लोकतंत्र पर कैसी लगाम

महातिर मोहम्मद अकेले नहीं हैं, जिन्हें लगता है कि भारत में ‘जरूरत से ज्यादा’ लोकतंत्र है। मलयेशिया के पूर्व प्रधानमंत्री के इस बयान से आवाज मिलाते हुए केंद्रीय मंत्री फारूक अब्दुल्ला ने यह जरूरत बता दी है कि अब देश में अनियंत्रित लोकतंत्र को अपनाने का समय आ गया है।

ऐसा सोचने वालों को लगता है कि अगर लोकतंत्र पर लगाम कस दी जाए, तो फैसले लेना आसान हो जाएगा और विकास की राह में रुकावटें नहीं आएंगी। फिर जैसाकि महातिर ने कहा, भारत चीन की बराबरी कर सकता है।

इस सोच में विकास का क्या मतलब है, इसे अगर समझना हो, तो महातिर की यह अगली टिप्पणी सहायक हो सकती है कि आरंभ में समाजवाद की तरफ झुकाव भारत के आर्थिक विकास में बाधक बनता रहा और जब 1991 में बाजार सुधारों को अपनाया, तब से लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं प्रगति की रफ्तार धीमी करती रही हैं।

यानी विकास का समाज के व्यापक कल्याण से कोई संबंध नहीं है और जब ऐसा नहीं है, तो फिर आम लोगों की राय क्या मायने रखती है? चीन में कम्युनिस्ट पार्टी के बॉस फैसले लेते हैं, फिर ‘आयरन हैंड’ से उन्हें लागू कर देते हैं।

मगर विकास की यह धारणा अब पूरी दुनिया में पुरानी पड़ गई है। अमत्र्य सेन और महबूब-उल हक जैसे मनीषियों की बौद्धिक मेहनत से आज लोगों की स्वतंत्रता एवं चयन के विकल्पों में विस्तार विकास की परिभाषा में सबसे अहम पहलू बन गए हैं। हम भारतीयों को इस पर गर्व है कि हमारी नीतियां बहस और सहमति से तैयार होती हैं और जनता की मुहर से उन्हें वैधता प्राप्त होती है।

इस प्रक्रिया को संपूर्ण एवं दोषमुक्त बनाना हमारा लक्ष्य है, क्योंकि सिर्फ इसी से हर नागरिक के जीवन की गरिमा और विकास के टिकाऊपन को सुनिश्चित किया जा सकता है। इसलिए हमें अनियमित और अनियंत्रित लोकतंत्र ही चाहिए। इसकी विरोधी-अभिजात्यवादी सोच को यह देश सिरे से नकारता है।

साभार: दैनिक भास्कर