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मंगलवार, अप्रैल 15, 2014
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भूमंडलीकरण तथा आर्थिक उदारवाद के दौर में काफी समय से भारतीय कर प्रणाली में सुधार की मांग होती रही है। अर्थक्रांति नामक संगठन ने अपनी वेबसाइट पर भारतीय कर प्रणाली में क्रांतिकारी परिवर्तन लाने का प्रस्ताव रखा है। इसके अनुसार भारत के सभी प्रकार के करों (कस्टम तथा आयात को छोड़कर) के स्थान पर बैंक लेन-देन कर को लगाने का सुझाव है। इस कर के द्वारा होने वाली आय को केंद्र, राज्य एवं स्थानीय शासन में बांटे जाने की बात है। इस प्रस्ताव के अनुसार आयकर भी समाप्त हो सकता है पर इसकी संभावनाओं पर विचार करना होगा।
दुनिया के कई देशों में आयकर का प्रावधान नहीं है। उदाहरण के तौर पर संयुक्त अरब अमीरात, ओगान, बहरीन, इत्यादि। हालांकि इन देशों में नागरिकों को सामाजिक सुरक्षा के नाम पर 5 से 10 फीसद तक कर देना पड़ता है। यही नहीं कुछ उत्पादों जैसे शराब पर 50 फीसद तक...
सोमवार, अप्रैल 14, 2014
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सोलहवीं लोकसभा के चुनाव के लिए तमाम राजनीतिक दलों ने अपने चुनावी घोषणापत्रों में कहा है कि अगर वे सत्ता में आए, तो आर्थिक विकास के विभिन्न क्षेत्रों के लिए प्राथमिकता से कार्य करेंगे। हाल ही में अमेरिका के अग्रणी मत सर्वेक्षक संगठन गैलप ने अपने सर्वेक्षण में कहा है कि भारत के लोकसभा चुनाव में विकास और अर्थव्यवस्था सबसे महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। 
 
सर्वेक्षण में करीब 35 फीसदी भारतीयों ने माना है कि अर्थव्यवस्था बदतर होती जा रही है। चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में भी अधिकांश मतदाताओं ने महंगाई, भ्रष्टाचार, रोजगार और विकास जैसे चार अहम मुद्दे बताए हैं।
 
महंगाई ने आम आदमी सहित मध्यवर्ग की भी कमर तोड़ दी...
मंगलवार, अप्रैल 08, 2014
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आने वाले कुछ सप्ताह में मैं मतदान करने के लिए जाऊंगा। मतदान बूथ पर मेरा सामना खामियों-खराबियों वाले उम्मीदवारों से होगा, लेकिन मेरे सामने उसे चुनने की मजबूरी होगी जिसमें सबसे कम खामी होगी। यहां सवाल यही है कि किस आधार पर मैं अपनी पसंद के उम्मीदवार का चयन करूं? सामान्य सी बात है कि मैं उस उम्मीदवार को वोट देना पसंद करूंगा जो करोड़ों भारतीयों के जीवन में संपन्नता-समृद्धि लाने में मददगार हो। इस संदर्भ में भ्रष्टाचार, महंगाई, सेक्युलरिज्म और आतंकवाद जैसी बातें भी अपेक्षाकृत कम महत्व रखती हैं। कोई भी भारतीय तब तक चैन से नहीं रह सकता जब तक कि सभी भारतीय अपनी जरूरतों को पूरा करने के संदर्भ में दिन-प्रतिदिन की चिंताओं से मुक्त नहीं हो जाते। सभी राजनेता गरीबों के प्रति अपनी चिंता दर्शाते हैं, लेकिन करोड़ों गरीब और निम्न मध्यम वर्ग के भारतीय गरीबी रेखा से थोड़ा ही ऊपर जीवन-यापन कर रहे हैं, जो अपने आर्थिक जीवन में सुधार...
सोमवार, अप्रैल 07, 2014
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चुनाव में मोदी की जीत की संभावना भारतीय बॉन्डों और शेयरों में डॉलरों की बाढ़ का सबब बन गई है। इसके चलते रुपया मजबूत हुआ है और डॉलर के साथ उसका विनिमय मूल्य 60 रुपया प्रति डॉलर की दहलीज से भी नीचे आ गया है। रुपए की यह मजबूती अगर निर्यात में उछाल से पैदा होती तो यह सभी के लिए खुशी की बात थी। लेकिन हकीकत इससे अलग है। रुपया चढ़ने की मौजूदा वजह मोदी की जीत पर लगे सट्टे में पैसा झोंके जाने जैसी है। इस तरीके से मजबूत हुआ रुपया भारत की निर्यात संभावनाओं में पलीता लगा देगा और देश को इससे कुछ भी स्थायी लाभ नहीं होगा।
 
कुछ निवेश बैंकों का अंदाजा है कि रुपया आगे और मजबूत होकर 58 रुपया प्रति डॉलर तक आएगा। सिटीग्रुप के एडम गिलमोर तो मोदी की जोरदार जीत की स्थिति में इसके 40-45 रुपया प्रति डॉलर तक पहुंच जाने की बात कह...
शुक्रवार, अप्रैल 04, 2014
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चुनाव के समय राजनीतिकों के बीच तीखी बयानबाजी कोई नई बात नहीं है, मगर व्यक्तिगत स्तर पर की जा रही अशोभनीय टिप्पणियों से समझा जा सकता है कि आखिर आम लोगों के बीच राजनीतिक वर्ग की छवि खराब क्यों है। यह तलाश बेमानी है कि इसकी शुरुआत कैसे हुई; गौर करने वाली बात यह है कि जिस तरह से भाषा की मर्यादा लांघी जा रही है, वह कोई अच्छा संकेत नहीं है। और ऐसी टिप्पणियां करने में किसी भी दल के नेता पीछे नहीं हैं।
 
बेनी प्रसाद वर्मा और आजम खान ने हाल ही में भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के लिए जिन शब्दों का इस्तेमाल किया, उन्हें यहां नहीं दोहराया जा सकता, तो कांग्रेस उम्मीदवार इमरान मसूद का एक ऐसा वीडियो भी सामने आया, जिससे पता चलता है कि हमारे नेता किस हद तक जा सकते हैं! दूसरी ओर खुद मोदी कांग्रेस अध्...
मंगलवार, अप्रैल 01, 2014
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कांग्रेस ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में कहा है कि निजी क्षेत्र में जाति-आधारित आरक्षण लागू करने के लिए राष्ट्रीय सहमति बनाई जाएगी। सपा तथा बसपा पहले ही आरक्षण के हिमायती रहे हैं। भाजपा भी मूल रूप से इसके पक्ष में है यद्यपि क्रीमी लेयर को आरक्षण से बाहर करना चाहती है। पूरे देश में आरक्षण जारी रखने के प्रति राजनीतिक सहमति दिखती है।
 
जाति जैसी समस्या अनेक देशों में है। मलेशिया में मलय भूमिपत्रों तथा चीनियों के बीच खाई थी। व्यापार चीनियों के हाथ में था, जबकि बहुमत भूमिपुत्रों का। सत्तर के दशक में वहां यूनिवर्सिटी के दाखिलों तथा सरकारी नौकरियों में भूमिपुत्रों के लिए आरक्षण लागू किया गया। हाल में प्रधानमंत्री रजाक ने आरक्षण की मात्र में कटौती की है। साथ-साथ व्यापार के अवसर तथा ट्रेनिंग को भूमिपुत्रों के लिए व...

मुक्त बाज़ार और नैतिक चरित्र

Morality of Marketक्या मुक्त बाज़ार हमारी नैतिकता पर प्रश्न चिन्ह लगा रहा है? जाने कुछ विशेषज्ञों की राय...

अनिल पांडेय, जगदीश पंवार व अतुल चौरसिया को पहला आजादी पत्रकारिता पुरस्कार

First Azadi Award Winners

- 8 जनवरी को दिल्ली के पांच सितारा होटल में आयोजित समारोह के दौरान किए गए सम्मानित

- एटलस ग्लोबल इनिसिएटिव के वाइज प्रेसिडेंट टॉम जी. पॉमर ने ट्रॉफी प्रदान कर किया सम्मानित

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आज़ादी ब्लॉग

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सोमवार, अप्रैल 14, 2014
मुझे नहीं लगता कि यह कहना अतिश्योक्ति होगा कि हमारा इतिहास, महंगाई और मुद्रा स्फीति का इतिहास रहा है। वह मुद्रा स्फीति जिसका सृज...

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मंगलवार, फरवरी 18, 2014
जब तक सरकारें सीमित नहीं होंगी, जनता को सही मायने में स्वतंत्रता प्राप्त नहीं हो सकती...   - रोनॉल्ड रीगन (पूर्व अमेरिक...

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सोमवार, फरवरी 17, 2014
दुनिया में अल्पकालीन सरकारी कार्यक्रमों जितनी स्थायी चीज कुछ और नहीं हो सकती... - मिल्टन फ्रीडमैन  

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गुरूवार, फरवरी 13, 2014
व्यवसाय में सरकारी "सहायता" उतना ही त्रासदीपूर्ण है जितना कि सरकारी "उत्पीड़न"...सरकार केवल एक ही तरीके से राष्ट्र की समृद्धि मे...

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सोमवार, फरवरी 10, 2014
निर्धन लोगों के साथ असल त्रासदी, दरअसल उनकी आकांक्षाओं की विपन्नता है ः एडम स्मिथ

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