भारतीय ग्लेशियरों पर आईपीसीसी के दावों की कलई खुली - स्वामीनाथन एस. अंकलेसरिया अय्यर

क्लाइमेटगेट-1 ने यह खुलासा किया था कि ईस्ट एंजेलिया यूनिवर्सिटी में ग्लोबल वार्मिंग के खिलाफ जंग छेड़ने वाले जलवायु वैज्ञानिकों ने किस तरह से अपने खिलाफ जाने वाले आंकड़ों को रोककर शैक्षिक पत्रिकाओं में अपने खिलाफ आवाज उठाने वालों का गला घोंटने की कोशिश की थी। क्लाइमेटगेट-2 ने एक और सनसनीखेज खुलासा किया है कि जलवायु परिवर्तन पर अंतरराष्ट्रीय पैनल (आईपीसीसी) ने 2007 की रिपोर्ट में हिमालय के ग्लेशियरों के 2035 तक पिघलने का जो दावा किया था वह विज्ञान नहीं बैठे ठाले अंधेरे में चलाया गया एक तीर था।

इस खुलासे ने फिर एक बार यह जाहिर कर दिया है कि जलवायु परिवर्तन पर अंतरराष्ट्रीय पैनल (आईपीसीसी) कितने अधिक पूर्वाग्रहों से ग्रस्त है कि उसे इस कपट को उजागर करने में ही दो साल लग गए। जबकि ग्लोबल वार्मिंग के खिलाफ किसी भी कपट का वह महज दस सैकंड में भांडाफोड़ कर देता है। आईपीसीसी खुद को रास आने वाली हर बात को बिना किसी जांच-परख के गले उतारने के लिए तैयार है, जबकि असुविधाजनक बात के खिलाफ हजारों तकनीकी आपत्तियां खड़ी कर देता है। यह धर्मयुद्ध है, कोई उद्देश्यपरक विज्ञान नहीं। विरोधियों की आवाज को जिस तरह से कुचल दिया जाता है वह तो स्पेन के धर्मांध दौर की याद ताजा कर देता है। क्लाइमेटगेट-2 हरित साम्राज्यवाद का भी एक दुखद उदाहरण है। विदेशी वैज्ञानिकों के शोध पर ही भरोसा करने की बजाय भारत के पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने हिमालय के पिघलने की प्रक्रिया को जांचने के लिए एक विशेषज्ञ पैनल का गठन किया। "मेरी चिंता का कारण पश्चिम के वैज्ञानिकों के खुलासे हैं..वक्त आ गया है जब भारत हिमालय के इको-सिस्टम की दशा और दिशा को जानने के लिए समय दे।" वी.के. रैना की अध्यक्षता वाले भारतीय पैनल ने हिमालय के 25 ग्लेशियरों को लेकर जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया द्वारा इकट्ठा किए गए 150 वर्षों के आंकड़ों को खंगाल डाला। इस इलाके का यह पहला समग्र अध्ययन था। इसका निष्कर्ष यह निकला कि हिमालय के ग्लेशियरों का पीछे हटने का सिलसिला काफी वक्त से चल रहा है और इसमें हाल के वक्त में कोई उल्लेखनीय तेजी देखने को नहीं मिली है। ऐसी कोई आशंका भी नहीं है कि इनका अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा। संक्षेप में आईपीसीसी ने 2035 तक इनके पिघलने के जो दावे किए थे वे बिना किसी वैज्ञानिक आधार के महज अफवाह से ज्यादा कुछ नहीं थे।

गंगोत्री ग्लेशियर के खतरनाक तरीके से पीछे हटने के आईपीसीसी के दावे पर रैना पैनल ने कहा कि गंगा का यह स्रोत सबसे तेजी से 1977 में पीछे हटा था और आज यह "हकीकत में जस का सत है।" रैना ने कहा कि पश्चिमी वैज्ञानिकों ने दरअसल गलती यह कर दी कि "उन्होंने दुनिया के दूसरे इलाकों के ग्लेशियरों के आकार में हो रही कमी की दर को भारत के संदर्भ में भी लागू कर दिया। अलास्का में स्थित अमेरिका के सबसे ऊंचे ग्लेशियर भी हिमालय के सबसे निचले हिस्से की तुलना में कम हैं। हमारे 9500 ग्लेशियर ज्यादा ऊंचाई पर स्थित हैं। हमारा जलवायु तंत्र बिलकुल ही भिन्न है।"

स्वाभाविक ही था कि जयराम रमेश की बात की पुष्टि हो गई। लेकिन रैना की रिपोर्ट आईपीसीसी की सार्वभौमिक और नोबल पुरस्कार दिलाने वाली ख्याति को खतरा बन गई। आईपीसीसी के अध्यक्ष राजेंद्र पचौरी ने द गार्डियन अखबार से कहा, "हमें इस बात का बिलकुल स्पष्ट ज्ञान है कि क्या हो रहा है। मुझे समझ में नहीं आ रहा कि आखिर मंत्री महोदय इस प्रमाणरहित रिसर्च पर क्योंकर यकीन कर रहे हैं। यह बेहद दंभी बयान है।" उन्होंने रैना की रिपोर्ट को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि इसकी "विशेषज्ञों द्वारा समीक्षा" नहीं की गई है और इसमें गिनती की "वैज्ञानिक नजीरें हैं।" उन्होंने तो यह कहकर हद ही कर दी कि यह "स्कूली बच्चों के स्तर का विज्ञान" है।

चलिए यही सही आखिर स्कूल के बच्चे ने ही सबको बता दिया कि सम्राट ने कपड़े नहीं पहने हैं। अब हम जान गए हैं कि आईपीसीसी के ग्लेशियरों को लेकर किए गए दावे एक कपट से ज्यादा कुछ नहीं थे। यह जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर सैयद हसनैन की 1999 में की गई एक अव्यवहारिक टिप्पणी पर आधारित थे। कुछ पर्यावरण संबंधी प्रकाशन बिना किसी पुष्टि के इसका प्रकाशन करते रहे।

गॉबेल्स ने कहा था कि एक झूठ को कई बार दोहराते रहो तो लोग उसे ही सच समझने लगते हैं। ग्लेशियर को लेकर आईपीसीसी का फ्लॉप शो इसी का ताजा उदाहरण है। वैज्ञानिकों से किसी भी काल्पनिक दावे पर कड़े सवाल उठाने की ही अपेक्षा की जाती है। इसकी बजाय, आईपीसीसी ने बिना किसी पुष्टि के हिमालय के ग्लेशियरों के पिघलने के दावे को स्वीकार लिया। ऊपर से अपनी 2007 की रिपोर्ट में इसे बढ़ा-चढ़ाकर पेश भी कर दिया। पचौरी ने हसनैन को टेरी में सीनियर फेलो के तौर पर नियुक्त किया। दोनों ने मिलकर टेरी में ग्लेशियरों पर रिसर्च के नाम पर अंतरराष्ट्रीय दानदाताओं से लाखों डॉलर की राशि वसूली। लेकिन, जब क्लाइमेटगेट-2 सामने आया तो पचौरी ने साफ कह दिया कि हसनैन ने जो भी कहा था उसके लिए वो जिम्मेदार नहीं हैं! हसनैन ने भी, खिसियाते हुए कहा कि आईपीसीसी को उनके कमेंट का उल्लेख करने की कोई जरूरत नहीं थी।

चर्चा है कि पचौरी ने एक टेलीफोन इंटरव्यू में कहा, "हम मामले को परख रहे हैं और तथ्यों की पड़ताल के बाद ही रिपोर्ट पर कोई टिप्पणी कर पाएंगे। विज्ञान बदलता नहीं है-पूरी दुनिया में ग्लेशियर पिघल रहे हैं और हिमालय में स्थित ग्लेशियर कोई अलग नहीं हैं। जब तक हम आकलन नहीं कर लेते हम अपनी बात बदलने वाले नहीं हैं।"

वास्तविकता में तो हकीकत को कोई अस्वीकार कर रहा है तो वह हैं पचौरी। वो ग्लेशियर के खुलासे के कपट साबित होने के बाद भी उस पर अड़े हुए हैं। जब रैना पैनल ने ग्लेशियर पिघलने के शोध को ठोस वैज्ञानिक सबूतों के साथ चुनौती दी तो पचौरी ने इसे स्कूली छात्रों वाला विज्ञान कहकर खारिज कर दिया। वे यह बात भी दोहराते रहे कि पैनल की रिपोर्ट को विशेषज्ञों ने नहीं जांचा है। फिर भी वह ग्लेशियरों के पिघलने पर स्कूली छात्रों जैसे आईपीसीसी के खुलासों पर मोहर लगाते रहे। आईपीसीसी के दूसरे सदस्यों का भी यही हाल था। उनकी विशेषज्ञों की पारखी नजर से गुजरने वाले विज्ञान की बातें कुछ और नहीं अपनी सुविधा के लिहाज से की गई गलत बात थी।

इस समूचे फर्जीवाड़े के जिम्मेदार आईपीसीसी वैज्ञानिकों को इस्तीफा देना ही चाहिए। 2007 आईपीसीसी रिपोर्ट में माफीनामे के साथ ही संशोधन किया जाना चाहिए। सभी पर्यावरण प्रेमी एनजीओ-मेरे लिए सम्मानित द सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट सहित-ने रैना पैनल के खिलाफ आईपीसीसी का साथ दिया है। उन्होंने हमारे अपने वैज्ञानिकों के हिमालय के बारे में जानकारी की बजाय पश्चिमी वैज्ञानिकों की कम जानकारी को ज्यादा तवज्जो दी।

स्टालिन ने इन भारतीयों को पश्चिमी साम्राज्यवादियों के इशारों पर नाचने वाले एजेंटों (lackeys) की संज्ञा दी होती। इस बार तो मेरे लिए भी स्टालिन से असहमत होना मुश्किल ही होता। ये पर्यावरणप्रेमी समूह खुद को सभ्य समाज के रखवाले बताते हैं और अधिकतर वे अच्छा काम भी करते हैं। लेकिन इस मामले में उन्होंने एक कपट को दो साल तक बिना किसी विरोध के सहर्ष स्वीकारा।

ग्लेशियरों को लेकर चेतावनी कोई नई बात नहीं है। ग्रीनपीस ने तो एक बार अर्जेंटीना के उपासला ग्लेशियर के सिकुड़ते रुप का फोटो छापकर इसे ग्लोबल वार्मिंग की करतूत करार दिया था। लेकिन जब मैंने खुद वह ग्लेशियर देखा तो मुझे बताया गया कि ग्लेशियर के पीछे हटने में ग्लोबल वार्मिंग की भूमिका बहुत कम है और इसके लिए ज्यादा जिम्मेदार स्थानीय परिस्थितियां ही हैं।

दक्षिणी एंडीज के बर्फीले इलाकों से निकलने वाले ग्लेशियरों में से उपासला जहां पीछे हट रहा था तो पेरितो मोरेनो का इलाका बढ़ रहा था और कुछ अन्य जस के तस थे। ऐसे विविधता भरे परिणामों ने मामले के ग्लोबल वार्मिंग नहीं जलवायु और पर्यावरण की स्थानीय परिस्थितियों की भूमिका के संकेत दिए थे।

क्या ग्रीनपीस इस बात को मानेगा? कोई संभावना ही नहीं। लेकिन अगर आईपीसीसी, क्लाइमेटगेट-2 में संशोधन करना चाहती है तो यह ग्लेशियरों के पिघलने के मामले में माफी मांगकर शुरुआत कर सकती है। उससे उसकी वैज्ञानिक विश्वसनीयता फिर से स्थापित होने में मदद मिलेगी।

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