ताज़ा पोस्ट

गुरूवार, फरवरी 26, 2015
Dr. Alok Puranik_0.jpg
वित्तीय साक्षरता के मामले में पश्चिमी भारत और उत्तर भारत में बहुत फर्क है। उत्तर भारत यानी बिहार, उत्तर प्रदेश में आम मध्यवर्गीय परिवारों के अधिकांश लोगों से  शेयर बाजार के बारे में बात करें, तो उन्हे लगता है कि सट्टे की बात की जा रही है। सट्टा यानी एक अवांछनीय गतिविधि, सट्टा यानी किसी अनिश्चित घटना के घटने या ना घटने को लेकर लगायी जानीवाली शर्त, सौदे। इनमें एक पक्ष हारता और दूसरा पक्ष जीतता है। सट्टे को पक्के तौर पर निवेश और बचत  से जुड़ा मसला ना माना जा सकता। एक आम समझ शेयर बाजार को लेकर उत्तर भारत के अधिकांश परिवारों में यही है कि यह तो सट्टा है, इससे दूर ही रहना चाहिए।
 
इस दूर रहने का नुकसान यह है कि शेयर बाजार एक आम निवेशक को जो भला कर सकता है, आम निवेशक उससे वंचित रह जाता है। आम निवेशक क...
सोमवार, फरवरी 16, 2015
GDP_0.jpg
भारत के केंद्रीय सांख्यिकीय संगठन ने फरवरी माह से जीडीपी आदि को मापने के लिए आधार वष्ाü 2011 -12 कर दिया है। इसके बाद वर्ष 2013-14 के लिए भारत की जीडीपी वृद्धि दर के आंकड़े एक झटके में 2.2 तक बढ़ गए। 
 
जमीनी हालात बदले बिना ही अर्थव्यवस्था की तस्वीर अचानक ही बेहतर दिखने लग गई है। वित्त मंत्री अरूण जेटली अपना पहला पूर्ण बजट भी इसी पृष्ठभूमि में पेश करेंगे। क्यों बदले गए हैं जीडीपी मापने के ये पैमाने और क्या होगा अर्थव्यवस्था पर इसका असर। प्रस्तुत है, राजस्थान पत्रिका में प्रकाशित सीसीएस के कुमार आनंद की टिप्पणी :
 
प्रासंगिक हैं नवीन पैमाने
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शुक्रवार, फरवरी 13, 2015
street vending in jaipur_0.jpg
राजस्थान हाइकोर्ट ने रेहड़ी पटरी विक्रेताओं को बड़ी राहत प्रदान की है। गुरुवार को एक महत्वपूर्ण आदेश जारी करते हुए हाइकोर्ट की जयपुर बेंच ने शहर से रेहड़ी पटरी विक्रेताओं को हटाने और उनके सामानों की जब्ती पर रोक लगा दिया है। कोर्ट ने राज्य सरकार को शीघ्र अतिशीघ्र राजस्थान स्ट्रीट वेंडर ऐक्ट 2012 को लागू करने का भी आदेश जारी किया है।  
 
विदित हो कि वर्ष 2012 में प्रवासी दिवस के मौके पर सैकड़ों रेहड़ी पटरी वालों को उनके ठीए से हटा दिया गया था और उनके सामानों को जबरदस्ती जब्त कर लिया गया था। इसके विरोध में सेंटर फॉर सिविल सोसायटी (सीसीएस) ने रेहड़ी पटरी संघ, हेरिटेज सिटी थड़ी ठेला यूनियन और सेंटर फॉर पॉलिसी सोल्यूशन्स के साथ मिलकर एक राजस्थान हाईकोर्ट के समक्ष एक रिट पिटीशन दायर किया था। ...
बुधवार, फरवरी 11, 2015
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देश में यूं तो वाक एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हक हमें संविधान द्वारा प्रदत्त है लेकिन समय समय पर यह बात सिद्ध होती रहती है कि उक्त संवैधानिक हक के लिए हम सरकारी नुमाइंदों के कृपा दृष्टि पर ही ज्यादा निर्भर हैं। हाल के वक्त में एक के बाद एक कई ऐसी घटनाएं हुई हैं जो हमारी इस संवैधानिक आजादी पर कुठाराघात करती हैं। हमें बार बार यह याद दिलाया जाता है कि, हमें बस वही और उतना ही बोलने की आजादी है जितना कि उनको (समाज के ठेकेदारों/ मोरल पुलिस को) सही लगती है। बात चाहे आमिर खान की हालिया फिल्म पीके से जुड़ी हो, या फिर डेरा सच्चा सौदा के राम-रहीम की फिल्म एमएसजी की। हालांकि यह लेख इस श्रृंखला की अगली कड़ी यानि कि मुंबई में हुए एक कॉमेडी शो "एआईबी रोस्ट अर्थात ऑल इंडिया ब**द" पर आधारित है। नैतिकता के पहरेदारों और समाज के ठेकेदारों को सबसे पहले तो शीर्षक में शामिल शब्द "ब**द" पर आपत...
मंगलवार, फरवरी 10, 2015
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धन, धन होता है। यह काला और सफेद नहीं होता। धन को काले और सफेद (कानूनी और गैर कानूनी) में विभाजित करना ही असल समस्या है। जैसे ही सरकार अथवा कोई सरकारी संस्था धन को काले या सफेद में वर्गीकृत करती है, उक्त धन अपना नैसर्गिक गुण अर्थात और धन पैदा करने की क्षमता समाप्त कर देता है। किसी देश की अर्थव्यवस्था को सबसे ज्यादा नुकसान, मौजूदा धन की सहायता से और धन पैदा न कर पाने की क्षमता पहुंचाती है। आगे बढ़ने से पहले हमें गैरकानूनी अर्थात काले धन की उत्पत्ति को समझना होगा। मोटे तौर पर काले धन का मुख्य कारण सरकार द्वारा लोगों को अधिक आय अर्जित करने पर पाबंदी लगाना और आवश्यकता से अधिक कर वसूलना है। दरअसल, आय और व्यय एक वृत्ताकार प्रक्रिया है जिसमें उत्पादक और उपभोक्ता के साथ सरकार भी शामिल होती है। जिस प्रक्रिया में सरकार को (कर ना चुकाकर) शामिल नहीं किया जाता है वह कालाधन बन जाता है।  
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गुरूवार, फरवरी 05, 2015
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उदारवाद शब्द का मूल आज़ादी या स्वतंत्रता है। दूसरे शब्दों में यहां केंद्र बिंदू व्यक्ति है। समाज व्यक्ति की मदद के लिए है और न कि व्यक्ति समाज के लिए जैसा कि साम्यवाद या समाजवाद जैसी व्यवस्थाएं परिभाषित करने की कोशिश करती हैं। उदारवाद के मूल तत्व व्यापक हैं और जीवन के हर पहलू को छूते हैं। जहां तक मनोभाव की बात है तो सहनशीलता, खासतौर पर असहमति को लेकर, ही इसका आधार है। मामला चाहे धार्मिक हो, सांप्रदायिक, क्षेत्रीय, राष्ट्रीय या फिर जाति या भाषाई समूह से ताल्लुक रखता हो, दूसरे के विचारों को लेकर सहनशीलता और इसे लेकर तर्क करने की तैयारी, उदारवाद का सार हैं।
 
जहां तक धर्म की बात है तो उदारवाद धर्मविरोधी नहीं है, लेकिन गैर-सांप्रदायिक और शायद नास्तिक भी है। एक अच्छा उदारवादी सभी धर्मों पर वैसा हमला नहीं बोलत...

मुक्त बाज़ार और नैतिक चरित्र

Morality of Marketक्या मुक्त बाज़ार हमारी नैतिकता पर प्रश्न चिन्ह लगा रहा है? जाने कुछ विशेषज्ञों की राय...

आज़ादी ब्लॉग

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गुरूवार, फरवरी 26, 2015
जिस "स्वस्थ्य सरकारी नीति के सात सिद्धांतों'' की हम यहाँ चर्चा कर रहे हैं, वे मुक्त अर्थव्यवस्था के आधार स्तंभ हैं। उनमें से प्र...

Sound Public Policy.jpg
मंगलवार, फरवरी 17, 2015
जिस "स्वस्थ्य सरकारी नीति के सात सिद्धांतों'' की हम यहाँ चर्चा करने जा रहे हैं, वे मुक्त अर्थव्यवस्था के आधार स्तंभ हैं। उनमें स...

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L.W. Reed.jpg
गुरूवार, फरवरी 12, 2015
जिस "स्वस्थ्य सरकारी नीति के सात सिद्धांतों'' की हम यहाँ चर्चा करने जा रहे हैं, वे मुक्त अर्थव्यवस्था के आधार स्तंभ हैं। उनमें स...

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सोमवार, फरवरी 02, 2015
गरीबी उन्मूलन का मुद्दा दुनियाभर की सभी साम्यवादी व समाजवादी सरकारों की प्राथमिकता में होती है। दूरदर्शिता व अच्छी नीति अपनाने क...

Mahatma Gandhi quote
शुक्रवार, जनवरी 30, 2015
सरकारी नियंत्रण फर्जीवाड़े़ और काला बाजारी को बढ़ावा देता है। यह सत्य का दमन करता है और वस्तुओं की गहन कृत्रिम कमी पैदा करता है। य...

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बुधवार, जनवरी 28, 2015
- पेंसिल्वेनिया यूनिवर्सिटी द्वारा टॉप ग्लोबल थिंकटैंक सेंटर्स की सूची जारी, टॉप 50 में अकेला भारतीय   -  चीन, भार...

आपका अभिमत

क्या नया भूमि अधिग्रहण बिल, सरकारी परियोजनाओं के नाम पर भूस्वामियों के हितों की अनदेखी करता है?:

आज़ादी वी‌डियो

See video पांच साल तक अपने चुनावी क्षेत्र से गायब रहने वाले राजनेता चुनाव आते ही किस प्रकार अपनी लच्छेदार बातो...

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