साम्यवाद नहीं, सामाजिक लोकतंत्र

सोवियत यूनियन और इसके साम्यवादी साम्राज्य के अंत की 20 वीं सालगिरह से पहले उसके सिद्धांतों पर चलने वाले भारत के एक राज्य पश्चिम बंगाल में भी साम्यवादी शासन ध्वस्त हो गया। चुनाव के बाद बृंदा करात के विश्लेषण से साफ जाहिर हुआ कि सीपीएम पहले सोवियत संघ और बाद में पश्चिम बंगाल में हार की वजहों से आंखें मूंदे बैठा है।

ब्रिटिश साम्राज्यवादी दावा करते हैं कि वे पिछड़ी नस्ल की आबादी में सभ्यता का प्रसार कर रहे थे। वामपंथी साम्राज्यवादियों ने भी उन लोगों के उत्थान का दावा किया, जिनमें क्रांतिकारी चेतना का अभाव था। अलबत्ता, पिछड़ी हुई नस्लों ने साम्राज्यवादी शासन के खिलाफ विद्रोह कर दिया, पहले ब्रिटिश उपनिवेशों में विद्रोह हुआ और 1989 में यही विद्रोह सोवियत उपनिवेशों में भी दिखाई पड़ा।

पहले ब्रेझनेव सिद्धांतों में कहा गया था कि सोवियत संघ अपने नियंत्रण वाले इलाकों से कभी पीछे नहीं हटेगा, लेकिन ये सिद्धांत अफगानिस्तान की बंजर भूमि में दम तोड़ गया।

ब्रेझनेव के उत्तराधिकारी गोर्बाचेव को विरासत में एक डूबती हुई अर्थव्यवस्था मिली और ब्रिटेन की तरह ही उनके लिए भी साम्राज्यवादी अभियानों का वित्तीय बोझ उठा पाना नामुमकिन हो गया। गोर्बाचेव ने पूर्वी यूरोप के साम्यवादी नेताओं से कहा कि वो अपने अस्तित्व को कायम रखने के लिए सोवियत हस्तक्षेप पर निर्भर रहना बंद करें। इस संदेश के छह महीने के अंदर ही पूर्वी यूरोप में साम्यवादी शासन व्यवस्थाएं ध्वस्त हो गयीं और इसके कुछ ही दिनों बाद दुनिया का सबसे बड़ा साम्यवादी शक्ति केंद्र भी ध्वस्त हो गया।

यूरोप के मार्क्सवादियों की जब निरंकुश दमनकारियों के तौर पर पोल-पट्टी खुल गई, तो वो बड़ी बेशर्मी से सामाजिक लोकतंत्र के समर्थक बन गए। पूर्वी यूरोप ने सिद्ध कर दिया कि साम्यवाद के तथाकथित लाभ ‘ब्रिटिश साम्राज्य के लाभ’के जितने ही फर्जी थे, जिन्हें ब्रिटिश राज ने भारतीय स्कूली पाठ्यक्रम में ठूस दिया था। लेकिन करात और सीपीएम अब भी अपने इसी विचार पर कायम रहेंगे कि साम्यवादी साम्राज्यवाद ही सर्वोत्कृष्ट सभ्यता है।

आम लोग जिसे लोकतंत्र मानते हैं, वो करात की नजर में मध्य वर्ग का एक छलावा है। मार्क्सवादी सोच के मुताबिक सच्चा लोकतंत्र वो है जहां पोलित ब्यूरो उन साधारण लोगों की तरफ से सारे फैसले करता है, जिनकी क्रांतिकारी चेतना विकसित नहीं हुई और जो ममता बनर्जी को वोट डाल बैठते हैं।

करात का दावा है कि सीपीएम के मंचों पर सभी मुद्दों पर खुली चर्चा के बाद फैसले लिए जाते हैं और जो अपने आप में ‘अनूठी लोकतांत्रिक प्रकिया’ का उदाहरण है। उनकी इस व्याख्या से सैफुद्दीन चौधरी और सोमनाथ चटर्जी जैसे वामपंथी नेता जरूर अचरज में पड़ गए होंगे, जिन्हें अपने विचार व्यक्त करने की वजह से ही पार्टी से निष्कासित कर दिया गया। हालांकि इन लोगों को जो दंड दिया गया वो उसकी तुलना में बेहद कम है जो हस्र स्तालिन अपने से असहमत होने वालों को दिया करता था।

अपनी सारी हिंसा के बावजूद स्तालिन ने एक पिछड़े हुए देश का औद्योगिकीकरण किया और इसे हिटलर को परास्त करने लायक बना दिया। जब तक उसने लोगों को कृषि से उद्योग की तरफ खींचा, तब तक आर्थिक उत्पादन भी बढ़ता रहा, क्योंकि कृषि की तुलना में उद्योग कहीं ज्यादा उत्पादक है। लेकिन जैसे ही 1960 के दशक तक ये प्रक्रिया करीब-करीब पूरी हुई, सोवियत मॉडल की आधारभूत खामियां जगजाहिर हो गईं।

वो मिसाइल और परमाणु बम का जखीरा तो तैयार कर सकता था, लेकिन एक विश्वस्तरीय नल या शर्ट का उत्पादन उनके बस का नहीं रहा। कृषि क्षेत्र में भारी निवेश के बावजूद खेती में कोई सुधार नहीं दिखा और सोवियत संघ अपने कट्टर शत्रुओं-अमेरिका और यूरोप-पर खाद्यान्न, मांस और दूध उत्पादों के लिए दयनीय ढंग से निर्भर हो गया। गोर्बाचेव को उम्मीद थी कि ‘पेरेस्त्रॉइका और ग्लाशनॉस्त’ के जरिए सोवियत मॉडल को बचा लिया जाएगा, लेकिन ऐसा हुआ नहीं, साम्यवादी साम्राज्य ध्वस्त हो गया।

सीपीएम को इस बात की खीझ है कि एक क्रांतिकारी पार्टी को पूंजीवादी लोकतंत्र के ढुलमुल ढांचे में काम करना पड़ रहा है। सीपीएम हालांकि यह नहीं देख पा रही है कि लोकतंत्र के कारण ही उसे यहां बहुत सारी कामयाबियां मिली हैं। भारत में वो कम्यून नहीं बना सकी और न ही लाखों किसानों को भूखे रखकर मौत के घाट ही उतार सकी, जैसा कि स्तालिन ने यूक्रेन में किया था। इसकी जगह उसने यहां भूमि सुधार के अपेक्षाकृत नरम कदम उठाए, जो बहुत हद तक विश्व बैंक के सुझावों के अनुरूप था। विश्व बैंक से वित्त पोषित पूंजीवादी-किसान रणनीति की वजह से पहले पंजाब में हरित क्रांति आई और उसी हरित क्रांति को सीपीएम ने पश्चिम बंगाल में भी दोहराया। सोवियत संघ में कृषि ने कभी भी ऐसा सुनहरा दौर नहीं देखा।

इसके बावजूद सीपीएम इस बात के लिए शर्मिंदगी महसूस करती है कि उसने साम्यवाद की मूल भावना की उपेक्षा की, लेकिन वो ये नहीं देख पाई कि बंगाल के किसानों ने हरित क्रांति के फायदों के प्रति जो उत्साह दिखाया, वो सोवियत कम्यूनों में कभी नजर नहीं आया। कृषि ने पश्चिम बंगाल को गरीबी उन्मूलन में देश में सबसे आगे ला खड़ा किया, और करात ने भी विश्व बैंक के हवाले से ऐसा कहा है।

सीपीएम की सबसे बड़ी नाकामी ये रही कि उग्र ट्रेड यूनियन गतिविधियों को बढ़ावा देने कारण राज्य के उद्योग धंधे तबाह हो गए। किसी वक्त भारत का शीर्ष व्यवसायिक केंद्र रहा राज्य अब सबसे पिछड़ों में शुमार हो गया। कृषि क्षेत्र में मिली सफलता को उद्योग जगत तक ला पाने में मिली नाकामी में ही इस सवाल का जवाब भी छिपा है कि क्यों सीपीएम को उन निराश मतदाताओं ने दरकिनार कर दिया, जिनकी आंकाक्षाएं काफी तेजी से बढ़ रही हैं। उसके राज में नौकरियां केवल सरकारी और पंचायती क्षेत्र में ही सृजित की गईं और वो भी पूरी तरह से पार्टी कार्यकर्ताओं में ही बांटी गईं।

हालांकि सीपीएम के लगातार सात विधानसभा चुनावों में जीत दर्ज करना (उस दौर में जबकि ज्यादातर सत्ताधारी दल चुनाव हार रहे थे) ही लोकतांत्रिक व्यवस्था में उसकी सफलता को दर्शाता है। करात का ये कहना बिल्कुल सही है कि 34 साल तक शासन करने के बाद हार में शर्मिंदगी की कोई बात नहीं है।

इससे निश्चित तौर पर यह स्पष्ट होता है कि सीपीएम का भविष्य तभी सुरक्षित रह सकता है, जब वह खुद को सामाजिक लोकतांत्रिक पार्टी में बदल ले और लेनिन, स्तालिन और ब्रेझनेव के सिद्धांतों से खुद को अलग कर ले। यही काम पूर्वी यूरोप के मार्क्सवादी नेताओं ने किया। लेकिन इसके लिए सीपीएम उनकी निंदा ही करती रही। वो ये समझ पाने में नाकाम रही है कि भारतीय लोकतंत्र की सीमाएं ही मार्क्सवादियों के लिए वरदान साबित हुईं हैं और इसी के कारण पश्चिम बंगाल में मार्क्सवादियों को यूरोप या सोवियत संघ के मार्क्सवादियों की तुलना में कहीं ज्यादा प्रतिष्ठा और मान मिला है। जितनी जल्दी सीपीएम इस सच्चाई को समझ लेगी, शासन में उसकी वापसी की संभावनाएं उतनी ही ज्यादा बढ़ जाएंगी।

- स्वामीनाथन अय्यर

स्वामीनाथन अय्यर