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गुरूवार, सितंबर 11, 2014
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महात्मा गांधी की हत्या मेरे परदादा के घर में हुई थी। अपने जीवन के अंतिम दिनों में गांधी जी जब कभी दिल्ली आते, वह बिड़ला हाउस में ही ठहरते थे। जनवरी 1948 में जब गांधी जी यहां हरी घास भरे प्रांगण में अपनी दैनिक प्रार्थना सभा के लिए जा रहे थे, एक हत्यारे ने उन्हें बिल्कुल पास जाकर गोलियों से भून दिया। यह घर और उसका बगीचा अब गांधी संग्रहालय के रूप में जाना जाता है, जहां उनके हजारों प्रशंसक हर साल दर्शन के लिए आते हैं।
 
बहरहाल, बड़ा होते हुए मुझे अपने मारवाड़ी परिवार के जीवन मूल्यों को याद रखने के लिए इस संग्रहालय में जाने की जरूरत नहीं पड़ी। हमारा छोटा-सा मारवाड़ी समुदाय जो मूल रूप से राजस्थान से जुड़ा है, कारोबार में आश्चर्यजनक सफलता के लिए जाना जाता है। इस सफलता का एक कारण यह है कि एक तो हम लोग अपने कुटुं...
बुधवार, सितंबर 10, 2014
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व्यापार में कुछ खास नैतिक खतरे नहीं हैं। कोई भी काम जिसमें सही या गलत में चुनाव करना पड़े उसमें नैतिक खतरा होता ही है। व्यापारी भले ही अपने काम में ज्यादा नैतिक दुविधा का सामना करता है लेकिन यह किसी राजनेता या नौकरशाह की दुविधा से ज्यादा नहीं होता होगा।
 
अलग-अलग व्यवसायों के लिए अलग-अलग एथिक्स नहीं चाहिए बल्कि एक ऐसा नीति-शास्त्र विकसित करना चाहिए जो सबका मार्गदर्शन करे। व्यापार नैतिकता और कुछ नही बल्कि व्यक्तिगत नैतिकता है।
 
व्यापार की सामाजिक जिम्मेदारी नैतिकता को ध्यान में रखते हुए मुनाफे में इजाफा करना है। लेकिन क्या व्यापार में लोग नैतिक कस्टम के परे जा सकते हैं? क्या, जब समाज का नैतिक कस्टम क...
मंगलवार, सितंबर 09, 2014
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भारत ने पहले लोकतंत्र को अपनाया और बाद में पूंजीवाद को और यह हमारे बारे में बहुत कुछ समझाता है। भारत 1950 में सर्व मताधिकार और व्यापक मानवाधिकारों के साथ लोकतंत्र बना लेकिन 1991 में जा कर इसने बाजार की ताकतों को ज्यादा छूट दी।
 
हम लोगों ने कई सालों तक आर्थिक सुधार की धीमी वृद्धि देखी है जिस दौरान हमने कुछ नुकसानदेह समाजवादी संस्थाओं को विखण्डित किया है। फिर भी एक विशाल कार्य-सूची है जिसे पूरा किये बिना हम खुद को एक सख्त पूंजीवादी लोकतंत्र नही कह सकते। और तो और, यह भी देखा जा सकता है कि चुनाव के दौरान नेता आज भी एक उदार आर्थिक सुधार के मंच पर प्रचार करने से कतराते हैं। उन्हें लगता है कि पूंजीवादी संस्थाओं का समर्थन राजनीतिक विफलता का रास्ता है।
 
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सोमवार, सितंबर 08, 2014
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हम भारतीय दुख-परेशानी, अन्याय और संघर्षों से खुद को अलिप्त रखने में  बहुत माहिर हैं। हम ऐसे जिंदगी जीते हैं जैसे देश की बड़ी समस्याओं का वजूद ही नहीं है। मैं कोई फैसला नहीं दे रहा हूं। इतनी तकलीफों और असमानता वाले देश में इनसे निपटने का एकमात्र यही तरीका है। 
 
दूसरी बात, जिसमें हम सिद्धहस्त हैं वह है ऐसी किसी चीज पर विचार-विमर्श न करना जो समाज में वर्जित हो या इसमें सेक्स संबंधी कोई दृष्टिकोण हो। भारतीयों के लिए सेक्स का तो कोई अस्तित्व ही नहीं है और इसीलिए इससे जुड़ा कोई मुद्‌दा भी नहीं है। यही वजह है कि महिलाओं के खिलाफ अपराधों को लेकर अब तक हमारे यहां तर्कपूर्ण, जानकारी परक और विवेकपूर्ण बहस नहीं हुई है और हममें से कई लोग तो सेक्स एजुकेशन को भयंकर चीज मानते हैं। हालांकि, हम सेक्स के बारे में...
मंगलवार, सितंबर 02, 2014
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एक चुनावी सवाल– आज से 35 साल पहले किस पार्टी ने अपने घोषणापत्र में ये कहा था, “आप सब लोग ही देश हैं. यह आपकी पार्टी है और आप ही के लिए है. हम कोई जादू नहीं कर सकते. हम सिर्फ़ सही समय पर, सही नतीजे आपके सामने लाकर दिखाएंगे. यह आपका अधिकार है कि आप ऐसी सरकार को चुनें जो आप चाहते हैं. सोचिए, समझिए और अपना वोट अपने और देश के हित में कीजिए.”
 
नहीं याद आया? ऐसा ही होता है. हर चुनाव के बाद हम लोग अकसर पुरानी बातों को भूलकर नई बातों में उलझ जाते हैं.
 
दरअसल ये ऊपर कही गई बातें किसी आम राजनीतिक पार्टी ने नहीं, बल्कि फिल्म वालों की पॉलिटिकल पार्टी ने कही थीं, जिसके अध्यक्ष थे सदाबहार अभिनेता...
सोमवार, सितंबर 01, 2014
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- प्राथमिक शिक्षा पर आधारित कॉफी टेबल बुक "बूंदें" का हुआ विमोचन

 - आरटी में निशुल्क शिक्षा का प्रावधान, लेकिन केंद्रीय विद्यालयों में ली जाती है फीसः कुलभूषण शर्मा

- आरटीई के कारण निजी स्कूलों पर तालाबंदी का मंडरा रहा खतराः डा. पार्थ जे शाह

 

नई दिल्ली। प्रॉक्टर एंड गैम्बल इंडिया के पूर्व सीईओ व इंडिया अनबाऊंड के लेखक गुरचरन दास का मानना है कि सरकार के शिक्षा के अधिकार (आरटीई) कानून की वजह से स्कूल तो छात्रों की पहुंच में आ गए लेकिन शिक्षा अभी भी उनसे कोसों दूर है। छात्रों का स्कूल जाने का उद्देश्य मिड डे मिल खाने और निशुल्क वर्दी लेने तक ही सिमट कर रह गया है। जबकि गुणवत्ता युक्त शिक्षा प्र...

मुक्त बाज़ार और नैतिक चरित्र

Morality of Marketक्या मुक्त बाज़ार हमारी नैतिकता पर प्रश्न चिन्ह लगा रहा है? जाने कुछ विशेषज्ञों की राय...

अनिल पांडेय, जगदीश पंवार व अतुल चौरसिया को पहला आजादी पत्रकारिता पुरस्कार

First Azadi Award Winners

- 8 जनवरी को दिल्ली के पांच सितारा होटल में आयोजित समारोह के दौरान किए गए सम्मानित

- एटलस ग्लोबल इनिसिएटिव के वाइज प्रेसिडेंट टॉम जी. पॉमर ने ट्रॉफी प्रदान कर किया सम्मानित

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आज़ादी ब्लॉग

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सोमवार, सितंबर 01, 2014
"यदि आप ऐसे राजनेताओं को वोट देते आ रहे हैं जो आपको मुफ्त (दूसरों के खर्च पर) चीजें देने का वादा करते हैं, तब जब वे आपके पैसे से स...

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बुधवार, अगस्त 27, 2014
विगत कुछ समय से पंजाब में ड्रग्स के सेवन करने वालों की संख्या में हुई वृद्धि ने शासन प्रशासन सहित स्थानीय जनता के माथे पर चिंता की...

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मंगलवार, अगस्त 26, 2014
जिन लोगों को ये लगता हो कि किसानों की समस्या का एकमात्र समाधान सब्सिडी है, तो उन्हें न्यूजीलैंड देश से कुछ सबक सीखना चाहिए..। न्यू...

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सोमवार, अगस्त 11, 2014
शिक्षा का अधिकार कानून के तहत आठवीं कक्षा तक के बच्चों को फेल नहीं किया जा सकता है. ऐसे में दिल्ली के सरकारी स्कूलों में हालत इत...

Frederic Bastiat on freedom
बुधवार, अगस्त 06, 2014
यदि मनुष्य की नैसर्गिक प्रवृत्ति (स्वभाव) इतनी बुरी है कि उसे आजाद छोड़ना सुरक्षित नहीं तो ऐसी सोच रखने वाले या ऐसी व्यवस्था करने...

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