समय है सुरक्षित रहने और सुरक्षित रखने का -स्कूली सुरक्षा सम्बंधी चिंताएं और रेयान स्कूल की घटना

समाज के कमजोर तबके की सुरक्षा सुनिश्चित करना हर सभ्य समाज की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। भारत के संदर्भ में बात करेँ तो यहाँ बच्चोँ, महिलाओँ और अल्पसंख्यकोँ की सुरक्षा की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सरकार और पूरे समाज के हाथ में है। यहाँ महिलाओँ की सुरक्षा सुनिश्चित करने के मामले में कई महत्वपूर्ण बाधाएं हैं क्योंकि यहाँ तमाम तरह के पितृसत्तात्मक नियम बना दिए गए हैं जिन्हेँ न सिर्फ महिलाओँ की अधिकतर हिस्से बल्कि तकरीबन सभी पुरुषोँ का समर्थन हासिल है। लेकिन बच्चोँ की सुरक्षा के मामले में सरकारी मशीनरी की शिथिलता, भ्रष्टाचार और जांच के निष्क्रिय व पुराने तरीकोँ के अलावा कोई अन्य रुकावट नहीं है। सरकार सुरक्षा के मुद्दोँ को लेकर तभी जागती है जब कोई बड़ी घटना हो जाती है और राष्ट्रीय चैनलोँ पर दिन-रात इसी मुद्दे पर बहस चलती है, जैसा कि 2012 में निर्भया कांड के बाद और 2017 में रेयान की घटना के बाद हुआ।

स्कूली बच्चोँ की सुरक्षा के लिए तमाम संवैधानिक और कानूनी प्रावधान हैं, इसके साथ ही केंद्र सरकार ने भी इस सम्बंध में कई दिशानिर्देश जारी किए हैं। भारतीय संविधान की धारा 21 में बच्चोँ की स्वतंत्रता व अनिवार्य शिक्षा के अधिकार का प्रावधान है। इसमेँ कहा गया है कि अगर बच्चोँ के साथ किसी भी तरह की प्रताड़ना, भेदभाव अथवा शारीरिक व मानसिक दंड दिया जाता है तो यह उनकी स्वतंत्रता और सम्मान के अधिकार का उल्लंघन माना जाएगा। धारा 39 (ई) राज्य को यह निर्देश देती है कि वह सुनिश्चित करेँ कि “बच्चोँ को स्वस्थ माहौल में बड़े होने का पूरा अवसर और सुविधा मिले, उन्हे पूर्ण स्वतंत्रता और सम्मान से जीने का अवसर मिले, उनका बचपन और युवावस्था किसी भी तरह शोषण का शिकार न हो और उन्हे किसी भी नैतिक अथवा भौतिक परित्याग का शिकार न होना पड़े।” भारतीय दंड संहिता की धाराएँ 305, 323, 325, 326,352, 354,506 और 509 भी बच्चोँ की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए हैं। तमाम अदालती फैसलोँ के मद्देनजर अब धारा 88 और 89 के जरिए बच्चोँ को दंडित करने वाले शिक्षकोँ को संरक्षण नही मिलता है। रेयान स्कूल में हुई घटना के बाद हरियाणा पुलिस द्वारा घबराहट में कदम उठाने और भ्रष्टाचार करने (जैसा कि सीबीआई ने कहा) के बजाय सही तरीके से कदम उठाने और उचित जांच करने की जरूरत थी। इसके साथ ही बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के नाम पर राज्य सरकार को निजी स्कूल के साथ विरोधी रवैया नहीं अपनाना चाहिए था बल्कि उन्हें सहयोगी और निर्देशक की भूमिका निभानी चाहिए थी।

रेयान स्कूल की घटना के बाद जो सुरक्षा के लिए दिशानिर्देश तय किए गए वे घबराहट में उठाया गया कदम है, क्योंकि उस समय यह माना जा रहा था कि स्कूल बस के कंडक्टर ने प्रद्युम्न को मारा है । इन दिशा निर्देशोँ में कई गम्भीर खामियाँ हैं:

ये सुरक्षा नियम और दिशा निर्देश उन बड़े स्कूलोँ को ध्यान में रखकर तय किए गए जो कई एकड़ के क्षेत्रफल में फैले हुए हैं। नियम तय करते हुए इस बात पर गौर ही नहीं किया गया कि देश के बहुत सारे स्कूल 1000 स्क्वेयर यार्ड से भी कम क्षेत्रफल में चल रहे हैं। ऐसे में बड़े -छोटे सभी स्कूलोँ के लिए एक समान सुरक्षा दिशा निर्देश और नियम नहीं हो सकते हैं।
बच्चोँ की सुरक्षा और संरक्षा के मामले में सरकारी व निजी स्कूलोँ के बीच कोई अंतर नही होना चाहिए। सरकारी व निजी, सभी स्कूलोँ में सुरक्षा निर्देशोँ को चरणोँ में लागू किया जाना चाहिए और उन निर्देशों के पालन के लिए समय सीमा का निर्धारण भी निजी व सरकारी स्कूलों के लिए एक समान होना चाहिए।

हालांकि कुछ नियम ऐसे भी हैं जिनका अनुपालन वित्तीय अड़चनों के कारण तत्काल नहीं किया जा सकता है। सीसीटीवी कैमरों और अग्नि सुरक्षा उपकरणों की स्थापना करने का कार्य पूंजी आधारित है और इसके लिए एक लाख रूपए से अधिक पूंजी निवेश की आवश्यकता पड़ती है। 500 स्क्वायर यार्ड से कम क्षेत्र में संचालित होने वाले स्कूलों के लिए यह खर्च वहन करना आसान नहीं होता है, अतः उन्हें इसके अनुपालन के लिए समय दिया जाना चाहिए। अन्य उपायों जैसे कि छात्रों, कर्मचारियों और अभिभावकों को आईडी कार्ड आदि जारी करने के कार्य को शैक्षणिक सत्र के बीच से लागू करने की बजाए अगले शैक्षणिक सत्र से अनिवार्य बनाया जाना चाहिए।

स्कूल बसों से संबंधित कुछ दिशा निर्देश अत्यंत अव्यवहारिक हैं, उदाहरण के लिए, सभी बसों में ड्राइवर, कंडक्टर, अभिभावक, महिला परिचारिका, अध्यापिका की अनिवार्य उपस्थिति, महिला कर्मचारी उपलब्ध न होने पर ट्रांसजेंडर की नियुक्ति करना आदि आदि। अध्यापिकाओं को गैर शैक्षणिक कार्य देना अत्यंत अवांछनीय कार्य है। जहां तक बसों में जीपीएस, स्पीड गवर्नर्स और सीसीटीवी की बात है तो ये निर्देश सीधे बस निर्माता कंपनियों को जारी किए जाने चाहिए और उक्त सभी वस्तुएं बसों में पहले से ही स्थापित हों यह अनिवार्य कर दिया जाना चाहिए। बसों की स्पीड को 30 किमी प्रति घंटा करना भी गैर वाज़िब है क्योंकि ऐसा होने पर बच्चों द्वारा स्कूल आने जाने में लगने वाले समय में वृद्धि हो जाएगी। बस चलाने के लिए ड्राइवरों के पास इस काम का कम से कम पांच वर्ष का अनुभव होना आवश्यक बनाना भी अव्यवहारिक है और ऐसे ड्राइवरों की अनुपलब्धता को ध्यान में नहीं रखा गया है।

संक्षेप में कहें तो, आवश्यकता इस बात की है कि सुरक्षा के लिए जरूरी नियम सरकारी और निजी दोनों स्कूलों के लिए एक से हों और दोनों के लिए क्रियान्वयन की समय भी सीमा समान हो। 1,000 स्क्वायर यार्ड से कम क्षेत्रफल वाले स्कूलों के लिए अलग नियम बनने चाहिए और इन्हें व्यवहारिक होना चाहिए। जिस किसी भी कार्य में वित्तीय खर्चे शामिल हों, तो बैंकों को अनुदेश जारी कर छोटे स्कूलों को आसान शर्तों पर लोन उपलब्ध कराए जाने के निर्देश दिए जाने चाहिए।

- कुलभूषण शर्मा (प्रेसिंडेंट; नेशनल इंडिपेंडेंट स्कूल्स अलायंस)