असंगठित क्षेत्र को अभी भी सुधारों का इंतज़ार

आर्थिक और जीविका संबंधी स्वतंत्रता अमीरों के लिए तो बढ़ी है पर गरीबों के लिए नहीं. कनाडा के अग्रणी विचार मंच फ्रेज़र इंस्टिट्यूट द्वारा तैयार आर्थिक स्वतंत्रता पर जारी की गयी एक रिपोर्ट (इकोनोमिक फ्रीडम ऑफ़ द वर्ल्ड रिपोर्ट-2006) के अनुसार भारत की श्रेणी 1990 में 80 से 2004 में 53 हो गयी. पर इस आर्थिक स्वतंत्रता का लाभ सभी वर्गों ने नहीं उठाया. भारत में गरीब आज भी लाइसेंस और कोटा राज में ही जीते हैं और अत्यधिक सरकारी हस्तक्षेप से परेशान रहते हैं. आज के समय में, एक फैक्ट्री या कॉल सेंटर स्थापित करने के लिए कोई सरकारी लाइसेंस की आवश्यकता नहीं है. पर यदि कोई व्यक्ति एक सड़क फेरीवाला, साइकिल रिक्शावाला, रेलवे कुली बनना चाहता है या चाय की दुकान लगाना चाहता है तो उसे लाइसेंस की ज़रुरत होती है. निचले स्तर के कामों के लिए जहां बहुत कम निवेश और कौशल की ज़रुरत होती है, वहाँ आज भी लाइसेंस अनिवार्य बने हुए हैं.

असंगठित क्षेत्र में उद्यम के लिए बने राष्ट्रीय आयोग के अनुसार, करीब 77 प्रतिशत भारतीय अनौपचारिक या असंगठित क्षेत्र मं अपने रोज़गार के लिए कार्यरत हैं. इस क्षेत्र से हमारी कुल राष्ट्रीय आय का आधे से ज्यादा हिस्सा आता है. अनौपचारिक क्षेत्र में आने वाले बहुत सारे व्यवसाय हैं जैसे रेड़ी लगाना, रिक्शा चलाना, ढाबा चलाना, नाई की दुकान लगाना आदि. इन सभी को सड़क व्यापारी कहा जा सकता है.

सड़क विक्रेता असंगठित क्षेत्र का सबसे बड़ा हिस्सा कहे जा सकते हैं पर वो सत्ताधारियों द्वारा लगातार शोषण का शिकार होते हैं और गरीबी में रहने को मजबूर रहते हैं. ये वो लोग हैं जिन्हें सीमित कौशल और डिग्रीयों के अभाव में संगठित क्षेत्र में नौकरियां नहीं मिल पाती. परन्तु फिर भी अपनी सस्ती और सुविधाजनक सेवाओं की वजह से वो परिवारों ख़ासतौर पर मध्यमवर्गीय घरो के बजट में ख़ास योगदान करते हैं. आधिकारिक तंत्र अधिकतर इन सड़क व्यापारियों को फुटपाथ पर अतिक्रमण और अन्य बाधाओं के लिए ज़िम्मेदार मानते हैं. वे इन रेड़ी वालों द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवाओं का भी मूल्य नहीं समझते. सड़क व्यापारी भारत में प्राचीन काल से रहे हैं और हमारी सामाजिक और सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा हैं. ये वही लोग हैं जिन्होंने लम्बे समय से देश की स्थानीय कला, संस्कृति और परंपरा को जीवित रखा है.

बेलाजिओ अंतर्राष्ट्रीय सड़क विक्रेता घोषणा- 1995 के अनुसार शहरीकरण से इस क्षेत्र में आई तेज़ी के के बावजूद, सड़क व्यापार पूरे विश्व में एक अनौपचारिक और असंगठित काम है. छोटे गाँव और कस्बो से जब लोग शहरों की तरफ आते हैं तो इस तरह की सीमित कौशल और श्रम आधारित कार्यों की मांग बढ़ जाती है. इस अंतर्राष्ट्रीय घोषणा के प्रतिक्रिया स्वरूप भारत में पहली नीति 2004 में निरुपित हुई. इस नीति में सड़क व्यापारियों को वैध करने की, फेरी ज़ोन स्थापित करने की और विक्रेताओं के कौशल सुधार की बात कही गयी थी. सन 2009 में एक संशोधित नीति जिसे राष्ट्रीय शहरी सड़क विक्रेता राष्ट्रीय नीति कहा जाता है संस्थापित हुई जिस में नगरीय वेंडिंग कमेटी बनाने की भी बात कही गयी.

दुःख की बात ये है कि बेलाजिओ घोषणा के बाद भी शहरी सड़क व्यापार आज भी भारत में वैध नहीं हो पाया है. ये बात नई दिल्ली मुनिसिपल कारपोरेशन बनाम सोदान सिंह केस में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले से और अधिक साबित हो जाती है. इस फैसले में कई अंतर्विरोध देखने को मिले. इस बीच कई राज्यों  ने  सन 2004 की राष्ट्रीय नीति के आधार पर  स्वयं  के नियम और नीतियां निर्धारित करनी शुरू कर दी हैं. इन में से अधिकतर राज्य आवासीय व शहरी गरीबी उन्मूलन मंत्रालय द्वारा जारी मॉडल नियम का अनुसरण कर रहे हैं. फिर भी अभी तक किसी भी राज्य ने राष्ट्रीय नीति के उद्देश्यों को पूरी तरह अमल नहीं किया है. राजस्थान सरकार ने सड़क विक्रेताओं के लिए सन 2007 में 'फेरीवालों का संसार' नामक एक नीति बनायी थी पर आज तक कई धरना प्रदर्शनों और सरकारी घोषणाओं के बावजूद इसे अमल नहीं किया गया है. फिर भी उम्मीद बनी हुई है क्यूंकि इस नीति के बिन्दुओं को इंगित लाभार्थियों, स्वयंसेवियों और बुद्धिजीवियों ने स्वीकार कर लिया है और जिन शहरों में इस नीति के शीघ्र ही अमल में आने की उम्मीद है वो राजस्थान में सड़क व्यापार को नियंत्रित और वैधानिक करने की दिशा में एक सजग प्रयास होगा.

- स्निग्धा द्विवेदी