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केंद्र सरकार के कृषि कानूनों के खिलाफ राजस्थान विधानसभा में तीन कृषि संशोधन विधेयक पारित किए गए हैं जिनका उद्देश्य इन कानूनों के राज्य के किसानों पर असर को निष्प्रभावी करना है। राजस्थान सरकार का कहना है कि इससे किसानों के हितों की रक्षा होगी और उनके लिए न्यूनतम आय सुनिश्चित होगी। लेकिन विधेयकों पर ध्यान देने से पता चलता है कि इसके प्रावधान किसानों की मदद करने की बजाए लंबे समय में उन्हें नुकसान ही पहुंचाएंगे।

सोचिए कि छूट वाली कीमत पर चिप्स का पैकेट खरीदने के लिए आपको गिरफ्तार कर लिया जाए। आपको यह उदाहरण इसलिए दिया जा रहा है ताकि आपको इस तरह के एक मामले को समझने में आसानी हो। दरअसल पंजाब विधानसभा में पिछले हफ्ते तीन विधेयक पारित किए गए जो इस तरह की गिरफ्तारी का प्रावधान करते हैं, हालांकि यह गिरफ्तारी चिप्स खरीदने पर नहीं होगी बल्कि छूट वाली कीमतों पर गेहूं और धान की खरीद पर होगी। ये विधेयक उन नये कृषि कानूनों के खिलाफ पारित किए गए जिन्हें हाल में केंद्र सरकार लेकर आयी। पंजाब सरकार का कहना है कि इन विधेयकों से किसानों के हितों की रक्षा होगी और उनके

कभी-कभी मैं खुद से पूछता हूं कि मुझे एक किलो आलू के 12 रुपये क्यों चुकाने चाहिए, जबकि किसानों को इसमें से सिर्फ तीन या चार रुपये ही मिलते हैं? आलू लंबी यात्रा करके मुझ तक पहुंचते हैं। किसान से मंडी और वहां से दुकानदार की लंबी श्रृंखला है। वितरण श्रृंखला के प्रत्येक चरण में व्यापारी मेरे 12 रुपयों का कुछ हिस्सा अपने पास रख लेते हैं। किसानों को जो मिलता है और ग्राहक जो भुगतान करते हैं उसमें 8-9 रुपयों का अंतर बहुत बड़ा है। अध्ययनों से पता चलता है कि शेष विश्व के मुकाबले भारत में यह अंतर सबसे अधिक इसलिए है, क्योंकि यहां बिचौलियों की संख्या सबसे अधिक है। अमेरिकी किसानों को उपभोक्ता मूल्य का लगभग आधा मिल जाता है। मेरे मामले में अमेरिकी किसान को छह रुपये प्रति किलो मिलते। वस्तुत: यह अंतर माल और मौसम पर भी निर्भर करता है, किंतु कृषि अर्थशास्त्रियों के अध्ययन के अनुसार विकसित देशों में किसान इसलिए अधिक हिस्सा प्राप्त कर पाते हैं, क्योंकि वहां वितरण श्रृंखला अधिक छोटी और कुशल है।

Author: 
गुरचरण दास