उत्पादन की विविधता और एमएसपी के फंदे से मुक्ति के लिए हो पैकेज

क्या केंद्र और पंजाब सरकार किसानों की आय का एक स्थायी समाधान तलाशने और पानी, मिट्टी और हवा को बर्बाद होने से बचाने के लिए हाथ मिला सकते हैं? केवल ऐसा करके ही वे पंजाब को फिर से महान बना सकते हैं।

कृषि कानूनों के खिलाफ पंजाब के किसान कंपकपाती सर्द रातों से जूझते हुए दिल्ली की सीमा पर आंदोलनरत हैं। उन्हें डर है कि नए कानून उनकी आय पर विपरीत प्रभाव डालेंगे। इसमें कोई गलत बात नहीं है क्योंकि प्रत्येक नागरिक अपनी मौजूदा आय को न केवल सुरक्षित रखना चाहता है बल्कि उसमें सतत वृद्धि भी करना चाहता है। वर्तमान में जारी गतिरोध अलावा भी यह हमेशा से बहस का एक मुद्दा रहा है। अब तक जितनी भी बातचीत हुई है वह बेनतीजा रही है। आशा है कि प्रदर्शन शांतिपूर्ण बना रहेगा और समस्या का समाधान सौहार्दपूर्ण तरीके से निकाल लिया जाएगा। अपनी बात को हम पंजाब के किसानों की आय के मुद्दे पर केंद्रीत रखते हैं। यह वह मुद्दा है जो आंदोलन के दौरान ही नहीं, आंदोलन समाप्त होने के बाद भी प्रासंगिक रहेगा।

1960 के दशक के आखिर से लेकर 1980 के मध्य तक के दौर में देश की प्रसिद्ध हरित क्रांति में पंजाब का महत्वपूर्ण योगदान सभी को विदित है। 1965 में भारत में अन्न की भारी कमी हो गई थी और आयातीत पीएल 480 पर निर्भर रहना पड़ा था। इस दौरान अमेरिका से 10 मिलियन मिट्रिक टन (एमएमटी) अनाज का आयात किया गया था। तब इसकी कीमत हमें रुपये में चुकानी पड़ी थी क्योंकि उस समय भारत के पास वैश्विक बाजार से अनाज खरीदने के लिए पर्याप्त विदेशी मुद्रा नहीं थी। उस समय देश का कुल विदेशी मुद्रा भंडार 7 एमएमटी से अधिक अन्न खरीदने के लिए भी पर्याप्त नहीं था। इसी पृष्ठभूमि के मद्देनजर वर्ष 1965 में न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) प्रणाली तैयार की गई।

लेकिन आज की परिस्थिति बिल्कुल अलग है। आज, भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) खाद्यान्न के विशाल भंडार अटा पड़ा हुआ है। निगम के पास इस वर्ष जून तक खाद्यान्नों के स्टॉक की की मात्रा 97 एमएमटी तक पहुंच गई जो कि इसके सुरक्षित भंडारण के तय मानक 41.2 एमएमटी से बहुत अधिक है। सुरक्षित भंडारण के मानकों के अतिरिक्त अनाज की इस मात्रा की कीमत 1,80,000 करोड़ से अधिक है। इतनी बड़ी धन राशि बिना किसी उद्देश्य की फंसी पड़ी हुई है। एमएसपी और खुली खरीद आधारित अनाज प्रबंधन प्रणाली की ये है वर्तमान स्थिति।

विदेशी मुद्रा की उपलब्धता की बात करें तो भारत के पास 575 बिलियन डालर से अधिक का भंडार है। यह मात्रा आरामदायक स्तर से बहुत अधिक है। जब परिस्थितियां बदलती हैं, तो समाजों को भी अपने तौर तरीकों में बदलाव करने की आवश्यकता होती है, जिससे विकास के उच्च स्तर को प्राप्त किया जा सके,  अन्यथा वे स्थिर हो जाते हैं और निम्न स्तर के साम्य में  फंस कर रह जाते हैं। शुम्पीटर की पुराने और अपर्याप्त चीजों की ‘रचनात्मक विनाश’ प्रक्रिया वाला सिद्धांत दुनिया भर के देशों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। भारत भी इसका अपवाद नहीं है।  

यह भी ध्यान देने वाली बात है कि वर्ष 1966 में हरियाणा के अलग राज्य बन जाने और एक बड़े भूभाग के हिमाचल प्रदेश में चले जाने के बाद भी पंजाब की प्रति व्यक्ति आय सर्वाधिक थी। प्रति व्यक्ति आय के मामले में पंजाब 2000 के आरंभ तक अग्रणी पंक्ति में शामिल रहा। लेकिन इसके बाद पंजाब देश के प्रमुख राज्यों की सूची में तेजी से नीचे फिसलने लगा। यदि छोटे राज्यों को भी सूची में शामिल कर लें तो वर्ष 2018-19 में पंजाब 13 स्थान तक लुढ़क गया। हालांकि इस खराब प्रदर्शन के पीछे प्रदेश में औद्योगिकीकरण व अन्य आधुनिक सेवा क्षेत्रों जैसे कि आईटी व वित्तीय सेवाओं में तेजी न आने जैसे अन्य कारण भी जिम्मेदार रहें। लेकिन मैं यहां मुख्य रूप से कृषि की बात करुंगा और पंजाब अपना शीर्ष स्थान फिर से कैसे प्राप्त करे इसकी सलाह दूंगा।

पंजाब की 99 प्रतिशत कृषि को सिंचाई की सुविधा का सौभाग्य प्राप्त है जबकि पूरे देश में इसका औसत 50 प्रतिशत से भी कम है। महाराष्ट्र में तो सिर्फ 20 प्रतिशत सिंचाई की सुविधा ही उपलब्ध है। पंजाब में औसतन भूमि धार्यता (जोत) 3.62 हेक्टेयर है जबकि पूरे भारत में औसत भूमि धार्यता 1.08 हेक्टेयर है। बिहार में तो यह आंकड़ा महज 0.4 हेक्टेयर है। पंजाब में प्रति हेक्टेयर उर्वरकों की खपत लगभग 212 किलो ग्राम है जबकि राष्ट्रीय स्तर पर इसकी खपत प्रति हेक्टेयर 135 किलो ग्राम है। आश्चर्य नहीं कि पंजाब में गेंहू की उत्पादकता प्रति हेक्टेयर 5 टन और चावल की उत्पादकता 4 टन प्रति हेक्टेयर है। भारत स्तर पर गेंहू की उत्पादकता औसतन 3.5 टन प्रति हेक्टेयर और चावल की उत्पादकता 2.6 टन प्रति हेक्टेयर है।

पंजाब में कृषि कार्य पर निर्भर कुल परिवारों की संख्या महज 1.09 मिलियन है जो कि अखिल भारतीय स्तर पर कृषि पर निर्भर कुल परिवारों की संख्या 146.45 मिलियन का मामूली हिस्सा भर है। पंजाब के किसानों  को राज्य सरकार की तरफ से मुफ्त बिजली के माध्यम से मिलने वाली सब्सिडी की धनराशि 8,275 करोड़ रूपये (वर्ष 20202-21 के बजट के अनुसार) है। इसके अलावा पंजाब को केंद्र सरकार की तरफ से उर्वरकों पर वर्ष 2019-20 के दौरान 5,000 करोड़ रूपये की सब्सिडी प्राप्त हुई। इस प्रकार, केवल बिजली और उर्वरकों के माध्यम से पंजाब के किसानों को 13,275 करोड़ रूपये की सब्सिडी प्राप्त हुई। इसका तात्पर्य यह हुआ कि वर्ष 2019-20 में पंजाब में प्रति कृषक परिवार प्राप्त होने वाली सब्सिडी की राशि लगभग 1.22 लाख रूपये रही। यह राशि राष्ट्रीय स्तर पर प्रति कृषक परिवार प्राप्त होने वाली सब्सिडी राशि में सर्वाधिक है। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि पंजाब में प्रति कृषक परिवार औसत आय देश में सर्वाधिक है। दरअसल, यह राशि प्रति कृषक परिवार राष्ट्रीय औसत आय का लगभग ढाई गुना है।

लेकिन किसानों अथवा राज्यों के द्वारा कृषि और आय में वास्तविक योगदान का वास्तविक आंकलन करने का मापक राज्य में कुल खेती युक्त भूमि पर प्रति हेक्टेयर सकल घरेलू कृषि उत्पाद है। यही एक महत्वपूर्ण और संपूर्ण सूचक है क्योंकि यह उत्पादकता, विविधीकरण, निवेश व उत्पादनों की कीमतों और सब्सिडी के प्रभाव को दर्शाता है। इस सूचक के आधार पर, दुर्भाग्य से पंजाब का स्थान बड़े कृषि उत्पादक राज्यों की सूची में 11वें क्रम पर आता है।

आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और केरल जैसे दक्षिण भारत के राज्य, उच्च मूल्यों वाले फसलों के प्रकारों और पशुधन जैसे कि मुर्गी पालन, दुग्धालय (डेयरी), फलों, सब्जियों, मसालों और मत्स्य पालन में अधिक विविधता पूर्ण हैं। यहां तक कि पश्चिम बंगाल और हिमाचल प्रदेश भी इस मामले में पंजाब से आगे हैं। स्पष्ट है, यदि पंजाब के किसान अपनी आय को सार्थक रूप में दो गुना या तीन गुना अधिक बढ़ता देखना चाहते हैं तो उन्हें धीरे धीरे एमएसपी आधारित गेंहू और चावल  के उत्पादन से उच्च मूल्यों वाले उन फसलों और पशुधन की ओर बढ़ना चाहिए जिनकी मांग अनाजों की तुलना में तीन से पांच गुना अधिक तेजी से बढ़ रही है।

पंजाब को कृषि क्षेत्र में वैविध्यता लाने के लिए एक पैकेज की जरूरत है। यह पैकेज 10 हजार करोड़ रूपये का हो सकता है जो पांच वर्षों के दौरान प्रदान किये जाएं। इस पैकेज में केंद्र व राज्य का योगदान 60ः40 के अनुपात में हो सकता है। ऐसी स्थिति सभी के लिए लाभदायक होगी। एक बार किसान यदि अपने कृषि उत्पादों में विविधता लाने और आय को दोगुना करने में कामयाब हो गए तो वे एमएसपी वाले जाल में नहीं फंसेंगे। क्या केंद्र और पंजाब सरकार किसानों की आय वाली समस्या के स्थायी समाधान और पानी, मिट्टी और हवा को नष्ट होने से बचाने के लिए हाथ मिलाएंगे? केवल ऐसा करके ही वे पंजाब को फिर से महान बना पाएंगे। 

- अशोक गुलाटी (प्रिंट संस्करण में यह लेख पहली बार 7 दिसंबर 2020 को  ‘पंजाब को फिर से महान बनाए’ शीर्षक के तहत प्रकाशित हुआ था। गुलाटी आईसीआरआईईआर में कृषि के लिए इन्फोसिस चेयर के प्रोफेसर हैं।)