दलों को पारदर्शिता से परहेज क्यों

क्या राजनैतिक दलों की कार्यप्रणाली पारदर्शी होनी चाहिए? यह सवाल हमारे सामने मई 1999 से मौजूद है जब विधि आयोग ने अपनी 170वीं रिपोर्ट में इसका उल्लेख किया था। उस रिपोर्ट में कहा गया था, ‘तर्क की कसौटी पर कसें तो यदि लोकतंत्र और जवाबदेही हमारी संवैधानिक प्रणाली के केंद्रीय तत्व हैं तो यही अवधारणा राजनैतिक दलों पर भी लागू होती है और उनके लिए बंधनकारी है। यह संसदीय लोकतंत्र का अभिन्न अंग हैं। राजनैतिक दल ही सरकार बनाते हैं, संसद का गठन करते हैं और देश की सरकार चलाते हैं। इस प्रकार राजनैतिक दलों की कार्यप्रणाली में आंतरिक लोकतंत्र, वित्तीय पारदर्शिता और जवाबदेही लाना आवश्यक है। अपनी भीतरी कार्यप्रणाली में लोकतांत्रिक सिद्धांतों का सम्मान न करने वाली राजनैतिक पार्टी से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह देश का शासन चलाने में उन सिद्धांतों का सम्मान करेगी, जो कि संभव भी नहीं। ऐसा नहीं हो सकता कि इसकी भीतरी कार्यप्रणाली में तो तानाशाही हों और बाहर यह लोकतांत्रिक तरीके से काम करे।’
 
वर्ष 1999 से ही राजनीतिक दलों की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता लाने के प्रयास होते रहे हैं, लेकिन बिना किसी अपवाद के सारे ही राजनैतिक दलों ने हमेशा ही ऐसे प्रयासों का दृढ़तापूर्वक विरोध किया है। इसकी एक ताजा मिसाल दलों की ओर से सीआईसी (केंद्रीय सूचना आयोग) के आदेश की खुली अवहेलना में मिलती है। 3 जून 2013 को मुख्य सूचना आयोग और व अन्य दो आयुक्तों सहित सीआईसी की पूर्ण पीठ ने कांग्रेस, भाजपा, माकपा, भाकपा, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और बसपा को सूचना के अधिकार कानून (आटीआई एक्ट) की धारा 2 (एच) के तहत लोक संस्थाएं बताते हुए इन सभी के अध्यक्षों/महासचिवों को अपने मुख्यालयों में छह हफ्ते के भीतर केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी और अपील प्राधिकारी मनोनीत करने के निर्देश दिए थे।
 
सीआईसी की पीठ ने साथ ही यह भी कहा था कि ये केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी दलों को मिलने वाले आरटीआई आवेदनों का चार हफ्तों में निराकरण करेंगे। सीआईसी ने राजनैतिक दलों से आरटीआई एक्ट की धारा 4 (1) (बी) तहत संगठन के बारे में स्वैच्छा से सारी जानकारी मुहैया कराने को भी कहा।सीआईसी ने उक्त निर्णय इस तथ्य के आधार पर लिया कि सभी छह दलों को केंद्र सरकार की ओर से आरटीआई एक्ट की धारा 2 (एच) (2) के तहत अच्छा खासा वित्तीय फायदा पहुंचा है। हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनैतिक दल द्वारा निभाई जाने वाली महत्वपूर्ण भूमिका तथा दायित्व भी उनके लोक चरित्र की ओर इशारा करते हैं और इस तरह वे धारा 2 (एच) के दायरे में आते हैं। सीआईसी के निर्णय में जिन संवैधानिक और कानूनी प्रावधानों की चर्चा की गई है, वे भी यह सिद्ध करते हैं कि राजनैतिक दल आरटीआई एक्ट के तहत लोक प्राधिकरण हैं।
 
हालांकि, सीआईसी के आदेश को जारी हुए 18 महीने से ज्यादा हो गए हैं और अब तक छह राजनैतिक दलों में से किसी ने न तो इसका पालन किया है और न इस आदेश के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाया है और न ही पारदर्शिता कानून के तहत दी गई प्रक्रिया अनुसार आरटीआई आवेदनों को निपटाने की प्रक्रिया ही अपनाई है। इसके विपरीत राजनैतिक दलों ने आरटीआई आवेदन लेने से ही इनकार कर दिया है। इस संबंध में सीआईसी को कई शिकायतें मिली हैं। जाने-माने आरटीआई कार्यकर्ता सुभाषचंद्र अग्रवाल ने 27 दिसंबर 2010 और 23 दिसंबर 2013 को शिकायतें दर्ज कराई थीं कि राजनीतिक दल सीआईसी के आदेश का पालन नहीं कर रहे हैं।
 
इन शिकायतकर्ताओं में एसोसिएशन फॉर डिमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) भी है। इसी की मूल शिकायत पर 3 जून 2013 का आदेश जारी हुआ था। अधिवक्ता आरके जैन द्वारा 25 मार्च 2014 को दायर शिकायत के आधार पर सीआईसी ने सभी छह दलों को नोटिस जारी कर उसके समक्ष अपना दृष्टिकोण पेश करने का अवसर दिया। हालांकि, किसी भी दल ने इस नोटिस का जवाब नहीं दिया है।  जब जैन ने देखा कि सीआईसी उनकी शिकायत पर आगे और कोई कार्रवाई नहीं कर रहा है तो उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर की। हाईकोर्ट ने 22 अगस्त 2014 को निर्देश दिया कि इस मामले पर तेजी से विचार किया जाए और बेहतर होगा कि यह काम  छह महीने के भीतर कर लिया जाए।
 
दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश का पालन करते हुए सीआईसी ने राजनैतिक दलों को 10 सितंबर 2014 को कारण बताओ नोटिस जारी कर पूछा कि आरटीआई एक्ट की धारा 18 के तहत क्यों न मामले की जांच शुरू की जाए? केवल माकपा, भाकपा, कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने ही इस पर प्रतिसाद दिया और उन्होंने भी सीआईसी के 3 जून 2013 के निर्णय पर सवाल ही उठाया है। पार्टी द्वारा उठाए कदमों का कोई ब्योरा नहीं दिया। भाजपा और बसपा ने तो कोई प्रतिसाद देने की जहमत ही नहीं उठाई।
 
सीआईसी ने फिर 3 नवंबर 2014 को एक और नोटिस जारी कर सभी दलों के अध्यक्ष/ महासचिवों से आयोग के समक्ष व्यक्तिगत रूप से या किसी अधिकृत व्यक्ति के जरिये 21 नवंबर 2014 को पेश होकर उसके आदेश के संबंध में की गई कार्रवाई से संबंधित सारे दस्तावेज व रिकॉर्ड प्रस्तुत करने को कहा। फिर एक बार सीआईसी के नोटिस पर ध्यान न देते हुए कोई भी राजनैतिक दल 21 नवंबर 2014 की सुनवाई के लिए प्रस्तुत नहीं हुआ। इस मौके पर मौजूद सारे शिकायतकर्ताओं को सुनने के बाद सीआईसी ने राजनैतिक दलों को एक और मौका देने का निर्णय लेते हुए दलों के अध्यक्षों व महासचिवों से 7 जनवरी 2015 को उसके समक्ष उपस्थित होकर सारे प्रासंगिक दस्तावेज व रिकॉर्ड प्रस्तुत करने को कहा। अब देखने की बात है कि राजनैतिक दल इस बार यदि कोई प्रतिसाद देते हैं तो वह कैसा होगा।
 
उपरोक्त घटनाक्रम साफ बताता है कि छह राजनैतिक दलों ने एक वैधानिक संस्था की खुली अवहेलना की है। यह लोकतांत्रिक समाज के उचित संचालन के लिए उचित नहीं है। सीआईसी के आदेश की इस अवमानना का देश में लोकतंत्र पर घातक असर होगा। जनता में व्यापक स्तर पर हताशा पैदा हो सकती है। लोगों में यह सोच पैदा हो सकती है कि कानून सिर्फ आम आदमी के लिए हैं और औपचारिक या अनौपचारिक अधिकार रखने वाली सारी संस्थाएं और लोग, खासतौर पर राजनैतिक दल, कानून से ऊपर हैं। हमारे समाज पर इसका विनाशकारी प्रभाव हो सकता है। आइए, उम्मीद करें कि 7 जनवरी को सीआईसी कोई उद्‌देश्यपूर्ण कार्रवाई करेगा।
 
 
जगदीप चोकर
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स के संस्थापक सदस्य
साभारः दैनिक भास्कर