प्रधानमंत्री

बारहवी पंचवर्षीय योजना के मसौदे को दिल्ली में हुई राष्ट्रीय विकास परिषद में सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने अपनी स्वीकृति दी। लेकिन उनके सामने प्रधानमंत्री ने कृषि नीति के बारे में जो मार्गदर्शन किया वह बहुत भयावह है।

जैसे गुजरात  का चुनाव अभियान अपने चरम पर पहुंचता जा रहा है कई पर्यवेक्षक भाजपा के नरेंद्र मोदी की भारी जीत की भविष्यवाणी कर रहे हैं कुछ तो मानते हैं कि 2007 से भी ज्यादा बड़ी जीत हो सकती है। इससे वह अगले आमचुनाव में पार्टी के प्रधानमंत्री पद के लिए उम्मीदवार बन सकते हैं।

कांग्रेस पार्टी की हालत खस्ता है । वह भारी महंगाई,गिरती आर्थिक विकास दर और भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी हुई है। इससे भाजपा को कई दलों के गठबंधन के अगुवा के तौरपर1998 और 1999 की तरह फिर से सत्ता में आने का मौका मिल सकता है। इसका मतलब है कि मोदी प्रधानमंत्री बन सकते हैं।

Author: 
स्वामीनाथन अय्यर

आर्थिक सुधारों के मद्देनजर एफडीआइ के फैसले ने विपक्ष को भले आक्रामक किया हो, लेकिन सरकार ने भी यह तय कर लिया है कि नहीं झुकेगी। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी साफ कह दिया है कि देश को वे 1991 की स्थिति में नहीं ले जाना चाहते। उनके इस बयान से सरकार का आत्मविश्वास भी झलक रहा है। तमाम विरोधों के बीच सरकार के बढ़ते कदम यह बताने के लिए काफी हैं कि उसके ऊपर इन विरोधों का कोई असर नहीं होने वाला। आर्थिक सुधार लागू करने के लिए सरकार तटस्थ है और वह करके रहेगी। जानकारों की मानें तो सरकार अभी और कई नए फैसले लेने वाली है, जो देश को हतप्रभ कर सकता है। रिटेल में एफडीआइ को मंजूरी दिए जान

2जी स्पेक्ट्रम घोटाले के चक्कर में पंद्रह महीने जेल में बिताकर लौटे पूर्व दूरसंचार मंत्री ए राजा कुछ हफ्ते पूर्व जब चेन्नई पहुंचे तो उनका जोरदार स्वागत किया गया। उन्मादी भीड़ उस शख्स के लिए आतिशबाजी कर रही थी, जो तमिलनाडु चुनाव में अपनी पार्टी की हार के लिए काफी हद तक जिम्मेदार था। जिसने दुनिया की नजरों में भारत की छवि खराब कर दी और केंद्र सरकार को झुकने के लिए मजबूर कर दिया। इसके अगले ही हफ्ते राजा जब अपने निर्वाचन क्षेत्र नीलगिरिस व गृहनगर पेरंबलूर पहुंचे तो उनका और भी जबरदस्त स्वागत किया गया। अपने देश और अपनी पार्टी को इतना अधिक नुकसान पहुंचाने पर उन्हें दंडित करने के

Author: 
गुरचरण दास

प्रणब मुखर्जी ने वित्त मंत्रालय का कामकाज छोड़ दिया है और इसके साथ ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर यह जिम्मेदारी आ गई है कि वह अर्थव्यवस्था में नई जान फूंकें। स्टैंडर्ड ऐंड पुअर्स की खराब रेटिंग के बाद एक और रेटिंग एजेंसी फिच द्वारा भारतीय अर्थव्यवस्था और सरकार के कामकाम को लेकर जब नकारात्मक रेटिंग दी गई तो इसे लेकर काफी हो-हल्ला मचा और केंद्र सरकार ने यह कहकर बचाव किया कि यह तात्कालिक नजरिये का परिणाम है। भारतीय अर्थव्यवस्था का आधारभूत ढांचा काफी मजबूत है और भारत उच्च विकास दर की पटरी पर वापस लौट आएगा, जैसा कि वर्ष 2008 की मंदी के बाद हुआ था। कहने का आशय यही था ये रेटिंग

विगत 13 मई को भारतीय संसद ने स्थापना के साठ वर्ष पूरे कर लिए। इन साठ वर्षों के दौरान दुनिया ने सबसे बड़ी लोकतंत्रिक व्यवस्था को तरुणाई की दहलीज लांघ युवावस्था में पहुंचता देखा। इस दौरान इस व्यवस्था से सबकी अपनी-अपनी अपेक्षाएं और उम्मीदें जुड़ी रहीं। किसी ने इसे विश्व की आर्थिक महाशक्ति के तौर पर देखा तो किसी को इसमें वैश्विक राजनैतिक नेतृत्व की झलक दिखी। किसी ने इसे सामरिक दुनिया के सेनापति के तौर पर देखा। वर्ष 1947 में अहिंसा की अनकही, अनसुनी, अनदेखी ताकत के बल पर ब्रिटानी हुकूमत की जंजीरों से आजाद हो गणतंत्र बने इस राष्ट्र और इसकी व्यवस्था से    ये उम्मीद

यह सोचकर कितना अजीब लगता है कि देश में कुछ वर्ष पूर्व (लगभग एक दशक) पहले तक यदि किसी को टेलीफोन कनेक्शन लेना होता था तो उसे कितने पापड़ बेलने पड़ते थे। टेलीफोन के लिए आवेदन फार्म हासिल करने से लेकर भरे आवेदन पत्र भरकर जमा कराने, अपने नंबर का इंतजार करने, घर में फोन लग जाने में दो से तीन साल तक लग जाया करते थे। इतना ही नहीं दो-तीन साल बाद भी नंबर तब आता था जब फार्म देने वाले बाबू से लेकर अधिकारी तक की मुट्ठी गर्म नहीं की जाती थी। इसके बाद भी जबतक कुछ बड़े प्रशासनिक अधिकारियों से लेकर रसूखदार लोगों के पत्र आप की सिफारिश करते विभाग तक न पहुंचे थे, तबतक घर में फोन की घंटी बजन

कुछ वर्षों पूर्व तक बिहार का नाम आते ही लोगों के जेहन में टूटी-फूटी सड़कें, हिचकोले खाते साइकिल की रफ्तार से चलते (दौड़ते) डग्गामार वाहन, छतों पर बैठकर और दरवाजों व सीढ़ियों पर लटक कर यात्रा करती सवारियां, विद्युत आपूर्ति के अभाव में शाम से ही घने अंधकार के आगोश में समा जाने वाले गांवों व शहरों के दृश्य उभर आते थे। राजनेताओं व बाहुबलियों के संरक्षण में खुलेआम घूमते अपराधी और उद्योग धंधों के अभाव में बेरोजगार युवकों व श्रमशक्ति का अन्य प्रदेशों को पलायन यहां की विशिष्ट पहचान बनती जा रही थी। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में बिहार ऐसा बदला कि लोग न केवल उसे मॅाडल प्रदेश मानने लगें

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