इन अभागों का क्या दोष

दिल्ली में पिछले शुक्रवार की रात उबेर नामक कंपनी के एक टैक्सी ड्राईवर द्वारा एक कंपनी में कार्यरत महिला पर बलात्कार कर लिया गया. महिला ने बहादुरी के साथ अपना संयम खोये बगैर उस टैक्सी का फोटो अपने कैमरे पर ले लिया और शनिवार की सुबह उसने पुलिस में इस घटना की रिपोर्ट कर दी. शाम होते होते वह टैक्सी ड्राईवर मथुरा में अपने आवास से गिरफ़्तार भी हो गया. जिस संयम से उस बहादुर महिला ने अपने सम्मान से खेलने वाले को कानून के हाथों में पहुंचाया था उसके बाद वास्तव में वह महिला बुद्धिमानी से भरी बहादुरी की मिसाल बन जाना चाहिये था. टीवी पर उसकी समय सूचकता की तारीफ़ होनी चाहिये थी और बहस का केंद्र बिंदु उसका संयम और उसकी बहादुरी होनी चाहिये थी. 
 
किंतु जो कुछ देश की राजधानी में उसके बाद हुआ और टीवी पर जिस किस्म की बहस पेनलीस्ट् करते दिखाई दिए उससे हमारी व्यापार विरोधी समाजवादी कुंठा के सिवा किसी और चीज के दर्शन नहीं हुए. कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और साम्यवादी झुकाव वाले कुछ छात्र संघठन दिल्ली में धमाचौकड़ी मचाते रहे, देश के गृह मंत्री के घर के सामने उत्पात मचाते रहे और उस कंपनी के विरुद्ध कार्यवाही की माँग करते रहे जिसने उस ड्राईवर को नौकरी पर रखा था. अपना अस्तित्व जताने के लिए ये समूह कम से कम समय में कैसे बड़ी बड़ी से कुर्बानी मांगी जाये, इसकी मानो होड़ कर रहे थे. दिल्ली पुलिस ने भी उनके दबाव में आकर कुछ तकनीकि खामियों का हवाला देते हुए उबेर कंपनी के कारोबार पर तत्काल प्रभाव से बंदी लगा दी और उसके स्थानीय संचालको के विरुद्ध जाँच भी शुरू कर दी. कंपनी की जो दो सबसे भयानक भूलें बताई गयी, वह यह कि एक तो उसने ड्राईवर के चरित्र की पुलिस से पुष्टि नहीं करवाई थी और दूसरा उनकी टैक्सी पर जीपीएस प्रणाली नहीं थी. 
 
किसी भी नैतिक या क़ानूनी स्तर पर ये दो भूलें कोई ऐसा अपराध तो नहीं है कि आप हजारों टैक्सी चालकों के भविष्य से खिलवाड़ करते हुए उनके जिंदा रहने और पैसा कमाकर अपने परिवार का पालनपोषण करने के अधिकार पर ही हतौडा चला दे. लेकिन पिछले दो दिन में यही दिल्ली में हुआ. इससे फिर एक बार सिद्ध हो गया कि इस देश को कानून और संविधान नहीं, बल्कि सड़क पर उधम मचाते कुछ दंगाई और टीवी पर बहस का स्तर गिराते कुछ पेनलीस्ट् चला रहे है. 
 
अब आइये देखते है, उबेर कंपनी को पुलिस जिन दो भयानक भूलों का दोषी मानकर हजारों टैक्सी ड्राईवरों के पेट पानी पर बुलडोजर चला रही है, उन भूलों के होने या ना होने से क्या अंतर पड़ता. 
 
कंपनी पर पहला आरोप यह है कि टैक्सी पर जीपीएस प्रणाली नहीं थी. जिस देश में ९९% वाहनों पर यह प्रणाली नहीं हो और जहाँ वाहन का होना ही लोगों के स्वास्थ्य, कैरियर और व्यापारिक हितों के लिए जरुरी हो, उस देश में इसे कितनी बड़ी भूल मानना चाहिये, इसका विवेक मैं आपके हवाले करता हूँ. 
 
दूसरी भूल है कि कंपनी ने अपने ड्राईवर के चरित्र की पुलिस से पुष्टि नहीं करवाई थी. देश के समस्त विधायकों, सांसदों, न्यायाधीशों, अधिकारियों और शिक्षकों के आसपास भी महिलायें काम करती है. हम उनमें से कितने समूहों के चरित्र की पुष्टि पुलिस से करवाते हैं? भारत के अनेकों पुलिस थानों में बलात्कार की घटनाएँ हुयी है, कुछ दिनों पहले मुंबई पुलिस का एक वरिष्ठ अधिकारी पारस्कर एक अभिनेत्री के लैंगिक शोषण में निलंबित हो चुका है. देश के सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ सेवा-निवृत न्यायाधीश पर उनकी प्रशिक्षु लैंगिक दुराचरण का आरोप लगा चुकी है. देश के विधायकों, सांसदों, मंत्रियों द्वारा अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके अपनी अधिनस्थ महिलाओं का लैंगिक शोषण करने के अनगिनत आरोप पिछले वर्षों में सार्वजानिक चर्चा का विषय रहे हैं, जिनमें कुछ तो बाकायदा उनकी सजा में तब्दील हुए है. दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश के सबसे शक्तिशाली प्रमुख बिल क्लिंटन स्वयं दुष्कर्म के आरोप में पकड़े जाते बाल बाल बचे थे. देश के अनेकों विश्वविद्यालयों के पीएचडी के गाईड अपने अधीन अध्ययन कर रही शिक्षार्थियों के लैंगिक शोषण के आरोपों के साये में रहे है. कुछ की बाकायदा जाँच के बाद छुट्टी हो चुकी है. इनमें से कितने समूह अपने चरित्र का प्रमाणपत्र पुलिस से लेते है. और सबसे बड़ी बात, एक समय बिंदु पर दिया गया प्रमाणपत्र लैंगिक मामलों में भविष्य के आचरण की कितनी गांरटी दे सकता है? यदि कोई पुलिस वेरिफिकेशन प्राप्त व्यक्ति गुनाह करता है, तो हम उस पुलिसवाले को दोषी भी नहीं ठहरा सकते, जिसने पहले उसके अपराधी नहीं होने की पुष्टि की हो. 
 
इसका सीधा मतलब यही है कि येन केन प्रकारेण सरकार नाम की संस्था को मजबूत करनेवाले बीते ज़माने के इन कानूनों का सहारा लेकर केवल ईमानदारी से काम करनेवालों का शोषण किया जा सकता है, इसमें उनके चरित्र को सदा के लिए दुरुस्त रखने का कोई इंतजाम नहीं है. क्योंकि जो ये प्रमाणपत्र बाँट रहे है, वे स्वयं अपने विभाग के लोगों को ऐसे अपराधों से विरत करते में असफल रहे हैं. 
 
किसी भी मसले को अनपेक्षित मोड़ पर ले जाकर, सरकार से बड़ी से बड़ी कुर्बानियाँ माँग कर हम केवल आम जनता का शोषण बढ़ा रहे हैं. लोगों को हर छोटे मोटे व्यापार के लिए पुलिसवालों से अपने चरित्र की पुष्टि करवाने को कहना उनके शोषण को बढ़ावा देने के समान है. यह समाज को कमजोर करके तन्त्र की ताकत को बढ़ाने के समान है, यह स्वयं प्रधानमंत्री मोदीजी के सेल्फ वेरिफिकेशन के सपने को उल्टा लटकाने के समान है. 
 
मेरी चिंता का एक कारण और भी है. शायद मिडिया में काम कर रहे लोग हो या सड़कों पर नारे लगाते समूह, इनका प्रत्येक आंदोलन और बहस के तेवर गरीबों के विरुद्ध क्यों हो जाते है? जो साम्यवादी समूह ट्रेड यूनियन बनाकर अपने सदस्यों के लिए बिना काम के पैसो पर भी दावें करते हैं, कारखाने बंद होने के बाद भी वेतन भत्तों के लिए आंदोलन करते है, ज्यादा से ज्यादा सुविधा और छुट्टियों की माँग करते है, वे स्वयं रोजगार करनेवालों के विरोध में सड़कों पर आकर उधम क्यों मचाते है? क्यों वे लोग एक ड्राईवर के अपराध की सजा पूरे समूह या कंपनी के प्रत्येक कर्मचारी को देने की माँग करते है? क्यों नहीं वे सोचते कि इन अभागों के भी माँ-बाप है, बेटे बेटियाँ है, उन्हें भी इज्जत के साथ दो वक्त की रोजी कमाने का अधिकार है. उन्हें भी गरिमा और इज्जत के साथ जीने का उतना ही अधिकार है, जितना इस देश के किसी न्यायाधीश, पत्रकार, नेता, अधिकारी और पीएचडी के गाईड को है. फिर जो कानून उन पर लागु होता है, वही इन अभागों पर क्यों नहीं लागु किया जाता. 
 
जब कोई मंत्री अपराध करता है, तो हम उसके विभाग के सभी लोगों के काम तो बंद नहीं करते. जब किसी न्यायाधीश या पीएचडी के गाईड पर यह लांछन लगता है तो हम उनके साथ काम करनेवाले सभी कर्मियों को तो घर पर नहीं बिठाते, जब कोई राजनैतिक कार्यकर्ता यह अपराध करता है तो हम उनकी राजनैतिक पार्टियों की मान्यता तो रद्द नहीं करते. फिर हम एक ड्राईवर के अपराध की सजा, उनके साथ काम करनेवाले सभी लोगों को कैसे दे सकते है? हम कंपनी का काम करने का अधिकार कैसे छीन सकते है? 
 
हमारा संविधान स्तर, जन्म, और हैसियत के आधार पर किसी भी विषमता की इजाजत नहीं देता. फिर क्यों ड्राईवरों के लिए अलग कानून और समाज के अभिजात्य तबकों के लिए अलग कानून है. 
 
जिनके पास अपने चरित्र के सरकारी प्रमाणपत्र नहीं है उन सभी को आवारा, बदमाश या भावी अपराधी मान लेना किस सभ्यता की निशानी है? वे जो अपने आपको बचाने में असमर्थ है, जो विदेशी भाषा में नारेबाजी नहीं कर सकते, समूह नहीं बना सकते, उन्हें अपनी सनकी नैतिकता का शिकार बनाकर तबाह कर देना कौनसी संस्कृति का आगाज है? 
 
मेरे दोस्तों, गहराई से इस प्रश्न का उत्तर खोजिये. यदि आपको उत्तर मिल जाता है तो मुझे बताइए और मेरी पीड़ा से मुझे मुक्त कीजिए. यदि नहीं मिलता है तो इस ब्लॉग को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक भेजिए. शायद इसी माध्यम से हम उन गरीबों की कुछ मदद कर सके, जो इन सरकार वादी, साम्यवादी रुग्ण मानसिकता के लोगों के शोषण के सबसे बड़े शिकार है. 
 
शायद यही हमारे संविधान का सबसे बड़ा सम्मान होगा. 
 
 
- दिनेश शर्मा 
साभारः मुक्तिवाहिनी.ब्लॉगस्पॉट.कॉम