समयसीमा के भी बनें नियम

भारत में न्याय मिलने में विलंब के लिए कई प्रक्रियागत खामियां जिम्मेदार हैं। न्याय प्रक्रिया में सुधार के लिए कुछ कदम उठाए जाने चाहिए। 
स्वायत्तता के तमाम प्रावधानों के बावजूद भारत में न्यायपालिका आज भी आर्थिक रूप से सरकार पर ही निर्भर है। कहने को न्यायपालिका हमारी प्रणाली का एक अहम और पृथक अंग है पर न्यापालिका के लिए अलग से कोई बजट नहीं होता है, जैसा कि रेलवे के लिए होता है। 
 
न्यायपालिका के लिए अलग से बजट होगा तो इससे प्रणाली में पारदर्शिता आएगी कि न्याय सुनिश्चित करने के लिए हमारी प्रणाली कितना पैसा खर्च करती है। यह खर्च आबादी और केसों की संख्या बढ़ने के साथ किस अनुपात में बढ़ रहा है। हमारे देश में जिला स्तर पर तो अदालतों की हालत बहुत ही खस्ता है।
 
आज हमारे पास यह जानने का कोई तरीका नहीं है कि अलग-अलग जिला स्तरीय और उच्च न्यायालयों में किन मामलों में कितने दिन में फैसला हुआ, क्या निर्णय हुआ, एक जज एक निर्णय लेने में कितना समय लेता है और किस तरह के फैसले आ रहे हैं। इसके लिए जरूरी है कि सभी न्यायालयों का नेशनल ज्यूडिशियल ग्रिड बनाया जाए, जिसका डाटा ऑनलाइन उपलब्ध रहे। 
 
ओईसीडी (ऑर्गनाइजेशन फॉर इकोनॉमिक कॉपरेशन एंड डेवलपमेंट) देशों की एक रिपोर्ट के अनुसार जिन देशों में न्यायपालिका का कंप्यूटरीकरण हो चुका है वे ट्रायल पर अपेक्षाकृत कम समय खर्च करते हैं। उदाहरण के लिए जापान में एक सिविल केस के ट्रायल का औसत समय 107 दिन है। पर भारत में तलाक के मामलों का औसत समय 15 साल बताया जाता है। 
 
कानूनों का सरलीकरण करने की भी जरूरत है। सरलता से आशय है कि उनमें निश्चितता हो। लोगों को यह समझ में आए कि कानून क्या कह रहा है। अभी एक व्यक्ति के लिए जिला अदालत ने अगर कोई फैसला सुना दिया तो उस पर आदमी यह निर्णय नहीं कर पाता है कि इस मामले में ऊपर की अदालत में जाना चाहिए या नहीं!
 
हाईकोर्ट में सिर्फ बड़े केस ही लिए जाएं। उदाहरण के लिए अभी दिल्ली में बीस लाख से अधिक के सभी दीवानी मामले हाईकोर्ट में जाते हैं। ये सीमा बढ़ाकर 2 करोड़ की जाए। इससे हाईकोर्ट में केसों का बोझ कम होगा। ट्रैफिक चालान आदि के मामले अदालतों में नहीं भेजे जाने चाहिए। 
 
इनको निपटाने के लिए कोई वैकल्पिक व्यवस्था अपनाई जाए। ऑनलाइन निपटारे का विकल्प भी होना चाहिए - अर्थात जो व्यक्ति ऑनलाइन जुर्माना देने के लिए तैयार हो उसे वह विकल्प भी दिया जाए। भारत में ट्रैफिक चालान केसों की संख्या कुल केसों का 38 प्रतिशत तक है। 
 
चेक बाउंस के केसों में भी यह व्यवस्था होनी चाहिए कि पहले जिस व्यक्ति ने फर्जी चेक जारी करके भरोसा तोड़ा है उससे अदालत चेक में लिखी राशि अपने पास जमा करवाए तब उसे अपनी सफाई में कुछ कहने का मौका दे। इससे इस तरह के मामले अपने आप ही आने कम हो जाएंगे।
 
वकीलो को भी चाहिए कि वे "स्थगन" कम से कम लें। यह देखा जाता है कि जज प्राय: वकील के साथ सख्त नहीं होते। उदाहरण के लिए सुप्रीम कोर्ट का निर्णय है कि वकील हड़ताल पर नहीं जा सकते। पर प्राय: यह देखने में आता है कि निचली अदालतों और हाईकोर्ट के वकील हड़ताल पर जाते रहते हैं और अदालतें सख्त रवैया नहीं अपनाती हैं। 
 
कोर्ट की कार्रवाई की वीडियोग्राफी भी होनी चाहिए। इससे न्यायाधीशों में जिम्मेदारी का भाव भी जगेगा और पारदर्शिता भी आएगी। सुप्रीम कोर्ट ने 2002 में पी रामचंद्र बनाम स्टेट ऑफ कर्नाटक के मामले में फैसला दिया है कि वह किसी निचली अदालत को इस तरह के निर्देश नहीं दे सकती कि किसी केस को कितने दिन में निपटा दिया जाए। हर केस अलग होता है और इसके बारे में पूर्व में तय नहीं किया जा सकता कि वह कब तक पूरा होगा। जबकि अमरीका में स्पीडी ट्रायल एक्ट यह प्रावधान करता है कि एक खास प्रकार के केस को निपटाने में कितना समय लगना चाहिए।
 
विधि आयोग की सिफारिशें
राष्ट्रीय विधि आयोग ने मुकदमों के ढेर को कम करने और न्याय प्रणाली में सुधार के लिए जुलाई 2014 में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी है। आयोग ने प्रमुख रूप से न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने को कहा है।
 
न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि
मुकदमों के समयबद्ध निस्तारण के लिए जरूरत इस बात की है कि न्यायाधीशों की मुकदमे निपटाने की दर के आधार पर अधीनस्थ न्यायालयों में न्यायाधीशों की संख्या मे इजाफा किया जाए। इसके लिए जनसंख्या के अनुपात में न्यायाधीशों की संख्या के आधार को छोड़ना होगा।
 
जजों की नियुक्ति को प्राथमिकता दी जाए
विभिन्न उच्च न्यायालयों से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर कहा जा सकता है कि वर्तमान न्याय प्रणाली के कारण मुकदमों के अंबार लगे हुए हैं। वर्तमान प्रणाली इन्हें रोक भी नहीं पा रही है। मुकदमों के इस अंबार को रोकने और इनके समयबद्ध निस्तारण के लिए अधिक संख्या में जजों की नियुक्तियां की जाएं। 
 
अधीनस्थ न्यायालयों के जजों की सेवानिवृत्ति आयु बढ़े
समुचित रूप से प्रशिक्षित न्यायाधीशों की कमी के मद्देनजर अधीनस्थ अदालतों के न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति की आयु को बढ़ाकर 62 वर्ष कर दिया जाना चाहिए। इससे मुकदमों के ढेर को कम करने में सहायता मिलेगी।
 
यातायात/पुलिस चालान मामलों के लिए हो विशेष कोर्ट
अधीनस्थ न्यायालयों में नए दायर हो रहे मामलों में यातायात या पुलिस चालान सम्बन्धी मामले 38.7 फीसदी होते हैं। लंबित मामलों में भी इनकी संख्या 37.4 प्रतिशत है। इन मामलों के निस्तारण के लिए नियमित न्यायालयों से इतर सुबह और शाम को संचालित होने वाले विशेष न्यायालय शुरू किए जाएं। नए विधि स्नातकों को अल्पकाल के लिए इन नए न्यायालयों का पीठासीन अधिकारी बनाया जा सकता है।
 
ये न्यायालय जुर्माने आदि से संबंधित मामलों को ही निपटाएं। जहां जेल जैसी सजा के मामले हों, उन्हें नियमित न्यायालय में निपटाया जाए। इसके अलावा जुर्माने को जमा कराने के लिए ऑनलाइन भुगतान की सुविधा होनी चाहिए। न्यायालय परिसर में जुर्माना जमा करवाने के लिए अलग काउंटर लगाए जाने चाहिए। 
 
अतिरिक्त न्यायालयों के लिए आधारभूत सुविधाएं
अतिरिक्त न्यायालयों के लिए पर्याप्त स्टाफ और आधारभूत ढांचागत सुविधाओं के उचित प्रबंध किए जाएं ताकि इन न्यायालयों को कार्यशील बनाया जा सके। 
 
उच्च न्यायालय द्वारा समीक्षा जरूरी
विधि आयोग का वर्तमान कार्य, वर्ष 2012 तक की स्थिति पर आधारित रहा है। लेकिन, भविष्य में कितनी अधीनस्थ अदालतों और उनके न्यायाधीशों की आवश्यकता होगी, इसका अनुमान लगा पाना कठिन है। इसके लिए उच्च न्यायालयों को चाहिए कि समय-समय पर न्यायाधीशों की संख्या, उनकी निस्तारण दर और मुकदमों के लंबित होने की स्थिति का आकलन करते रहें और आवश्यक कदम उठाते रहें। 
 
 
- एड. प्रशांत नारंग (सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी)
साभारः राजस्थान पत्रिका