स्वतंत्र पार्टी – उदारवाद की बुलंद आवाज (1)

आज भी कमी महसूस होती

है स्वतंत्र पार्टी की 

आजादी के बाद जब देश प्रधानमंत्री पंडित नेहरू के समाजवादी समाज रचना के रंगीन और लुभावने सपनों के पीछे भाग रहा था तब देश के राजनीतिक पटल पर एक ऐसी उदारवादी राजनीतिक पार्टी उभरी जिसने न केवल नेहरू के समाजवाद का पुरजोर विरोध  किया वरन समाजवाद के नाम पर चल रहे परमिट कोटा राज को खत्म कर मुक्त अर्थव्यवस्था  को लागू करने की वकालत की । तब  उसे राजा-महाराजाओं ,जमींदारों ,धन्ना सेठों और उद्योगपतियों की पार्टी कहकर उसका मजाक उड़ाने की खूब कोशिशें हुई लेकिन देखते- देखते यह पार्टी 1967 में भारत की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बन गई। यह बात अलग है कि वह जितनी तेजी से देश के राजनीतिक पटल पर उभरी उतनी ही तेजी से अस्त भी हो गई लेकिन भारतीय राजनीति में उसके वैचारिक योगदान के लिए उसे आज भी याद किया जाता है। उसे भारतीय राजनीति की पहली उदारवादी और मुक्त व्यापार की समर्थक  पार्टी माना जाता है। जी हां हम बात कर रहे हैं स्वतंत्र पार्टी की  जिसकी 1959 में स्थापना हुई थी लेकिन 1974 में भारतीय लोकदल में विलय के साथ वह अस्त हो गई।

स्वतंत्र पार्टी एक औपचारिक  राजनीतिक दल के रूप में भले ही अस्त हो गई हो लेकिन एक झकझोरनेवाले विचार के रूप में आज भी जिंदा है। तभी तो देश के तमाम उदारवादी चिंतक,बुद्धिजीवी और नागरिक यह मबसूस करते हैं कि आज स्वतंत्र पार्टी जैसी उदारवादी राजनीति और आर्थिक स्वतंत्रता में विश्वास रखनेवाली राजनीतिक पार्टी की बेहद जरूरत है। कुछ लोगों को तो लगता है कि स्वतंत्र पार्टी जैसी उदारवादी पार्टी का असली समय तो अब आया है क्योंकि अब समाजवाद की असलियत उजागर हो चुकी है देश की जनता,बुद्धिजीवियों और राजनेताओं का समाजवाद से मोहभंग हो चुका है और उन्हें नवउदारवादी आर्थिक सुधारों में ही देश का भविष्य नजर आ रहा है। इसलिए बहुत सारे चिंतकों का यह मानना है कि स्वतंत्र पार्टी शायद वक्त से पहले राजनीतिक क्षितिज पर उभर आई थी इसलिए उसकी असामयिक मृत्यु हो गई असल में उसका समय तो अब आया है क्योंकि अब उसके लिए उपजाऊ जमीन बन चुकी है। 

पिछले कुछ वर्षों के दौरान कई प्रमुख अखबार यह राय प्रगट करते रहे हैं कि देश को एक ऐसी पार्टी की जरूरत है जो सही मायने में दक्षिणपंथी हो यानी राजनीतिक और आर्थिक उदारवाद की हिमायती हो। उनके अनुसार भाजपा हिन्दुत्ववादी राजनीति के कारण सांप्रदायिक पार्टी है जो इस जरूरत को पूरा नहीं कर सकती। साथ ही स्वदेशी की अवधारणा से जुड़ी होने के कारण उसे मुक्त बाजार का हिमायती नहीं कहा जा सकता। कुछ अर्से पहले जानेमाने स्तंभकार और एम्फेसिस के चैयरमैन जयतीर्थ राव ने इंडियन एक्सप्रेस में - रिवाइव द स्वतंत्र पार्टी -शीर्षक से लेख लिखा था जिसमें स्वतंत्र पार्टी जैसी विचारधारावाली पार्टी की जरूरत बताई गई थी।

आखिर आज जिस स्वतंत्र पार्टी की कमी लोगों को सबसे ज्यादा खल रही है वह स्वतंत्रपार्टी आखिर थी क्या ? क्या थी उसकी राजनीतिक आर्थिक सोच  और कार्यक्रम,कैसा था उसका नेतृत्व और जनाधार। साथ ही जरूरी है इस सवाल का जायजा लेना कि वे क्या वजहें थी जिनके कारण एक दशक से भी कम समय में यह पार्टी देश की दूसरी सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बन गई  और लेकिन उसके कुछ वर्षों बांद उसका नेतृत्व जनाधार सिकुड़ जाने के कारण इतना हताश हो गया कि उसने दूसरी पार्टी में अपने आप को विलिन करने में ही भलाई समझी।

अगस्त 1959 में भारत के गवर्नर जनरल रहे सी राजगोपालाचारी द्वारा स्थापित स्वंतत्र पार्टी हमेशा राजनीतिक पर्यवेक्षकों के लिए एक अबूझ पहेली बनी रही । इसकी एक वजह यह  थी इस पार्टी के संस्थापकों की पृष्ठभूमि इतनी अलग-अलग थी  कि लोग सोच नहीं पाते थे कि वे एक पार्टी चलाने के लिए एक मंच पर आ कैसे गए। स्वतंत्रता सेनानी और गांधी के साथी रहे राजगोपालाचारी देश के जानेमाने राष्ट्रवादी बुद्धिजीवी थे हालांकि कुछ लोग उन्हें हिन्दू पुनर्जागरणवादी भी मानते हैं। तो  दूसरी तरफ पार्टी के महासचिव मीनू मसानी पश्चिमी शिक्षा और संस्कृति रंग में रंगे पारसी थे जो तीसरे दशक में प्रखर समाजवादी थे लेकिन फिर घोर समाजवाद विरोधी बन गए थे। अध्यक्ष एन जी रंगा आक्सफोर्ड में शिक्षित अर्थशास्त्री थे लेकिन लंबे समय तक किसान नेता रहे। वे  पूर्व कांग्रेसी होने के साथ-साथ घोर कम्युनिस्ट विरोधी भी थे। पार्टी के उपाध्क्ष पूर्व कांग्रेसी  नेता के एम मुंशी थे जो जानेमाने साहित्यकार होने के साथ-साथ हिन्दू धार्मिक  और सांस्कतिक गतिविधियों से जुड़े हुए थे । वीपी मेनन जानेमाने नौकरशाह थे उन्होंने सरदार पटेल के सहायक के तौरपर रियासतों के भारत में विलय के मामले में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अक्सर स्वतंत्र पार्टी को राजा महाराजाओं और उद्योगपतियों की पार्टी कहा जा ता है लेकिन इनमें से कोई भी इस श्रेणी का नहीं था ये सभी सामान्य परिवारों के ही लोग थे जो राजनीतिक और आर्थिक  उदारवाद के विचारों  से प्रभावित थे। इनके अलावा पार्टी में पुरानी पीढ़ी के कई आला अफसर ,न्यायाधीश ,और फौजी अफसर भी शामिल थे । जिनमें रिटायर्ड आईसीएस अफसर लोबो प्रभु, रिटायर्ड जज टी कृष्णम्मा, जनरल नाथूसिंह ,भी पार्टी के सक्रिय नेताओं में से थे। दरअसल यही स्वतंत्र पार्टी का राष्ट्रीय नेतृत्व था जिसके इर्दगिर्द स्वतंत्र पार्टी का ढांचा खड़ा हुआ था।

दूसरी तरफ उत्तर भारत में  स्वतंत्र पार्टी का प्रादेशिक नेतृत्व अलग पृष्ठभूमिवाला था जिनमें मुख्यरूप से राजा महाराजोओं और जमींदारों का बोलबाला था। बिहार में राजा रामगढ़ की तूती बोलती थी क्योंकि सारा कैडर उनके समर्थकों का ही था। तो राजस्थान ईकाई पर डुंगरपुर के महरवाल,जयपुर की महारानी गायत्रीदेवी और अन्य राजपूत राजा महाराजा छाए हुए थे। ओडिसा में वे पूर्व महाराजाओं का बोलबाला था जो गणतंत्र परिषद के नेता ते  जो बाद में स्वतंत्र पार्टी में विलीन हो गई थी।गुजरात में भी कई राजा महाराज पार्टी के साथ जुड़े।

इससे जहां पार्टी को फायदा हुआ वही नक्सान भी हुआ। राजा महाराजाओं के कारण पार्टी को उनकी रियासतों की पूर्व जनता का व्यापक समर्थन मिला बहीं पार्टी की छवि राजा महाराजओं की पार्टी की बनने लगी। उसे सामंतों और जमींदारों की पार्टी माना जाना लगा । स्वतंत्र पार्टी का नेतृत्व लिबरल सोच के नेताओं के हाथों में होने के बावजूद उसकी तुलना कंजरवेटिव पार्टी के साथ होने लगी। इन राजा महाराजाओं में बहुत से ऐसे थे थे जो सचमुच प्रगतिशील और  उदारवादी थे लेकिन ऐसे महाराजाओं की भी कमी नहीं थी अब भी सामंती सोच के शिकार थे। जिनके कारण राष्ट्रीय और प्रादेशिक नेतृत्व के बीच तनाव पैदा होता रहा और इस राष्ट्रीय पार्टी के अनुशासन को चुनौती दी जाती रही। प्रादेशिक स्तरपर पार्टी में अंदरूनी लोकतंत्र  कमजोर हुआ। इन कारणों से पार्टी की छवि लिबरल के बजाय कंजरवेटीव पार्टी की बनी।

 इस पार्टी की छवि दक्षिण भारत में बड़े किसानों की पार्टी पश्चिम में पूंजीपतियों की पार्टी उत्तर प्रदेश और बिहार में सामंती तत्वों की पार्टी की थी। वैसे पार्टी की छवि बिगाड़ने में उसके विरोधियों की भी भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रही। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी उसे अंधकार की शक्तियों और दक्षिणपंथी प्रतिक्रियावाद की पार्टी कहती थी। प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू इसे मध्ययुग के सामंतो,महलों और जमींदारों की पार्टी जिनका नजरिया ज्यादा से ज्यादा फासिस्ट होता जा रहा है। दूसरी तरफ स्वतंत्र पार्टी के समर्थकों और उससे सहानुभूति रखनेवालों का मानना था कि यह एक प्रगतिशील लिबरल पार्टी है जो गैर कम्युनिस्ट,गैर समाजवादी सेकुलर और संविधानवादी विकल्प खड़ा करके कांग्रेस के सत्ता पर एकाधिकार को चुनौती दे सकती है। अमेरिका की एक जानीमानी पत्रिका लाइफ ने स्वतंत्र पार्टी की स्थापना के बाद पार्टी के कार्यक्रम की भूरि –भूरि प्रशंसा करते हुए लिखा था – स्वतंत्र पार्टी का कार्यक्रम इस विशाल देश को स्वतंत्र संस्थाओं की दिशा में ले जाने का कार्यक्रम है। मुक्त और स्वतंत्र दुनिया इस छोटी पार्टी के बडे  भविष्य की कामना करती है। 1967 में स्वतंत्र पार्टी इन उम्मीदों पर खरी भी उतरी जब वह लोकसभा में कांग्रेस के बाद सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी।

- सतीश पेडणेकर