जाति का चक्कर क्यूँ

पिछले साल ‘सबल भारत’ के आंदोलन ‘मेरी जाति हिंदुस्तानी’ ने देश में कुछ ऐसी जागृति फैलाई कि सरकार को जनगणना से जाति को बाहर करना पड़ा। इस आंदोलन के पास न जन-शक्ति थी, न धन-शक्ति और न ही मीडिया-शक्ति। सिर्फ विचार-शक्ति ने हमारे राजनीतिक नेताओं को जरा हिलाया, जगाया और दोबारा सोचने पर बाध्य किया। हड़बड़ी में किए गए इस निर्णय को उन्होंने वापस लिया और केंद्र सरकार ने उन सहयोगी दलों के आगे घुटने नहीं टेके, जो अपने संकीर्ण स्वार्थों के लिए इस देश को जातिवादी खाई में गिराने का संकल्प ले चुके थे। सरकार की इस दृढ़ता और चतुराई की जितनी सराहना की जाए, कम है।

लेकिन अब जनगणना के दूसरे दौर में सरकार दोबारा जाति का चक्कर चला रही है। उसने घोषणा की है कि देश के गरीबों की गणना करते समय उनकी जाति पूछी जाएगी इस घोषणा का क्या यह अर्थ माना जाए कि जो गरीब नहीं है यानी जो गरीबी रेखा के नीचे नहीं हैं, उनकी जाति नहीं पूछी जाएगी? यदि ऐसा है तो यह भी उल्लेखनीय राहत है, क्योंकि अलग-अलग अनुमानों के अनुसार देश में गरीबों की संख्या 40 करोड़ से ज्यादा नहीं है। यदि अर्जुन सेनगुप्ता की परिभाषा मानें तो यह संख्या 80 करोड़ तक पहुंच जाएगी लेकिन स्वर्गीय सेनगुप्ता की बात कौन मानने वाला है। अभी तो सरकार की कोशिश यही है कि गरीबों की संख्या कम से कम दिखाई जाए। यदि ऐसा करने में सरकार सफल हुई तो इसका एक सुफल यह भी होगा कि देश के लगभग 90 करोड़ लोगों की जाति नहीं पूछी जाएगी, क्योंकि वे गरीबी रेखा के नीचे नहीं होंगे। यानी जातिवादी दुर्गंध फैलेगी जरूर लेकिन वह ज्यादातर लोगों तक नहीं पहुंचेगी।

प्रश्न यह है कि जिन गरीबों को जातिवादी कीचड़ में लपेटा जाएगा, उससे उनका फायदा क्या होगा? किसी की जाति का गरीबी से क्या लेना-देना? एक ही जाति में गरीब और अमीर दोनों होते हैं। भारत में एक ही जाति ऐसी नहीं है, जिसमें सब के सब लोग अमीर हों या सबके सब गरीब हों। यदि आप सच्चा न्याय करना चाहते हों तो आपके पास आंकड़े भी सच्चे होने चाहिए। जाति पूछने का अर्थ है, व्यक्तिगत सच्चाई को आप सामूहिक कल्पना से ढंकना चाहते हैं। जो व्यक्ति जैसा है, उसे आप वैसा ही क्यों नहीं जानना चाहते? वह व्यक्ति है या जानवर? जैसे मवेशियों को थोक में गिना जाता है, वैसे ही आप मनुष्यों को भी गिनना चाहते हैं। उन्हें उनके नाम और गुण से नहीं सिर्फ संख्या से जानना उन्हें इंसान से जानवर बनाना है।

यह गणना अवैज्ञानिक भी है। यदि हम लोगों की गरीबी दूर करना चाहते हैं तो क्या यह जानना काफी नहीं है कि वे गरीब हैं या नहीं या वे कितने गरीब हैं। जो भी गरीब है, उसकी गरीबी दूर कीजिए। आप जाति किसलिए पूछ रहे हैं। घाव पर नमक क्यों छिड़क रहे हैं? आप गरीबी मिटाना चाहते हैं या जात मिटाना चाहते हैं? यदि जाति को मिटाने के लिए जाति पूछ रहे हैं तो बहुत अच्छी बात है लेकिन जाति इसीलिए पूछी जाएगी कि उसका फायदा चुनावों में उठाया जाएगा। जातियों को फुसलाकर उनसे मवेशियों की तरह थोकबंद वोट डलवाए जाएंगे। उन्हें आपस में लड़वाया जाएगा। सुविधाओं और विशेषाधिकारों की बंदरबांट का खेल खेला जाएगा। सिर्फ गरीबी को पूछने से गरीबी मिटेगी लेकिन जाति को पूछने से जात मिटेगी नहीं। बढ़ेगी? क्या किसी सबल और स्वस्थ राष्ट्र के लिए यह शुभ होगा? गरीबी मिटाने के लिए जात पूछना ऐसा ही है, जैसे कोई बाल कटवाने के लिए जाए और अपने दांत उखड़वा कर लौट आए।

इसके अलावा सरकारी विज्ञाप्ति में यह भी कहा गया है कि किसी से भी अपनी जाति प्रमाणित करने के लिए नहीं कहा जाएगा। जो अपनी जाति जो भी लिखाएगा वहीं मान ली जाएगी। अगर यही हुआ तो प्रत्येक व्यक्ति अपनी जाति ‘अनुसूचित’ क्यों नहीं लिखवाएगा? यों भी अंग्रेज ने 1931 में जाति जनगणना इसलिए भी बंद की थी कि उसकी ठीक-ठीक गणक को उसने असंभव पाया था। हर जनगणना में जातियों की संख्या सैंकड़ों-हजारों गुना बढ़ जाती थी एक ही प्रांत में एक जिले में जो जाति सवर्ण होती थी, वही जाति दूसरे जिले में शुद्र हो जाती थी और एक ही जाति में इतनी उप और अति उप जातियां निकल आती थीं कि अंग्रेज जनगणना कमिश्नर का माथा चकरा गया। इस बार सरकार का कहना है कि गरीबों की जाति तो पूछी जाएगी लेकिन किसी की भी जाति बताई नहीं जाएगी। सरकार उसे छिपाकर रखेगी। उसका सामूहिक इस्तेमाल होगा।

क्या सामूहिक इस्तेमाल होगा? लोगों की गरीबी के आधार पर नहीं, जाति आधार पर मदद दी जाएगी। यदि ऐसा होगा तो उन्हें भी मदद मिलेगी, जो खुद मालदार और समर्थ होंगे लेकिन जिनकी जाति गरीब मानी जाएगी। यानी ‘मलाईदार पर्तों’ के लोगों को और ज्यादा मलाई छानने का मौका मिलेगा। वे अपने ही गरीब भाइयों का पेट काटेंगे।

मुझे तो शंका यह है कि गरीबों की गणना में जाति शायद इसीलिए जोड़ी जा रही है कि गरीबी-निवारण पर से देश का ध्यान हटाया जा सके। यह मानना कितना हास्यास्पद है कि गांवों में जिसकी आमदनी 15 रुपए रोज से ज्यादा है, वह गरीब नहीं है। सिर्फ 15 रुपए रोज में आज इंसान तो क्या पशु भी गुजारा नहीं कर सकता। असली बहस तो यह होना चाहिए कि गरीबी की रेखा कहां खींची जाए? 15 रुपए पर या 50 रुपए पर? उनकी जात क्यों पूछी जाए?

अपने वंचित और पिछड़े भाइयों को आगे बढ़ाने में हमारी आरक्षण की नीति बिल्कुल नाकारा सिद्ध हुई है। उसने जातीय विद्वेष, अयोग्यता और पिछड़ेपन को बढ़ाया है और महिमामंडित किया है। अब जरूरी है कि इस नीति में क्रांतिकारी परिवर्तन किए जाएं। नौकरियों में जाति आधारित आरक्षण पूर्णतया खत्म किया जाए और केवल शिक्षा में सभी गरीबों, ग्रामीणों, दलितों, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों और बेटियों को सिर्फ जरूरत के आधार पर 70 प्रतिशत तक आरक्षण दिया जाए। उनमें भी मलाईदार पर्तों को अलग रखा जाए। भारत को 64 साल नहीं लगेंगे, वह सिर्फ एक पीढ़ी में ही यूरोप से आगे निकल जाएगा।

- वेद प्रताप वैदिक