फिक्सिंग का फंडा

 

जैसा चलन चल पड़ा है कि कहीं से कोई सुर्रा उठ जाने पर हम उससे जुड़ी हर चीज, हर व्यवस्था, सरकार, देश और समूची दुनिया को भ्रष्ट बताने लगते हैं, उसी तरह आईपीएल में फिक्सिंग का मामला एक बार फिर उभर आने के बाद इस पूरे टूर्नामेंट, लीग और देश के समूचे क्रिकेट सरंजाम को ही कूड़ेदान में डालने पर उतावले न हो जाएं।

दिल्ली पुलिस ने आईपीएल में शामिल कुल नौ टीमों के सैकड़ों खिलाड़ियों में से सिर्फ तीन को फिक्सिंग के आरोप में पकड़ा है, लेकिन साथ ही उसने यह भी कह दिया है कि इन तीन के अलावा किसी और क्रिकेटर, सपोर्टिंग स्टाफ या क्रिकेट ऐडमिनिस्ट्रेटर के इस घपले में शामिल होने की कोई सूचना उसके पास नहीं है। यह बात दिल्ली पुलिस ने लोगों का दिल रखने के लिए नहीं कही है। पिछले एक महीने से भी ज्यादा समय से वह इस दायरे में आने वाले बहुत सारे लोगों के फोन नंबरों और इंटरनेट कनेक्शनों पर नजर रखे हुए थी।

दरअसल, कहीं से यह खबर उसके हाथ लग गई थी कि दुबई और मुंबई स्थित कुछ माफिया आईपीएल में अपना बेटिंग-फिक्सिंग रैकेट चला रहे हैं। थोड़ी राहत की बात यह भी है कि दिल्ली पुलिस को अभी तक सारे सुराग स्पॉट फिक्सिंग के ही मिले हैं। कोई पूरा का पूरा मैच फिक्स होने की बात उसने नहीं कही है, हालांकि एक ही टीम के तीन खिलाड़ी स्पॉट फिक्सिंग में पकड़े जाने से ऐसा एक शक जरूर बनता है।

स्पॉट फिक्सिंग, यानी खिलाड़ी का पैसे लेकर फिक्सर को यह यकीन दिलाना कि अमुक बॉल को वह नो-बॉल करेगा, या अमुक ओवर में इतने रन देगा। ऐसे हथकंडे आम तौर पर धूर्त गेंदबाज ही अपनाते हैं, हालांकि छोटे-मोटे मैचों में बल्लेबाज भी रन-आउट हो जाने जैसी चीजें फिक्स कर लेते हैं। आश्चर्य है कि जिस लीग में खेलने वाले लगभग सारे खिलाड़ी करोड़पति हों, वहां भी कुछ लोग खराब खेलने के लिए चवन्नी के भाव बिकने को तैयार बैठे हैं।

बताया जा रहा है कि इस साल कुल 45 हजार करोड़ रुपये का सट्टा आईपीएल पर लगा हुआ है। जुआखोरी के इतने बड़े कारोबार में, जहां एक-एक गेंद पर करोड़ों के वारे-न्यारे हो रहे हैं, वहां कुछ खिलाड़ियों का फिक्सिंग माफिया का मोहरा बन जाना बहुत अस्वाभाविक नहीं है। इस घटिया स्थिति के लिए इतने स्तरों का झोल जिम्मेदार है कि अगर इन सभी को ठीक करने की कोशिश की जाए तो आईपीएल का सारा डेरा-तंबू एक दिन में उखड़ जाएगा। लेकिन इसे कम से कम इतना तो ठीक रखना ही होगा कि दर्शकों और उनका मुंह देखकर रकम लगाने वाले विज्ञापनदाताओं की दिलचस्पी इस तमाशे में बनी रहे।

इसके लिए सारे खिलाड़ियों और खेल से सीधे तौर पर जुड़े बाकी लोगों के सामने यह बात पूरी तरह साफ हो जानी चाहिए कि टूर्नामेंट के दौरान उन पर चौबीसों घंटे नजर रखी जा रही है और अगर उनका कोई घपला पकड़ में आ गया तो उन्हें बहुत ज्यादा नुकसान उठाना पड़ेगा। मामले को इससे लंबा खींचने की जरूरत नहीं है, क्योंकि आईपीएल महज एक मनोरंजन कार्यक्रम है, और एक समाज को वैसा ही मनोरंजन प्राप्त होता है, जिसके लायक वह है।

 

- अविनाश चंद्र