आईपीएल विरोध का अर्थ पूंजीवाद विरोध नहीं
आईपीएल छह हफ्तों तक चली नॉन स्टॉप पार्टी की तरह था। भारत के लाखों-करोड़ों लोगों के लिए आईपीएल की जादुई रातें रोजमर्रा की जिंदगी में राहत देने वाली थीं। सट्टा बाजार भी इससे अछूता नहीं रहा। ललित मोदी के आईपीएल कमिश्नर पद पर बने रहने के कयासों की कीमत बीते शनिवार ही एक के बदले साढ़े पांच रुपए थी।
आईपीएल यकीनन नए भारत का प्रतीक है, लेकिन अब यह मुश्किलों से घिर चुका है। शशि थरूर और ललित मोदी के बीच शुरू हुई मामूली कहासुनी का नतीजा अंतत: यह निकला कि मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा और आईपीएल कमिश्नर को निलंबित कर दिया गया। इस दौरान उठे विरोध के स्वर में निश्चित ही एक पूंजीवाद विरोधी स्वर भी था। इससे भारत जैसे देश में बाजार की वैधता एक बार फिर सवालों के दायरे में आ गई है, जहां पूंजीवाद अब भी जगह तलाशने की कोशिश कर रहा है।
सबसे तीखे स्वर उन सांसदों के थे, जो संयुक्त संसदीय समिति द्वारा पूरे मामले की जांच किए जाने की मांग कर रहे थे। कुछ राजनीतिक दलों ने आईपीएल के राष्ट्रीयकरण की भी मांग कर डाली। कुछ ने कहा कि इस पर प्रतिबंध लगा दिया जाए। कुछ ने बीसमबीस क्रिकेट को ही एक मजाक बताते हुए खिलाड़ियों की खरीद-फरोख्त की प्रवृत्ति पर रोक लगाने की बात कही। लेकिन आईपीएल का मूल्यांकन किस आधार पर किया जाए?
यहां हमें विदुर नीति का इस्तेमाल करना चाहिए, जो हमेशा सामान्य हितों को ध्यान में रखती थी। खिलाड़ी और प्रशंसक क्रिकेट के दो आधार स्तंभ हैं। आईपीएल ने जहां एक तरफ कई युवा खिलाड़ियों को प्रतिभा दिखाने का मौका दिया, वहीं दर्शकों का भी इसने भरपूर मनोरंजन किया।
मात्र तीन वर्षो में आईपीएल की ब्रांड वेल्यू को बुलंदियों तक पहुंचा देने वाले ललित मोदी भी एक बेहतरीन उद्यमी साबित हुए हैं। विदुर नीति के आधार पर अगर आईपीएल का आकलन करें तो यह पूरी तरह खरा ही साबित होगा। लेकिन इसके सामने कुछ गंभीर समस्याएं भी हैं।
मैच फिक्सिंग और नीलामियों में हुई अनियमितताओं के आरोपों के साक्ष्य जुटाए जाने चाहिए। सभी सौदों के ब्यौरे सार्वजनिक किए जाने चाहिए। मोदी के भाग्य का फैसला व्यक्तिगत नापसंदगी की बजाय सबूतों के आधार पर हो। बीसीसीआई भी जांच के दायरे के बाहर नहीं है और जहां तक सट्टेबाजी का सवाल है तो खेलों से जुड़े सट्टे को वैध क्यों नहीं घोषित कर दिया जाता। आखिर तब इससे सरकार को खासा राजस्व मिलेगा और सट्टे से अंडरवर्ल्ड के रिश्ते भी घटेंगे।
भारतीय वर्ण व्यवस्था में वैश्यों को तीसरा दर्जा प्राप्त था। वही प्रवृत्ति आज भी बरकरार है और आईपीएल में लगे भारी पैसे पर मचे शोर-शराबे के पीछे भी यही रवैया है। आईपीएल की पूंजीवादी विचारधारा की आलोचना करने में राजनेताओं के साथ ही पत्रकार और बुद्धिजीवी भी आगे रहे हैं।
पश्चिम में पूंजीपतियों के प्रति हेय धारणा मध्ययुग के खत्म होते-होते ही बदल सकी थी, जबकि भारत १९९१ के बाद ही पूंजीवादी व्यवस्था से जुड़ सका। चूंकि भारत में लोकतंत्र पूंजीवाद से पहले ही आ चुका था, इसलिए पूंजीवाद की आलोचना १९९१ से काफी पहले से ही होती रही है।
बहरहाल एक पूंजीवादी खेल में खिलाड़ियों को तब तक मर्यादा में रहना होगा, जब तक भारत में पूंजीवाद स्थापित नहीं हो जाता। आईपीएल की अनियमितताओं से इसमें मदद नहीं मिलने वाली, लेकिन यह सुखद है कि आईपीएल की आलोचनाएं कमोबेश रचनात्मक ही रही हैं। लेकिन यह चुनौती अब भी बरकरार है कि ललित मोदी जैसों के जज्बे को खत्म किए बिना बाजार में पारदर्शिता का माहौल कैसे पैदा किया जाए।
आईपीएल के विरोध की आवाजों में निश्चित ही एक पूंजीवाद विरोधी स्वर था। इससे भारत जैसे देश में बाजार की वैधता एक बार पुन: सवालों के दायरे में आ गई है। भारतीय वर्ण व्यवस्था में वैश्यों को तीसरा दर्जा प्राप्त था। वही प्रवृत्ति आज भी बरकरार है।
- साभार: दैनिक भास्कर

yes this is a absolute form