समाजवाद - दासता की एक व्यवस्था

मेरे एक मित्र ने पूछा है कि समाजवाद का अर्थ क्या है?

समाजवाद का अर्थ है राज्य पूंजीवाद- स्टेट कैपिटलिज्म । समाजवाद का अर्थ है संपत्ति व्यक्तियों के पास न हो संपत्ति की मालकियत राज्य के पास हो । लेकिन समाजवाद यह नहीं कहता कि वह राज्य पूंजीवाद है । वह कहता है कि वह पूंजीवाद का विरोधी है।यह बात झूठ है।समाजवाद पूंजीवाद का विरोधी नहीं है ।समाजवाद,जो पूंजी की सत्ता बहुत लोगों में वितरित है उसे राज्य में केंद्रीत कर देता है।

इसलिए समाजवाद का दूसरा अर्थ है गुलामी की व्यवस्था। समाजवाद का अर्थ है राज्य मालिक हो जाए और समाज के सारे लोग गुलाम और दास की हैसियत से जियें।असल में पूंजीवाद ने व्यक्ति को हैसियत और स्थिति दी। समाजवाद का मतलब है कि सामंतवाद वापस लौट आए। इतना ही फर्क होगा कि जहां राजा थे वहां राजनीतिज्ञ होंगे। राजाओं के हाध में भी इतनी ताकत कभी न थी जितनी समाजवाद राजनीतिज्ञ को दे देगा।

समाजवाद भविष्य के लिए भयंकर गुलामी का सूत्रपात है। और स्वतंत्रता के प्रेमियों को थोड़ी सी भी स्वतंत्रता की आकांक्षा  हो तो समाजवाद से बहुत सचेत होने की जरूरत है।समाजवाद की मतलब है कि राज्य के हाथों में देश की समस्त शक्तियां केंद्रीत हो जाएं। राज्य के हाथों में जितनी भी शक्तियां हैं राज्य उनका बुरी तरह दुरूपयोग करता है। राजनीतिज्ञ के हाथ में जितनी शक्ति है उससे भी राजनीतिज्ञ सारे जीवन पर छाया रहता है।लेकिन उसका मन बैचैन है उसकी महत्वाकांक्षा नहीं मानती।

अभी भी एक शक्ति उसके हाथ से बाहर है –धन के उत्पादन की शक्ति । वह उसे भी अपने हाथ में लेना चाहता है। यह बड़े मजे की बात है कि राज्य है समाज का नौकर लेकिन नौकर मालिक होना चाहता है। ओनरशिप चाहता है। राज्य चाहता है कि समाज की मालकियत भी उसी के हाथ में हो। हम रास्ते पर ट्रैफिक पुलिस को खड़ा किए हुए हैं कि रास्ते पर व्यवस्था करे। कोई गाड़ी गलत रास्ते से न गुजरे। कोई आदमी रास्ते के बीच में न चले कोई बांये चलने का नियम न तोड़े। वह पुलिसवाला धीरे-धारे मालिक हो जाता है क्योंकि बड़ी से बड़ी गाड़ी भी निकले तो भी उसके इशारे पर रुकती है और सीटी बजाए तो बड़े से बड़ा आदमी भी सड़क पार नहीं कर सकता। धीरे –धीरे वह पुलिसवाला कह सकता है कि इतनी परेशानी क्यों करते हो ? मालकियत भी गाड़ियों की मुझे दे दें और रास्ते पर चलनेवाले लोगों की मालकियत भी मुझे दे दें,व्यवस्था बिल्कुल ठीक हो जाएगी।

उस पुलिसवाले को मालकियत के लिए नहीं खड़ा किया गया है वहां,व्यवस्था के लिए खड़ा किया गया है। और व्यवस्था का मतलब ही यह है कि मालिक कोई और होंगे। मालकियत भी राज्य के हाथों में चली जाती है तो व्यवस्थापक और मालिक एक हो जाते हैं। असल में यही हुआ है अबतक।रूस और चीन में जो क्रांति हुई है वह समाजवादी नाम को है।नाम समाजवाद है क्रांति तो मैनेजरियल है। असल में व्यवस्थापक मालिक हो गए हैं।जो कल तक मैनेजर्स थे ,,जो मुनीम थे मुल्क के लिए, वे मुल्क के मालिक हो गए।

राज्य को इतनी शक्ति हाथ में देने से बड़ा खतरा कुछ भी नहीं हो सकता। पहले इतना खतरा नहीं था। अब खतरा बहुत ज्यादा है।पहली बात तो यह है कि पिछले बीस पच्चीस वर्षों में वैज्ञानिकों ने इतने साधन खोज निकाले हैं कि जो राज्य के हाथों में आदमी की परम परतंत्रता का कारण बन सकते हैं। वैज्ञानिकों ने रासायनिक विधियां खोज निकाली हैं जिनके द्वारा आदमी के भीतर के चिंतन को नष्ट किया जा सकता है।रासायनिकों ने वह व्यवस्था खोज निकाली है कि बच्चा पैदा हो तभी से उसके भीतर कुछ नष्ट किया जा सके जो बगावती हो सकता है। माइंडवाश के हजारो उपाय खोज निकाले हैं।

वैज्ञानिकों ने ताकत राज्य के हाथों में दे दी है इतनी बड़ी कि अब कोई राज्य धन का भी मालिक हो जाए तो उस राज्य से कोई छुटकारा समाज का नहीं है। लोकतंत्र की हत्या और स्वतंत्रता की हत्या अनिवार्य है अगर राज्य की संपत्ति के उत्पादन का भी  मालिक बन जाए ।और एक और बड़े मजे की बात है कि राज्य जितना भी काम करता है ,सबमें असफल और अकुशल है। उसकी अकुशलता का कोई हिसाब नहीं है।राज्य जो भी काम करता है मुल्क को हानि पहुंचाता है। उस काम से कोई लाभ नहीं पहुंचता।लेकिन जो थोड़ा बहुत लाभ व्यक्ति अपनी संपत्ति ,श्रम और बुद्धि से मुल्क को पहुंचा सकते हैं वह उनकी भी मालकियत ले लेना चाहता है।हां एक फायदा होगा इससे कि राज्य की अकुशलता दिखनी बंद हो जाएगी।और राज्य के हर वर्ष बढ़नेवाले हानि के दावे फिर बुरे मालूम न पड़ेगे।क्योंकि लाभ का दावा करनेवाला कोई रह ही नहीं जाएगा। हानि के ही दावे रह जाएंगे।

राज्य के हाथों में इतनी अकुशलता है कि उचित तो यह है कि राज्य के हाथों में जो वह भी निजी व्यक्तियों के हाथों में चले जाएं और उचित तो यह है कि राज्य की जितनी ताकत है वह कम हो क्योंकि राजनीतिज्ञ मनुष्य की छाती पर पत्थर की तरह बैठ गया है।

- ओशो