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मंगलवार, अप्रैल 22, 2014
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विभिन्न मामलों में न्यायपालिका द्वारा दी जाने वाली व्यवस्थाओं और टिप्पणियों को पढ़ने के बाद इस पर आश्चर्य होता है कि आखिर हम भारतीय लोग अधिकांश समय न्यायाधीशों को इस तरह की सक्रियता दिखाने के लिए क्यों विवश करते हैं। इस संदर्भ में जो बात सबसे अधिक महत्वपूर्ण है वह यह कि भारत में आज जिस तरह की न्यायिक निगरानी व्यवस्था है यदि वैसा कुछ नहीं होता तो क्या होता? फिर बात चाहे 2जी घोटाले की रही हो, खनन घोटाले की या फिर कोयला खदानों के आवंटन में हुए घपले-घोटालों की, इन सभी मामलों की निगरानी के कार्य में सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण और सक्रिय भूमिका का निर्वहन किया और इस बात को सभी जानते भी हैं। व्यापक रूप से कहें तो इस तरह के कदम के कारण उच्च पदों अथवा स्थानों पर भ्रष्टाचार को नियंत्रित करने के लिए एक सकारात्मक माहौल का निर्माण हुआ। इसका सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि सिविल सोसाइटी को यह अहसास हुआ कि भ्रष्टाचार को नियंत्रि...
सोमवार, अप्रैल 21, 2014
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आज अगर हम नरेंद्र मोदी की आर्थिक सोच के बदले चर्चा कर रहे हैं उनकी उस टोपी के पहनने, न पहनने की, तो इसमें सबसे ज्यादा दोष हम पत्रकारों का है। उनके राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों ने भी उस टोपी को मुद्दा बनाकर खूब उछाला है, लेकिन जब भी उछाली गई है वह टोपी, हम पत्रकार फौरन पहुंच गए हैं वहां उसको सुर्खियों में रखने के लिए। यह नहीं पूछा हमने कभी कि अगर मोदी ने पहन ली होती वह टोपी, जो उस मौलाना ने उनको देने की कोशिश की थी, तो क्या मुस्लिमों की नजर में मोदी सेक्यूलर बन जाते? क्या टोपी न पहनने से यह साबित हो गया है कि मोदी के दिल में मुसलमानों के लिए नफरत है? नहीं, पर टीवी पर पिछले दिनों आपने देखा होगा किस तरह मोदी का जिक्र आते ही घूम-फिरकर बात उस टोपी तक पहुंचती रही है। इतनी चर्चा सुनने को मिली है उस टोपी की कि मोदी अंदर ही अंदर पछता रहे होंगे कि टोपी पहनने से उन्होंने मना क्यों किया था।
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मंगलवार, अप्रैल 15, 2014
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भूमंडलीकरण तथा आर्थिक उदारवाद के दौर में काफी समय से भारतीय कर प्रणाली में सुधार की मांग होती रही है। अर्थक्रांति नामक संगठन ने अपनी वेबसाइट पर भारतीय कर प्रणाली में क्रांतिकारी परिवर्तन लाने का प्रस्ताव रखा है। इसके अनुसार भारत के सभी प्रकार के करों (कस्टम तथा आयात को छोड़कर) के स्थान पर बैंक लेन-देन कर को लगाने का सुझाव है। इस कर के द्वारा होने वाली आय को केंद्र, राज्य एवं स्थानीय शासन में बांटे जाने की बात है। इस प्रस्ताव के अनुसार आयकर भी समाप्त हो सकता है पर इसकी संभावनाओं पर विचार करना होगा।
दुनिया के कई देशों में आयकर का प्रावधान नहीं है। उदाहरण के तौर पर संयुक्त अरब अमीरात, ओगान, बहरीन, इत्यादि। हालांकि इन देशों में नागरिकों को सामाजिक सुरक्षा के नाम पर 5 से 10 फीसद तक कर देना पड़ता है। यही नहीं कुछ उत्पादों जैसे शराब पर 50 फीसद तक...
सोमवार, अप्रैल 14, 2014
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सोलहवीं लोकसभा के चुनाव के लिए तमाम राजनीतिक दलों ने अपने चुनावी घोषणापत्रों में कहा है कि अगर वे सत्ता में आए, तो आर्थिक विकास के विभिन्न क्षेत्रों के लिए प्राथमिकता से कार्य करेंगे। हाल ही में अमेरिका के अग्रणी मत सर्वेक्षक संगठन गैलप ने अपने सर्वेक्षण में कहा है कि भारत के लोकसभा चुनाव में विकास और अर्थव्यवस्था सबसे महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। 
 
सर्वेक्षण में करीब 35 फीसदी भारतीयों ने माना है कि अर्थव्यवस्था बदतर होती जा रही है। चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में भी अधिकांश मतदाताओं ने महंगाई, भ्रष्टाचार, रोजगार और विकास जैसे चार अहम मुद्दे बताए हैं।
 
महंगाई ने आम आदमी सहित मध्यवर्ग की भी कमर तोड़ दी...
मंगलवार, अप्रैल 08, 2014
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आने वाले कुछ सप्ताह में मैं मतदान करने के लिए जाऊंगा। मतदान बूथ पर मेरा सामना खामियों-खराबियों वाले उम्मीदवारों से होगा, लेकिन मेरे सामने उसे चुनने की मजबूरी होगी जिसमें सबसे कम खामी होगी। यहां सवाल यही है कि किस आधार पर मैं अपनी पसंद के उम्मीदवार का चयन करूं? सामान्य सी बात है कि मैं उस उम्मीदवार को वोट देना पसंद करूंगा जो करोड़ों भारतीयों के जीवन में संपन्नता-समृद्धि लाने में मददगार हो। इस संदर्भ में भ्रष्टाचार, महंगाई, सेक्युलरिज्म और आतंकवाद जैसी बातें भी अपेक्षाकृत कम महत्व रखती हैं। कोई भी भारतीय तब तक चैन से नहीं रह सकता जब तक कि सभी भारतीय अपनी जरूरतों को पूरा करने के संदर्भ में दिन-प्रतिदिन की चिंताओं से मुक्त नहीं हो जाते। सभी राजनेता गरीबों के प्रति अपनी चिंता दर्शाते हैं, लेकिन करोड़ों गरीब और निम्न मध्यम वर्ग के भारतीय गरीबी रेखा से थोड़ा ही ऊपर जीवन-यापन कर रहे हैं, जो अपने आर्थिक जीवन में सुधार...
सोमवार, अप्रैल 07, 2014
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चुनाव में मोदी की जीत की संभावना भारतीय बॉन्डों और शेयरों में डॉलरों की बाढ़ का सबब बन गई है। इसके चलते रुपया मजबूत हुआ है और डॉलर के साथ उसका विनिमय मूल्य 60 रुपया प्रति डॉलर की दहलीज से भी नीचे आ गया है। रुपए की यह मजबूती अगर निर्यात में उछाल से पैदा होती तो यह सभी के लिए खुशी की बात थी। लेकिन हकीकत इससे अलग है। रुपया चढ़ने की मौजूदा वजह मोदी की जीत पर लगे सट्टे में पैसा झोंके जाने जैसी है। इस तरीके से मजबूत हुआ रुपया भारत की निर्यात संभावनाओं में पलीता लगा देगा और देश को इससे कुछ भी स्थायी लाभ नहीं होगा।
 
कुछ निवेश बैंकों का अंदाजा है कि रुपया आगे और मजबूत होकर 58 रुपया प्रति डॉलर तक आएगा। सिटीग्रुप के एडम गिलमोर तो मोदी की जोरदार जीत की स्थिति में इसके 40-45 रुपया प्रति डॉलर तक पहुंच जाने की बात कह...

मुक्त बाज़ार और नैतिक चरित्र

Morality of Marketक्या मुक्त बाज़ार हमारी नैतिकता पर प्रश्न चिन्ह लगा रहा है? जाने कुछ विशेषज्ञों की राय...

अनिल पांडेय, जगदीश पंवार व अतुल चौरसिया को पहला आजादी पत्रकारिता पुरस्कार

First Azadi Award Winners

- 8 जनवरी को दिल्ली के पांच सितारा होटल में आयोजित समारोह के दौरान किए गए सम्मानित

- एटलस ग्लोबल इनिसिएटिव के वाइज प्रेसिडेंट टॉम जी. पॉमर ने ट्रॉफी प्रदान कर किया सम्मानित

पूरी जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें.

आज़ादी ब्लॉग

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सोमवार, अप्रैल 14, 2014
मुझे नहीं लगता कि यह कहना अतिश्योक्ति होगा कि हमारा इतिहास, महंगाई और मुद्रा स्फीति का इतिहास रहा है। वह मुद्रा स्फीति जिसका सृज...

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मंगलवार, फरवरी 18, 2014
जब तक सरकारें सीमित नहीं होंगी, जनता को सही मायने में स्वतंत्रता प्राप्त नहीं हो सकती...   - रोनॉल्ड रीगन (पूर्व अमेरिक...

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सोमवार, फरवरी 17, 2014
दुनिया में अल्पकालीन सरकारी कार्यक्रमों जितनी स्थायी चीज कुछ और नहीं हो सकती... - मिल्टन फ्रीडमैन  

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गुरूवार, फरवरी 13, 2014
व्यवसाय में सरकारी "सहायता" उतना ही त्रासदीपूर्ण है जितना कि सरकारी "उत्पीड़न"...सरकार केवल एक ही तरीके से राष्ट्र की समृद्धि मे...

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सोमवार, फरवरी 10, 2014
निर्धन लोगों के साथ असल त्रासदी, दरअसल उनकी आकांक्षाओं की विपन्नता है ः एडम स्मिथ

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