न्याय में तेजी से रुकेगा राजनीति का अपराधीकरण

 

राजनीति में अपराधियों के बढ़ते दखल से लोग इतने नाराज हैं कि वे सुप्रीम कोर्ट के दो हालिया फैसलों का स्वागत ही करेंगे। इनमें एक किसी भी सजा पाए व्यक्ति को चुनाव लड़ने से रोकता है, भले ही उसने ऊंची अदालत में सजा के खिलाफ अपील कर रखी हो। दूसरा जेल में बंद व्यक्तियों के चुनाव लड़ने पर रोक लगाता है, फिर चाहे उन्हें अस्थायी तौर पर पुलिस या न्यायिक हिरासत में ही क्यों न रखा गया हो। दोनों फैसले कुछ अपराधियों को चुनाव से दूर रख सकते हैं, लेकिन उनके साथ यह जोखिम भी जुड़ा है कि कुछ इज्जतदार लोग भी इसके चलते चुनाव लड़ने से रह जाएं। कई बदमाश जेल से चुनाव जीते हैं, लेकिन ऐसा कई अच्छे लोगों के साथ भी हो चुका है (मसलन, आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी द्वारा जेलों में ठूंसे गए लोग)।

सुस्त न्यायिक प्रक्रिया

इससे भी बुरी बात यह कि इन फैसलों से राजनीतिक बदले की बाढ़ आ सकती है। राजनेता अक्सर अपने विरोधियों के खिलाफ मुकदमे करवा देते हैं और जजों से उनकी नजदीकी इस षड्यंत्र में मददगार बनती है। नए फैसले ऐसे षड्यंत्रों को बढ़ावा देने वाले साबित हो सकते हैं। भारतीय राजनीति को पाक-साफ करना बहुत जरूरी है, लेकिन इसका यह तरीका नहीं हो सकता। मूल समस्या यह नहीं है कि भारतीय राजनेता अपनी बनावट में ही बदमाश या अपराधी हैं बल्कि यह है कि हमारी मरणासन्न न्याय व्यवस्था अपराधियों के लिए चुनाव लड़ना कुछ ज्यादा ही फायदेमंद बना देती है। न्यायिक प्रक्रियाएं यहां इस बुरी तरह सुस्त हैं कि किसी साधनसंपन्न व्यक्ति को जल्दी सजा दिलाना संभव ही नहीं होता और उनमें कुछ तो अपील के सारे मौके गंवाए बगैर बूढ़े होकर मर जाते हैं। ऐसे में कोई पक्के तौर पर जान नहीं पाता कि कौन निर्दोष है और कौन झूठे आरोपों का शिकार।

जजों का गड़बड़झाला

इसके अलावा हर सत्तासीन दल अपने विरोधियों को तंग करने और अपने गुंर्गों को संरक्षण देने के लिए पुलिस का दुरुपयोग करता है। हमें इंसाफ और साफ-सुथरी सियासत की जगह मिला है अपराधीकरण और कीचड़ उछालने का चलन, जिसमें अपराधियों और कीचड़ उछालने वालों की जवाबदेही किसी पर नहीं आती। सुप्रीम कोर्ट के दोनों फैसलों में हमें अंतहीन मुकदमेबाजी के घातक प्रभावों से कतराकर निकल जाने की कोशिश दिखाई पड़ती है लेकिन ऐसे शॉर्टकट आकर्षक होने के बावजूद अपने साथ काफी खतरे भी लेकर आते हैं।

सुप्रीम कोर्ट के लिए सही रास्ता यही है कि वह जल्दी न्याय मिलने की व्यवस्था बनाए। 'जस्टिस डिलेड इज जस्टिस डिनाइड' बोलने का शौक सभी जजों को होता है लेकिन फैसले में देरी से होने वाले अन्याय को रोकने में वे बुरी तरह विफल रहे हैं। किसी को अंतिम रूप से सजा देने में जब दशकों लग जाते हों तो कानून का पालन करने वाले इज्जतदार लोगों पर धनबल और बाहुबल वालों का चढ़ बैठना स्वाभाविक है। पुरानी कहावत है कि कानून तोड़ने वाले अगर जेल में न हुए तो जल्द ही वे खुद कानून बना रहे होंगे। आज के हालात वैसे ही हैं। इस रोशनी में देखें तो आपराधिक राजनीति का उदय सिर्फ राजनेताओं के बदमाश होने से नहीं जुड़ा है। इसका एक पहलू यह भी है कि न्याय में देरी से अपराधियों को राजनीति में आने की प्रेरणा मिलती है और वे अपने सज्जन प्रतिद्वंद्वियों पर भारी पड़ने लगते हैं। कई जजों ने आपराधिक राजनीति की निंदा की है और इसके एवज में जनता की शाबासी पाई है, लेकिन उन्हें इस गड़बड़झाले में अपनी भूमिका को भी स्वीकार करना चाहिए।

अपनी न्याय प्रणाली को सुधारे बगैर हम राजनीति को सच्चे अर्थों में नहीं सुधार सकते। किसी भी न्यायविहीन समाज में कुछ समय बाद कानून तोड़ने वालों का कानून मानने वालों पर भारी पड़ना स्वाभाविक है। ऐसा सिर्फ राजनीति में ही नहीं, व्यापार, विभिन्न व्यवसायों और बाकी जगहों के लिए भी सच होगा। कुछ इलाकों में माओवादियों की लोकप्रियता का राज यही है कि वे अपनी कथित जन अदालतों में तत्काल न्याय उपलब्ध कराते हैं। शहरी इलाकों में भी माफिया डॉन अपनी निजी कचहरी लगाते हैं, जहां आम लोग इंसाफ के लिए जाते हैं। पुलिस-न्यायिक प्रणाली ध्वस्त हो चुकी है। जितने घपले आज भारत को विचलित किए हुए हैं, उनमें न्याय से जुड़े घपलों का कोई जवाब नहीं है।

पिछले साल विदेशी निवेशकों के एक दल ने मुझसे पूछा कि अगर आपको भारत में कोई एक चीज सुधारनी हो तो वह क्या होगी? मैंने बेहिचक जवाब दिया 'पुलिस-न्यायिक व्यवस्था'। निवेशक इस जवाब से चकित हुए, क्योंकि उन्हें मुझसे किसी आर्थिक या राजनीतिक मुद्दे के उल्लेख की उम्मीद थी लेकिन मैंने उन्हें बताया कि राजनीति और व्यापार की कुछ सबसे बड़ी गड़बड़ियां पुलिस-न्यायिक व्यवस्था की गड़बड़ियों से ही पैदा होती हैं। सुप्रीम कोर्ट ने मुकदमों के कंप्यूटराइजेशन और लोक अदालतों वगैरह के जरिए न्याय प्रक्रिया को तेज करने का प्रयास किया है, लेकिन अफसोस कि न्याय में खिझा देने की हद तक विलंब जारी है।

ज्यादा नहीं 38 साल

देश के पूर्व रेलमंत्री एलएन मिश्रा की 1975 में हुई हत्या के अंतहीन मुकदमे पर गौर करें । जिस 27 वर्षीय व्यक्ति को इस हत्या का मुख्य आरोपी बनाया गया था, वह आज 65 साल का बीमार आदमी है। अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए जिन 39 गवाहों का उसने नाम लिया था, उनमें 31 मर चुके हैं। संभवत: हर दिन चली इस केस की सुनवाई 20 से ज्यादा अलग-अलग जजों के सामने हो चुकी है। मुलजिम ने जब इस दलील के साथ केस खारिज करने की अपील की कि इतनी देरी ने अब न्याय को असंभव बना दिया है, तब अदालत ने घोषणा की कि 38 साल कोई ज्यादा समय नहीं है! यह हाल जब एक वीआईपी मुकदमे का है तो किसी गरीब-कमजोर आदमी को क्या न्याय मिलेगा? न्याय में देरी ने राजनीति का ही नहीं, पूरे समाज का अपराधीकरण कर डाला है। इसे रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट को जल्दी न्याय मिलने की व्यवस्था बनाने के साथ ही उस पर अमल भी सुनिश्चित करना चाहिए।

 

- स्वामीनाथन एस. अंकलेसरिया अय्यर

साभारः नवभारत टाइम्स

स्वामीनाथन अय्यर