कन्या की पूजा और उसी से बैर

भारत में कन्यओं को देवी माताओं का दर्जा दिया जाता है। उनकी शक्ति के रूप में पूजा की जाती है। साल में दो बार उत्तर भारत के लोग नवरात्र मनाते हैं। पूरे नौ दिन शक्ति की उपासना होती है। लेकिन इस बार की जनगणना के नतीजे देखकर क्या वे सोचेंगे कि इस कदर घट रही कन्या जन्म दर को देखते हुए मां दुर्गा के अलग - अलग रूपों की पूजने का क्या अर्थ है? सुनने में अजीब लगता है कि इन्हीं में से अधिकांश लोग पढ़े - लिखे और संपन्न होने के बावजूद घर में कन्या के जन्म लेने पर शोक मनाते हैं।

जन्म से पहले ही पता चल जाए कि बच्ची पैदा होगी तो ये उसकी जान लेने से भी नहीं कतराते। देश में 0 से 6 साल तक के बच्चों में लड़के - लड़कियों का अनुपात सबसे बुरी हालत में है। पहले 1000 लड़कों पर 927 लड़कियां थीं, जो अब केवल 914 रह गई हैं। पिछली जनगणना के नतीजों के बाद कई योजनाएं बनीं, पर यह गिरावट कम होने के बजाय और बढ़ी है। जनसंख्याविदों के मुताबिक 1000 लड़कों पर कम से कम 950 लड़कियां होनी चाहिए, पर अधिकतर राज्यों के आंकड़े इस जादुई संख्या से नीचे हैं और कम से कम 10 राज्यों में चाइल्ड सेक्स रेश्यो 900 से भी नीचे चला गया है। दमन और दीव में यह केवल 615 है, दादरा और नगर हवेली में 775। खुद देश की राजधानी में चाइल्ड सेक्स रेश्यो 868 से गिरकर 866 पर आ गया है। हरियाणा में यह दर 830 और पंजाब में 846 है। हरियाणा के ही झज्जर जिले में तो 1000 लड़कों पर मात्र 774 लड़कियां हैं, जबकि झज्जर राजधानी से मात्र 65 किलोमीटर की दूरी पर है।

मध्य प्रदेश के सबसे कम पढ़े लिखे जिले में लड़कों पर लड़कियों का अनुपात सबसे अच्छा है। जाहिर है कि शिक्षा की ऊंची दर इस बात की गारंटी नहीं कि हमारा आर्थिक, सामाजिक विकास भी हो रहा है। तकनीक का दुरुपयोग पढ़े - लिखे इलाकों की पहचान बन चुका है। महाराष्ट्र में शिक्षा की दर 83 फीसदी है लेकिन लड़कियों का अनुपात 883 है जबकि छत्तीसगढ़ में शिक्षा की दर 71 फीसदी है तो लड़कियों और लड़कों का अनुपात 964 है। यह ट्रेंड साल 2001 की जनगणना में दर्ज किया गया था जब यूपी के सबसे ज्यादा शिक्षित दस जिलों में चाइल्ड सेक्स रेश्यो 887 और सबसे पिछड़े 10 जिलों में 937 पाया गया था। गुजरात, राजस्थान, बिहार, हरियाणा और पश्चिम बंगाल का हाल भी कमोबेश ऐसा ही था।

जिस देश में हर साल पांच लाख कन्या भ्रूण मार दिए जाते हों वहां लड़कियों की सामाजिक हैसियत सुधरने की उम्मीद कैसे की जा सकती है? मेडिकल टर्मिनेटेड प्रेग्नेंसी (एमटीपी) भी इसकी बड़ी वजह है। दिल्ली में पिछले साल अप्रैल से लेकर दिसंबर तक 20,000 महिलाओं ने एमटीपी कराई। क्या उन्होंने ऐसा इसलिए किया कि भ्रूण को कोई असामान्य परेशानी थी, मां का शारीरिक या मानसिक स्वास्थ्य ठीक नहीं था या गर्भनिरोधक नाकाम रहा था। नहीं। एक्सपर्ट कहते हैं 80 फीसदी मेडिकल अबॉर्शन कन्या भ्रूण के ही होते हैं। किस मेडिकल ग्राउंड पर इसकी इजाजत दी जाती है, कोई नहीं जानता। इस मामले में महिला डॉक्टर से लेकर प्रेग्नेंट महिला के परिवार वाले तक बराबर के दोषी होते हैं।

गुजरात, महाराष्ट्र और बंगाल में लोग छोटा परिवार चाहते हैं और बेटी को बुरी नहीं मानते। लेकिन कम से कम एक बेटा होना उन्हें जरूरी लगता है। पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में ऐसे लोगों की कमी नहीं जो किसी की पहली संतान बेटी होने पर अगली बार बेटा होने का आशीर्वाद देते हैं और अगली बार भी बेटी हुई तो दिलासा देने आते हैं। अस्पताल में बेटी होने पर बधाई नहीं मांगी जाती, लेकिन बेटा होने की खबर आते ही जश्न की तैयारियां होने लगती हैं। अगर कोई बेटी के जन्म पर खुश होना चाहे तो समाज उसे ऐसा नहीं करने देता। क्या जन्म के बाद बेटे और बेटी के बीच भेदभाव कम करने की किसी कोशिश को सराहा जाता है? ऐसा होने लगे तो अगली जनगणना में बेहतर नतीजों की उम्मीद की जा सकेगी।

नई जनगणना के आंकड़े आने के बाद सरकार चाइल्ड सेक्स रेश्यो से कुछ चिंतित दिखाई दे रही है। खबर है कि पीएससी - पीएनडीटी ऐक्ट - 1994 के तहत केंद्रीय निगरानी बोर्ड को पुनर्गठित किया गया है। बोर्ड की पहली बैठक मई की शुरुआत में होगी। उम्मीद करें कि इस मीटिंग में कुछ ठोस कदम उठाने पर सहमति बनेगी। लेकिन सिर्फ सरकार के भरोसे बैठने से कुछ नहीं होने वाला। समाज का अंग होने के नाते हर व्यक्ति इस दिशा में सकारात्मक कदम उठाने का फैसला करे, तभी इस बिगड़ते अनुपात को संभाला जा सकेगा।

- मो. सलीम मजीद