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शुक्रवार, नवंबर 21, 2014
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दिल्ली से देवभूमि उत्तराखंड आए युवा सैलानी जोड़े की हत्या और लूटपाट की अप्रत्याशित घटना ने उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्र चकराता को सुर्खियों में ला दिया है। लेकिन इन सुर्खियों ने स्थानीय जनजाति समाज को शर्मसार कर दिया है, क्योंकि ऐसी घटना इस क्षेत्र के लिए किसी बड़ी अनहोनी जैसी है। सैलानियों को सिर-माथे बिठाने की परंपरा वाले जौनसार-बावर के इस जनजातीय समाज को पहले तो यकीन ही नहीं हुआ कि उनके बीच के युवक ऐसा वीभत्स कांड कर सकते हैं। लेकिन जब सच सामने आया, तो उन्होंने अनूठे ढंग से सामूहिक प्रतिक्रिया दी।
 
इलाके के 14 गांवों (खत) की सामूहिक पंचायत ने आम राय से फैसला किया कि ऐसे नालायकों से अब उनका कोई वास्ता नहीं। परिजनों ने भी इन आरोपियों से हमेशा के लिए नाता तोड़ने और उन्हें किसी भी तरह का कानूनी मदद न करन...
गुरूवार, नवंबर 20, 2014
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पिछले पखवाड़े एक ही दिन दो खबरें आईं। दोनों इतनी विपरीत थीं कि मैं चकरा गया। दोनों खबरें लोकतांत्रिक संस्कृतियों से आई थीं। अखबारों में फोटो थे, जिनमें युवा लड़के-लड़कियों को पुलिस हिरासत में लेती दिखाई दे रही थी। ये किस ऑफ लव डे के बहाने विभिन्न संगठनों द्वारा नैतिक पुलिस बनकर उन्हें परेशान करने का विरोध कर रहे थे। यह हालत तब है जब उन्होंने किसी कानून का उल्लंघन भी नहीं किया होता है।
 
कोझीकोड के एक कैफे से इसकी शुरुआत हुई, जिसमें प्रेम के खुले इजहार से क्रुद्ध एक गुट के लोगों ने तोड़-फोड़ की थी। जिस युगल पर हमला किया गया था, वह पुलिस के पास गया, लेकिन उसे वहां से भगा दिया गया। ऐसे मामले में अब तक यही होता आया है। इसके बाद उन्होंने सोशल मीडिया पर ग्रुप बनाकर किस ऑफ लव डे मनाना शुरू कर दिया। जैसा कि नाम से ल...
मंगलवार, नवंबर 18, 2014
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गुजरात में नगरपालिकाओं और पंचायतों में मतदान को अनिवार्य बनाने की जद्दो-जहद का अंनतः पटाक्षेप हो ही गया। अब गुजरात के सभी मतदाताओं को शहरी और ग्रामीण स्थानीय निकायों के चुनावों में अनिवार्यतः मतदान करना पड़ेगा। इस कानून का श्रेय भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ही जाता है। उनके गुजरात के मुख्यमंत्री रहते इसे दो बार- दिसंबर 2009 और मार्च 2011 में पारित किय गया, किंतु तत्कालीन राज्यपाल कमला बेनीवाल इसे संविधान के अनुच्छेद 21 के विरुद्ध मानती थीं और उन्होंने अप्रैल 2010 में इसे पुनर्विचार के लिए लौटा दिया था। नए राज्यपाल ओपी कोहली ने तीन वर्ष आठ महीनों ने लंबित उस कानून को स्वीकृति दे दी। ऐसी क्या बात है कि गुजरात में संघीय व्यवस्था के तीसरे तल अर्थात स्थानीय सरकारों में मतदान को अनिवार्य बनाने की जरूरत आन पड़ी? गुजरात में नगरपालिकाओं और पंचायतों के पिछले कई चुनावों के आंकड़ों को देखने पर लगता है कि वहां मतदान...
सोमवार, नवंबर 17, 2014
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सरकारों द्वारा आयकर लगाने के पीछे तर्क से ज्यदा परंपरा का योगदान है। प्रोग्रेसिव टैक्स ढांचे (अधिक आय पर अधिक कर) के समर्थन का आशय आयकर की अनिवार्यता नहीं है। अर्थशास्त्र यह कहता है कि जो लोग अधिक कमाएंगे वे अधिक खर्च भी करेंगे। इसलिए अगर माल-असबाब और सेवाओं (जीएसटी) पर टैक्स लिया जा रहा है तो यह स्वाभाविक है कि अधिक खर्च करने वाले अधिक कर चुकाएंगे। यह अपने आप में प्रोग्रेसिव टैक्स है। इसका फायदा यह है कि आयकर की तरह इस कर से बचना संभव नहीं है, चोरी भी नहीं की जा सकती।
 
इसके विपरीत अधिक आय पर अधिक कर की दर का आशय अधिक वसूली कतई नहीं है। अगर आज उच्च आय वर्ग के लोगों पर 30 या 40 प्रतिशत आयकर है तो आयकर कानून ही इससे बचने के तमाम रास्ते भी उपलब्ध कराता है। वेतनभोगी के अलावा तो सभी लोग अपने खर्चों को भारी भ...
बुधवार, नवंबर 12, 2014
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शुरु किया गया ‘मेक इन इंडिया’ अभियान निश्चित ही एक स्वागतयोग्य कदम है। स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री द्वारा लालकिले की प्राचीर से की गई घोषणाओं में से यह तीसरी घोषणा है जिसके तरफ कदम बढ़ाए गए हैं। दो अन्य घोषणाएं बैंकिंग सुविधा से वंचित भारतीयों को प्रधानमंत्री जनधन योजना के द्वारा बैंकिंग सुविधा मुहैया कराना और योजना आयोग को भंग करने से संबंधित हैं, जिनपर काम शुरु हो चुका है। यह सिद्ध करता है कि नरेंद्र मोदी अपनी बातों के पक्के हैं। 
 
‘मेक इन इंडिया’ अभियान में कई स्वागत योग्य पहलुएं शामिल हैं, जिनमें सर्वप्रमुख अतिआवश्यक उत्पादन को बढ़ावा देना है। इस अभियान में उत्पादक रोजगार पैदा करने की अपार संभावनाएं हैं। इस बाबत शु...
मंगलवार, नवंबर 11, 2014
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यह अच्छा है कि वर्तमान मोदी सरकार विभिन्न समस्याओं के समाधान के लिए अपने पूर्ववर्ती सरकारों की भांति भावुकता की बजाए व्यावहारिकता के आधार पर फैसले लेती दिख रही है। वित्तमंत्री अरुण जेटली के राज्यसभा में दिया गया वह बयान जिसमें कि उन्होंने घाटे में चल रही 79 सार्वजनिक इकाईयों को निजी करने के विकल्प को खुला रखने की बात कही थी, इसका ज्वलंत प्रमाण है। स्थिति की गंभीरता को और अधिक स्पष्ट करते हुए उन्होंने यह भी कहा था कि यदि सिर्फ उक्त 79 इकाईयों में लगे निवेश की धनराशि को ही वसूल लिया जाए तो देश के प्रत्येक नागरिक को 1,30,000 रुपए प्राप्त हो सकते हैं। वित्तमंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार अब ऐसी इकाईयों को और नहीं झेल सकती और उसके पास उक्त इकाईयों को विनिवेश के लिए खोलने के अलावा और कोई चारा नहीं है।

विदित हो कि सरकार द्वारा विभिन्न सार्वजनिक इकाईयों...

मुक्त बाज़ार और नैतिक चरित्र

Morality of Marketक्या मुक्त बाज़ार हमारी नैतिकता पर प्रश्न चिन्ह लगा रहा है? जाने कुछ विशेषज्ञों की राय...

अनिल पांडेय, जगदीश पंवार व अतुल चौरसिया को पहला आजादी पत्रकारिता पुरस्कार

First Azadi Award Winners

- 8 जनवरी को दिल्ली के पांच सितारा होटल में आयोजित समारोह के दौरान किए गए सम्मानित

- एटलस ग्लोबल इनिसिएटिव के वाइज प्रेसिडेंट टॉम जी. पॉमर ने ट्रॉफी प्रदान कर किया सम्मानित

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आज़ादी ब्लॉग

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मंगलवार, अक्टुबर 07, 2014
बच्चा पेड़ पर चढ़ने की कोशिश कर रहा है; तुम क्या करोगे? तुम तत्काल डर जाओगे--हो सकता है कि वह गिर जाए, हो सकता है वह अपना पैर तोड़ ले...

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सोमवार, सितंबर 01, 2014
"यदि आप ऐसे राजनेताओं को वोट देते आ रहे हैं जो आपको मुफ्त (दूसरों के खर्च पर) चीजें देने का वादा करते हैं, तब जब वे आपके पैसे से स...

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बुधवार, अगस्त 27, 2014
विगत कुछ समय से पंजाब में ड्रग्स के सेवन करने वालों की संख्या में हुई वृद्धि ने शासन प्रशासन सहित स्थानीय जनता के माथे पर चिंता की...

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मंगलवार, अगस्त 26, 2014
जिन लोगों को ये लगता हो कि किसानों की समस्या का एकमात्र समाधान सब्सिडी है, तो उन्हें न्यूजीलैंड देश से कुछ सबक सीखना चाहिए..। न्यू...

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सोमवार, अगस्त 11, 2014
शिक्षा का अधिकार कानून के तहत आठवीं कक्षा तक के बच्चों को फेल नहीं किया जा सकता है. ऐसे में दिल्ली के सरकारी स्कूलों में हालत इत...

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