विषय पर विस्तार से प्रकाश डालता है। आप भी पढ़ेंः 
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शुक्रवार, जनवरी 23, 2015
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खराब नीतियों द्वारा थोपे गए नुकसान भयानक हो सकते हैं, लेकिन टीवी के एंकरों का ध्यान इन पर कभी नहीं जाता। जनता की नजर भी इन पर तभी जाती है, जब कोई विशाल संख्या ऐसे नुकसानों के साथ नत्थी कर दी जाती है (मसलन 2 जी स्पेक्ट्रम और कोल ब्लॉक्स के मामले)। इन मामलों से जुड़ी संख्याएं बाद में बढ़ा-चढ़ा कर पेश की गई प्रतीत हुईं, लेकिन हर तरफ फैले भ्रष्टाचार के खिलाफ लोगों के गुस्से को आकार देने में इनकी एक भूमिका जरूर रही। दुर्भाग्यवश, खराब कानूनों और लालफीताशाही से होने वाले नुकसान को लेकर हमारे पास कोई आकलन ही नहीं है। ये चीजें आर्थिक सक्रियता की राह में रोड़ा बनती हैं और सरकार की आमदनी तथा कल्याणकारी कार्यों पर होने वाले खर्च में कटौती का सबब बनती हैं। हमारे श्रम कानून लोगों को काम पर रखना इतना मुश्किल बना देते हैं कि हाल के रोजगार आंकड़ों के मुताबिक, पिछले सात वर्षों मे...
बुधवार, जनवरी 21, 2015
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सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन अर्थात सेंसर बोर्ड में सबकुछ सही नहीं चल रहा है। डेरा सच्चा सौदा के बाबा राम-रहीम की फिल्म 'मैसेंजर ऑफ गॉड' (एमएसजी) को प्रदर्शन की अनुमति के मुद्दे पर जिस तरह विवाद पैदा हुआ है उससे इस बात की पुष्टि होती है कि फिल्मों को प्रदर्शन की अनुमति मिलने और ना मिलने के पीछे तर्कसंगत कारणों के इतर भी कई फैक्टर काम करते हैं। इनमें आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक और राजनैतिक कारकों की भी अहम भूमिका होती है। इस विषय पर दैनिक भास्कर समाचार पत्र में जाने माने फिल्मकार प्रीतीश नंदी द्वारा लिखित लेख पर्दे के पीछे की सच्चाई का सफलता पूर्वक खुलासा करता है। लेख हमें ये सोचने पर मजबूर करता है कि क्या वास्तव में हमें सेंसर बोर्ड की जरूरत है? आप भी पढ़ें..  
 
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मंगलवार, जनवरी 20, 2015
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भारत के लोग स्मार्ट और सृजनात्मक होते हैं. उन्होंने यह साबित किया है कि वे परिश्रमी और मितव्ययी होते हैं. भारत की धरती को कई तरह की नेमतें मिली हुई हैं, जिनमें एक अच्छी जलवायु और ढेर सारे प्राकृतिक संसाधन शामिल हैं. इस देश का लोकतंत्र शानदार है जिसकी जड़ें बेहद मजबूत हैं और यहां का शासन कानून-सम्मत है. लेकिन अब सवाल यह है कि आज़ादी के 53 साल बाद भी भारत एक बेहद गरीब देश क्यों है?
 
वे क्या कारण हैं जो भारत को गरीब और अमेरिका को एक अमीर देश बनाते हैं- ऐसे में जबकि एक समान राजनैतिक ढांचा है, काम के मोर्चे पर समान उदार विचारधाराएं और मान्यताएं हैं. इतना ही नहीं, सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि दोनों देशों में मेधावी और परिश्रमी मानव संसाधन के समृद्ध स्रोत ह...
सोमवार, जनवरी 19, 2015
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सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन (सेंसर बोर्ड) की कार्यप्रणाली पर पहले भी ऊंगलियां उठती रही हैं। अक्सर लोगों (विशेषकर धार्मिक संगठनों) की शिकायत रहती है कि अश्लीलता, फूहड़ता, अपराध, हिंसा, धूम्रपान आदि वाले दृश्यों को लेकर सेंसर बोर्ड ज्यादा उदार रुख अख्तियार करता है। कई बार बोर्ड के अधिकारियों के द्वारा घूस लेने के मामले का भी खुलासा हुआ है। अपनी बात मनवाने और फिल्म विशेष का विरोध करने के लिए जगह जगह हिंसक-अहिंसक प्रदर्शन आयोजित किए जाते हैं। हालांकि हर बार फिल्म उद्योग सहित तमाम संस्थाओं से जुड़े लोग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकार का हवाला देते हुए सेंसर बोर्ड के समर्थन में खड़े हो जाते हैं। मामले के अदालत में पहुंचने पर न्यायाधीश भी आम तौर पर फिल्मों व फिल्मकारों के पक्ष में और रुढ़िवाद के खिलाफ ही फैसला सुनाते हैं। लेकिन सेंसर बोर्ड से जुड़े हालिया विवाद में उल्टा ही देखने को मिल रहा है।...
गुरूवार, जनवरी 15, 2015
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यद्यपि सन् 1991 से भारत में आर्थिक सुधारों की शुभारंभ और मुक्त बाजार के साथ भारतीयों के प्रेम प्रसंग को शुरू हुए दो दशक बीत चुके हैं, इसके बावजूद पूंजीवाद को भारत में अपना मुकाम पाने के लिए अबतक जद्दोजहद करना पड़ रहा है। अधिकांश लोगों की भांति भारतीय भी मानते हैं कि बाजार फलदायक तो है लेकिन नैतिक नहीं है। लेकिन मेरी राय इसके बिल्कुल उलट है। मेरा मानना है कि इंसान अनैतिक होता है और लोकतंत्र के तहत या राजतंत्र के तहत, समाजवादी व्यवस्था हो अथवा पूंजीवादी समाज बुरा व्यवहार वही करता है। बाजार नामक संस्था अपने आप में अत्यंत नैतिक होती है, और इसकी इस नैतिक प्रवृति के बाबत जो चीज मुझे आश्वस्त करती है वह है भारतीय पारंपरिक धर्म के प्रति मेरा विश्वास। बाजारगत प्रणाली के मूल में स्व-हित से प्रेरित आम जन, जो बाजार में शांतिपूर्ण तरीके से अपने हित को आगे बढ़ाते हैं; के मध्य आदान प्रदान की प्रक्रिया का उद्देश्य नीहित है।...

मुक्त बाज़ार और नैतिक चरित्र

Morality of Marketक्या मुक्त बाज़ार हमारी नैतिकता पर प्रश्न चिन्ह लगा रहा है? जाने कुछ विशेषज्ञों की राय...

आज़ादी ब्लॉग

Mahatma Gandhi quote
शुक्रवार, जनवरी 30, 2015
सरकारी नियंत्रण फर्जीवाड़े़ और काला बाजारी को बढ़ावा देता है। यह सत्य का दमन करता है और वस्तुओं की गहन कृत्रिम कमी पैदा करता है। य...

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बुधवार, जनवरी 28, 2015
- पेंसिल्वेनिया यूनिवर्सिटी द्वारा टॉप ग्लोबल थिंकटैंक सेंटर्स की सूची जारी, टॉप 50 में अकेला भारतीय   -  चीन, भार...

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सोमवार, जनवरी 19, 2015
समाजवाद के 6 चमत्कार   1- किसी के पास काम नहीं, लेकिन कोई बेरोजगार नहीं  2- कोई काम नहीं करता, लेकिन पैसे सभी को...

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मंगलवार, जनवरी 13, 2015
गरीब पड़ोसी की बजाए अमीर पड़ोसी का होना हमेशा अच्छा होता है। लेकिन भारत और चीन के कम ही अर्थशास्त्री इस सिद्धांत से इत्तेफाक रखत...

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शुक्रवार, जनवरी 09, 2015
राजस्थान के छोटे से गांव का राजुराम । बड़ी मुश्किल से अपनी पढाई पूरी की और बीएड करने के लिए जब पेसो का बंदोबस्त नहीं हुआ तो बुढे...

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मंगलवार, जनवरी 06, 2015
कितने आश्चर्य की बात है कि जो लोग सोचतें हैं कि वे डॉक्टर, अस्पताल और दवाईयों का खर्च वहन नहीं कर सकते हैं, वे ही लोग ये सोचतें...

आपका अभिमत

क्या राजनैतिक दलों के घोषणापत्र को कानूनी दस्तावेज घोषित किया जाना चाहिए?:

आज़ादी वी‌डियो

See video पांच साल तक अपने चुनावी क्षेत्र से गायब रहने वाले राजनेता चुनाव आते ही किस प्रकार अपनी लच्छेदार बातो...

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