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बुधवार, सितंबर 02, 2015
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गुजरात में चला पाटीदारों का आंदोलन सचमुच स्वागत योग्य है, क्योंकि यह आरक्षण- जैसी सड़ी-गली व्यवस्था को खत्म करने का कारण बनेगा। यह आंदोलन बड़े मजबूत तर्क पर आधारित है। यह कहता है कि यदि आप अन्य पिछड़ों को आरक्षण दे रहे हो तो हमें भी क्यों नहीं? या तो हमें भी आरक्षण दो या फिर किसी को मत दो। इसने आरक्षण के पिटारे को खोल दिया है। आरक्षण को लेकर अहमदाबाद की बड़ी सभा ने नेताओं के छक्के छुड़ा दिए। देश के सारे नेता, वे भी जो अपने आपको तीस मार खां समझते हैं, नहीं जानते कि क्या करें? गुजरात के पटेलों का विरोध करें या समर्थन! जो विरोधी नेता मोदी-विरोधी हैं, उन्होंने पटेलों की मांग का तत्काल समर्थन कर दिया, लेकिन जिन्होंने सारे मामले पर दूरंदेशी से सोच-विचार किया है, उन्होंने सोचा कि पटेल लोग गरीबों का आटा गीला कर रहे हैं।
 
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गुरूवार, अगस्त 27, 2015
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देश के तमाम शहरों की सड़कें न सिर्फ लाखों कामगार गरीबों तथा अभावग्रस्त लोगों की आश्रयस्थली वरन उनकी रोजीरोटी का केंद्र भी हैं, जहां पर वे सस्ते और आकर्षक सामानों की दुकान सजाते हैं। शहरों में सड़क किनारे फुटपाथ पर आपकों ऐसे अनेक पुरष-महिलाएं पकाया हुआ भोजन, फल व सब्जियां, कपड़े, खिलौने, किताबें, घरेलू इस्तेमाल की चीजें व सजावटी सामान बेचते मिल जाएंगे। एक अनुमान के मुताबिक भारत में तकरीबन एक करोड़ लोग इस तरह सड़क किनारे सामान बेचते हुए अपनी आजीविका कमाते हैं।
 
हालांकि इन स्ट्रीट वेंडर्स की जिंदगी बेहद कठिन होती है। शरित भौमिक द्वारा नेशनल अलायंस ऑफ स्ट्रीट वेंडिंग ऑफ इंडिया के साथ मिलकर सात शहरों में किए गए सर्वे से पता चला कि उनकी कामकाजी स्थितियां बेहद खराब हैं। उन्हें दिन में दस से बारह घंटे तक काम कर...
मंगलवार, अगस्त 18, 2015
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स्वतंत्रता दिवस का अवसर थोड़ा रुकने, रोजमर्रा की घटनाओं पर सोच का दायरा बढ़ाने और पिछले 68 साल के दौरान अपने देश की यात्र पर नजर डालने का बढ़िया वक्त होता है। आजाद देश के रूप में अपने भ्रमपूर्ण इतिहास पर जब मैं नजर डालता हूं तो कुहासे में मील के तीन पत्थरों को किसी तरह देख पाता हूं। अगस्त 1947 में हमने अपनी राजनीतिक लड़ाई जीती। जुलाई 1991 में आर्थिक आजादी हासिल की और मई 2014 में हमने सम्मान हासिल किया।
 
मैं आजादी के बाद के आदर्शवादी दिनों में पला-बढ़ा जब हम आधुनिक, न्यायसंगत भारत के जवाहरलाल नेहरू के सपने में यकीन करते थे। लेकिन जैसे-जैसे साल बीतते गए, हमने पाया कि नेहरू की ‘मिश्रित अर्थव्यवस्था’ अंधी गली तक पहुंच रही थी। समाजवाद की जगह हम राज्य नियंत्रणवाद तक पहुंच गए जिसे हमने घृणापूर्वक ‘लाइसेंस राज’...
गुरूवार, अगस्त 13, 2015
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हर मंजूरी के लिए तय है फीस : सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी का अध्ययन, स्कूल खोलने की प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए केंद्र सरकार के पास आया सुझाव 
 
राजधानीमें नया स्कूल खोलने के लिए आधा दर्जन से अधिक विभागों एजेंसियों से करीब 14 सर्टिफिकेट या अनुमतियां लेनी पड़ती हैं। किसी भी अनुमति या सर्टिफिकेट के जारी होने की कोई तय समय सीमा नहीं है। अलबत्ता, सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी का एक अध्ययन है कि हर अनुमति की अवैध रूप से एक फीस तय है, जिसके अदा करने के बाद ही वह सर्टिफिकेट मिल पाता है। इस अध्ययन के मुताबिक राजधानी में कक्षा 5 तक का स्कूल खोलने के लिए करीब 20 लाख रुपए की जरूरत होती है, यदि स्कूल आठवीं तक खोलना है तो यह राशि 40-50 लाख रुपए तक पहुंच जाती है और दसवीं तक के लिए यही राशि एक करोड़ रुपए...
सोमवार, अगस्त 10, 2015
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सांसदों की वेतन कटौती का जो प्रस्ताव है, उसे एक लोकप्रिय जनाक्रोश की तरह से समझना चाहिए। जनता में इसको लेकर गुस्सा है कि हम जिन सांसदों को जनप्रतिनिधि बनाकर भेजते हैं, वे कितने गैरजिम्मेदार तरीके से संसद में व्यवहार करते हैं। इसके लिए जनता चाहती है कि इन सांसदों को अपने गैर-जिम्मेदार आचरण के लिए दंडित किया जाना चाहिए। पर दंड का स्वरूप ऎसा होना चाहिए जिसका सांसदों में डर हो। असर हो।
 
आर्थिक दंड काफी नहीं
लेकितन बात सिर्फ लोकप्रिय जनाक्रोश की ही नहीं है। संसद अगर ठप पड़ी है, कोई कामकाज नहीं हो रहा है तो यह चिंता का विषय सभी आम और खास के लिए है। यह सिर्फ आज की बात भी नहीं है। ऎसा कई सालों...
गुरूवार, अगस्त 06, 2015
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सेंटर फार सिविल सोसायटी (सीसीएस), एटलस नेटवर्क व फ्रेडरिक न्यूमन फाऊंडेशन (एफएनएफ) के संयुक्त तत्वावधान में आजादी.मी लेकर आए हैं पत्रकारों के लिए ipolicy (लोकनीति में सर्टिफिकेट) कार्यक्रम। ऋषिकेश स्थित www.alohaontheganges.com में 4-6 सितंबर, 2015 तक चलने वाले इस कार्यशाला में प्रस्तुति का माध्यम हिंदी होगी। इस कार्यशाला में आवेदन के लिए सभी भाषाओं (हिंदी, ऊर्दू, अंग्रेजी इत्यादि) के सभी माध्यमों (टीवी, रेडियो, समाचार पत्र, पत्रिकाओं इत्यादि) में कार्यरत श्रमजीवी पत्रकारों (स्थायी/अस्थायी) योग्य हैं। किंतु कार्यशाला में प्रस्तुतिकरण का माध्यम हिंदी होगी। यह कार्यशाला तीन दिवसीय (दो रात, तीन दिन) की होगी जो आवासीय होगी। अर्थात चयनित आवेदकों को पूरे पाठ्यक्रम के दौरान उपस्थित रहना होगा और अपरिहार्य परिस्थितियों के अतिरिक्त पाठ्यक्र...

मुक्त बाज़ार और नैतिक चरित्र

Morality of Marketक्या मुक्त बाज़ार हमारी नैतिकता पर प्रश्न चिन्ह लगा रहा है? जाने कुछ विशेषज्ञों की राय...

आज़ादी ब्लॉग

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गुरूवार, अगस्त 13, 2015
सेंटर फार सिविल सोसायटी (सीसीएस) व एटलस नेटवर्क के संयुक्त तत्वावधान में आजादी.मी लेकर आए हैं पत्रकारों के लिए ipolicy (लोकनीति...

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गुरूवार, जुलाई 23, 2015
अदालती कार्रवाई की वीडियो रिकॉर्डिंग के पक्ष में तीन मुख्य तर्क दिए जा सकते हैं। पहला, जब देश की संसद, चाहे राज्य सभा हो अथवा लो...

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गुरूवार, जुलाई 02, 2015
निजी स्कूलों की दाखिला प्रक्रिया से लेकर वहां ली जाने वाली फीस पर सूबे का सियासी पारा चढ़ सकता है। दिल्ली सरकार ने जहां इन दोनों...

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मंगलवार, जून 23, 2015
भूटान की राजधानी थिंपू में अपने तीन पड़ोसी देशों- बांग्लादेश, भूटान व नेपाल से भारत का मोटर वाहन सड़क-पारगमन समझौता एक नए दौर का आ...

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गुरूवार, फरवरी 26, 2015
जिस "स्वस्थ्य सरकारी नीति के सात सिद्धांतों'' की हम यहाँ चर्चा कर रहे हैं, वे मुक्त अर्थव्यवस्था के आधार स्तंभ हैं। उनमें से प्र...

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मंगलवार, फरवरी 17, 2015
जिस "स्वस्थ्य सरकारी नीति के सात सिद्धांतों'' की हम यहाँ चर्चा करने जा रहे हैं, वे मुक्त अर्थव्यवस्था के आधार स्तंभ हैं। उनमें स...

आपका अभिमत

क्या आप सीपीआई नेता के बयान से सहमत हैं कि सनी लियोनी के कंडोम विज्ञापन की वजह से रेप के मामले बढ़ रहे हैं?:

आज़ादी वी‌डियो

See video पांच साल तक अपने चुनावी क्षेत्र से गायब रहने वाले राजनेता चुनाव आते ही किस प्रकार अपनी लच्छेदार बातो...

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