जल प्रदूषण की मार

पर्यावरण संबंधी तमाम अध्ययन देश में जल प्रदूषण के दिनोंदिन भयावह होते जाने के बारे में चेताते रहते हैं। अब सीएजी यानी नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ने भी इस बारे में आगाह किया है। पर्यावरणविदों की चेतावनियों की बराबर अनदेखी की गई है। इसलिए स्वाभाविक ही सवाल उठता है कि क्या सीएजी की इस रिपोर्ट को हमारी सरकारें गंभीरता से लेंगी! संसद में पेश सीएजी की ताजा रपट देश में जल प्रदूषण की भयावह स्थिति के लिए सरकार को फटकार लगाते हुए बताती है कि हमारे घरों में जिस पानी की आपूर्ति की जाती है, वह आमतौर पर प्रदूषित और कई बीमारियों को पैदा करने वाले जीवाणुओं से भरा होता है।

मुश्किल केवल घरेलू उपयोग या पेयजल तक सीमित नहीं है। विभिन्न प्रकार के रासायनिक खादों और कीटनाशकों के व्यापक इस्तेमाल ने खेतों को इस हालत में पहुंचा दिया है कि उनसे होकर रिसने वाला बरसात का पानी जहरीले रसायनों को नदियों में पहुंचा देता है। भूजल के गिरते स्तर और उसकी गुणवत्ता में कमी को लेकर कई अध्ययन सामने आ चुके हैं। इसके अलावा, शहरों से गुजरने वाली नदियां मल-जल और औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले कचरे के चलते पहले ही चिंताजनक स्तर तक प्रदूषित हो चुकी हैं।

इसे सीएजी ने भी अपनी रपट में दर्ज किया है। देश में चौदह बड़ी, पचपन लघु और कई सौ छोटी नदियों में मल-जल और औद्योगिक कचरा लाखों लीटर पानी के साथ छोडे जाते हैं। विडंबना यह है कि बेकार पानी के सिर्फ दस फीसद का प्रबंधन हो पाता है, जबकि बाकी को उसी रूप में विभिन्न जलस्रोतों में छोड़   दिया जाता है। अंदाजा लगाया जा सकता है कि नदियों, तालाबों,  झीलों को प्रदूषण-मुक्त बनाने के नाम पर अरबों रुपए के खर्च से जो कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं, उनकी असलियत क्या है।

पिछले दो दशक के दौरान केंद्र सरकार देश में विभिन्न जल प्रदूषण नियंत्रण परियोजनाओं, मसलन गंगा और यमुना कार्य-योजनाओं पर अब तक लगभग बीस हजार करोड़ रुपए खर्च कर चुकी है। लेकिन अब तक इसके कोई खास नतीजे नहीं आए हैं। उलटे दिल्ली से गुजरने वाली यमुना की जो हालत हो गई है, उसे देखते हुए सीएजी ने अपनी रपट में इसे एक ‘मृत’ नदी कहा है तो शायद इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है। कहने को केंद्र और राज्यों के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड एक दूसरे के सहयोगी हैं। लेकिन उनके नियंत्रण क्षेत्रों को लेकर ऐसी स्थिति हो गई है कि सीएजी के मुताबिक राष्ट्रीय स्तर पर इस मुद्दे पर कोई भी एजेंसी जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं हुई।

एक अध्ययन के मुताबिक बीस राज्यों की सात करोड़ आबादी फ्लोराइड और एक करोड़ लोग सतह के जल में आर्सेनिक की अधिक मात्रा घुल जाने के खतरों से जूझ रहे हैं। इसके अलावा, सुरक्षित पेयजल कार्यक्रम के तहत सतह के जल में क्लोराइड, टीडीसी, नाइट्रेट की अधिकता भी बड़ी बाधा बनी हुई है। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में करीब साठ फीसद बीमारियों की मूल वजह जल प्रदूषण है। जाहिर है, अगर समय रहते बेहतर जल प्रबंधन की दिशा में ठोस पहल नहीं की गई तो इसका खमियाजा समूचे समाज को भुगतना पड़ेगा। जल प्रदूषण नियंत्रण परियोजनाओं पर अरबों-खरबों रुपए बहाने के बजाय जरूरत इस बात की है कि कृषि और औद्योगिक क्षेत्रों में जल शोधन संयंत्रों की स्थापना और संचालन को बढ़ावा दिया जाए।

साभार: जनसत्ता