हादसों भरा सफर...

अगर बढ़ते सड़क हादसों पर गौर करें तो पता चलता है कि जहां संपन्नता आने से वाहनों की संख्या में इजाफा हुआ है वहीं आधुनिक जीवनशैली के चलते जीवन में तनाव भी बढ़ा है। इसी के कारण विशेषज्ञ मानते हैं कि सर्वाधिक हादसे दोपहर और शाम के बीच होते हैं। यानी जरूरत जहां ट्रैफिक नियमों को और अधिक सख्त करने की है तो लोगों में वाहन चलाने को लेकर जागरूकता पैदा करना भी समय की खास जरूरत है।

अगर लगभग तीन दशक पहले की बात की जाए तो उन दिनों भारत में लगभग 50 लाख कारें हुआ करती थीं, जिनकी संख्या अब लगभग 7.5 करोड़ पहुंच गई है। इसी को देखते हुए सड़क हादसों के बढ़ने की बात कही गई थी। एक रिपोर्ट में अनुमान भी लगाया गया था कि सड़क दुर्घटनाओं में 8 फीसदी सालाना की हिसाब से वृद्धि हो रही है, ऐसे में सड़क हादसों के 2015 तक 2,00,000 सालाना तक पहुंचने की बात कही गई थी।

हाल ही में, नेशनल क्राइम रिकॉडर्स ब्यूरो (एनसीआरबी) की एक रिपोर्ट में जानकारी दी गई है कि भारत में हर एक घंटे में 14 लोग सड़क हादसों का शिकार हो रहे हैं। यानी कुछ साल पहले लगाया गया अनुमान ठीक दिशा में बढ़ता लगता है। वर्ष 2007 में जहां हर घंटे में 13 लोगों की मौतें हो रही थीं, जो अब बढ़ चुकी हैं। रिपोर्ट के मुताबिक 2003 में सड़क हादसों में जहां 84,430 मौतें ही हुआ करती थीं, वे अब बढ़कर 1.18 लाख पर पहुंच गई है। इसमें यह भी कहा गया है कि अधिकतर सड़क हादसों के लिए ट्रक/लॉरी और टू-व्हीलर ज्यादा जिम्मेदारा हैं, यानी 40 फीसदी हादसे इन्हीं की वजह से होते हैं। अगर हादसों के समय की बात करें तो रिपोर्ट कहती है कि दोपहर 3-6 बजे का समय हादसों की दृष्टि से सबसे संवेदनशील रहता है। इसी तरह सुबह तड़के भी अधिकतर हादसे होते हैं।

  • बढ़ते हादसों पर सरकार किस तरह लगाम कस सकती है?
  • क्या बढ़ते सड़क हादसों के लिए आप आधुनिक जीवन शैली से जुड़े तनाव को जिम्मेदार मानते हैं?
  • आधुनिक समाज की इस त्रासदी से निपटने के लिए आप क्या उपाय सुझाते हैं?
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