औरतों की स्थिती में सुधार का प्रस्ताव

हाल में योजना आयोग ने एक ऐसा प्रस्ताव रखा है, यदि उसे सरकार ने मान लिया तो भारतीय समाज में न सिर्फ स्त्री की सामाजिक-आर्थिक हैसियत बढ़ेगी, बल्कि वह पति-पत्नी के रिश्ते में आमूल परिवर्तन भी ला सकता है।

योजना आयोग का वीमेंस एजेंसी एंड एमपॉवरमेंट नामक वर्किंग ग्रुप संपत्ति का अधिकार संबंधी एक ऐसा समग्र कानून चाहता है, जिसमें पति-पत्नी के बीच अलगाव होने या परित्याग की सूरत में दोनों के बीच कुल संपत्ति का बंटवारा बराबर-बराबर हो।

एक ऐसा कानून हो, जिसके तहत पति और पत्नी जो भी संपत्ति चाहे वह चल हो या अचल हासिल करें, उस पर दोनों का समान अधिकार हो। वह जायदाद साझा जायदाद होगी। इस कानून के दायरे में सिर्फ वैवाहिक जोड़े ही नहीं होंगे, बल्कि लिव इन रिलेशनशिप भी इसमें शामिल रहेगा और यह सभी समुदायों पर लागू होगा। इस पैनल के मुताबिक पारिवारिक कानूनों की समीक्षा होनी चाहिए और कानून में स्त्री को पति के समान भागीदारी वाली पहचान मिलनी चाहिए।

दरअसल, ऐसे कानून की दरकार लंबे समय से महसूस की जा रही है। अगर योजना आयोग के प्रस्ताव पर अमल हुआ और कानून बन गया तो औरतों को कितना लाभ होगा, बहस का एक पहलू यह भी है। विवाह नामक संस्था की एक कड़वी हकीकत यह है कि विवाह के बाद पति और पत्नी कहने को बराबर के भागीदार हैं, मगर सच यह है कि दोनों की आर्थिक हैसियत एक सी नहीं होती, आर्थिक विषमता बनी रहती है और यह विषमता औरत के सामाजिक दर्जे पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालती है।

हिंदू विवाह कानून 1955 में लागू हुआ और 2003 तक इसमें कई संशोधन भी किए जा चुके हैं। पितृसत्तात्मक/पुरुष प्रधान सामाजिक व्यवस्था विवाह नामक संस्था में पत्नी को पति के बराबर आर्थिक अधिकार देने से रोकती है। औरतों के प्रति ऐसी सामाजिक जड़ता की कीमत उन्हें ही सबसे अधिक चुकानी पड़ती है। दहेज के नाम पर औरतों से उनका संपत्ति में अधिकार छीन लिया गया। यह एक तरह की स्त्री विरोधी साजिश ही है। अंग्रेजी शासन के दौरान भूमि बंदोबस्त अभियान व संपत्ति संबंधी कानूनों में बहुत से स्त्री विरोधी फेरबदल किए गए।

प्रमुख बदलाव मातृवंशी परिवारों को पितृवंशी संपत्ति वितरण प्रणाली की ओर धकेलना और परंपरागत सामूहिक पारिवारिक संपत्ति को निजी संपत्ति में बदल दिया जाना था। दहेज, प्रति 1000 बालकों पर 914 बालिकाओं का आंकड़ा समाज में उनकी कमजोर स्थिति को दर्शाता है। महिलाओं के नाम पर कितनी कम संपत्ति होती है, यह तथ्य जगजाहिर है।

योजना आयोग के विशेषज्ञों का भी मानना है कि औरत को मालिकाना हक देने से इंकार करना भी देश में महिलाओं के हीन दर्जे का एक प्रमुख कारण है। ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना का एक फोकस महिलाओं को मालिकाना हक दिलाने के लिए प्रोत्साहित करना भी था।

बेशक देश के विभिन्न राज्यों में औरत के नाम पर मकान खरीदते वक्त स्टैंप ड्यूटी में कुछ रियायत देने वाला प्रावधान भी है, मगर यहां सवाल सारी वैवाहिक संपत्ति में पत्नी को पति के समान अधिकार दिलाने का है। यह अधिकार दो पहिए वाले वाहन में भी बराबर का होगा तो कार में भी। हर वो संपत्ति जो विवाह के बाद खरीदी गई है, वह साझा संपत्ति के नाम से वर्गीकृत होगी।

ऐसे अधिकार की मांग ने वर्ष 2004 के आस-पास जोर पकड़ा, जब संपत्ति में महिला अधिकारों को इस नजरिए से समझने की कोशिश की गई कि औरत की सामाजिक-आर्थिक स्थिति में सुधार लाने के लिए वैवाहिक संपत्ति में समानता के सिद्धांत को कानून के जरिए लागू करवाना एक असरदार औजार साबित होगा।

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने 17 मार्च 2011 को लंदन में आयोजित 'वीमेन एज एजेंट ऑफ चेंज' नामक विषय पर बोलते हुए देश के महिला आंदोलन के योगदान की तारीफ की थी। उन्होंने कहा था कि देश के महिला आंदोलनों ने दहेज, महिला हिंसा, घरेलू श्रम व संपत्ति अधिकारों में भेदभाव करने वाले रिवाजों के खिलाफ अभियान छेड़ा और इन्हीं अभियानों की बदौलत कई सुधारवादी कानून बने। योजना आयोग का नया प्रस्ताव भी रेडिकल बदलाव की ओर इशारा कर रहा है। इसका काफी प्रभाव पड़ेगा।

साभार – दैनिक भाष्कर, (अलका आर्य)