एक देश, एक चुनाव: संघीय ढांचे को खतरा?

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र यानी भारत की चुनाव प्रणाली आज बहस के केंद्र में है। सत्ताधारी दल भाजपा के साथ-साथ अनेक दलों, संस्थाओं और बुद्धिजीवियों का मानना है कि देश में लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ हों, इस दिशा में ठोस पहल करनी चाहिए। हालांकि एकसाथ चुनाव कराने के विचार से असहमति रखने वाले दलों की भी कोई कमी नहीं है। कांग्रेस सहित अनेक दल- जैसे तृणमूल कांग्रेस, बसपा, टीडीपी और कम्युनिस्ट पार्टी, ने एक साथ चुनाव कराने से असहमति व्यक्त की है। इस बहस में सहमति और असहमति के पाटों पर खड़े दो खेमों के अपने-अपने तर्क हैं। लेकिन यह बहस आज के दौर में प्रासंगिक भी है और व्यवहारिकता के अनुकूल भी है। यह ठीक है कि लोकतंत्र में ऐसे निर्णयों को आम सहमति से ही लागू किया जाना संभव है। किन्तु इस दौर को इस बहस के लिए अनुकूल कहना इस लिहाज से उचित है क्योंकि देश के सर्वाधिक राज्यों सहित केंद्र की सत्ता पर बैठा दल खुद इसकी पैरवी कर रहा है। सत्ता पक्ष द्वारा एकसाथ चुनाव कराने की पैरवी के पीछे कुछ तार्किक बिंदु प्रस्तुत किये गए हैं। उन बिन्दुओं की कड़ियाँ इतिहास से जुड़ती हैं, जिनपर हमें गौर करना होगा।

देश में पहला आम चुनाव 1951-52 में हुआ था। इसी चुनाव के साथ तत्कालीन प्रान्तों में भी विधानसभा के लिए चुनाव हुए थे। एकसाथ लोकसभा और विधासभा के चुनाव कराने का क्रम 1952, 1957, 1962 और 1967 के चुनाव तक बरकरार रहा। लेकिन 1967 में देश में संयुक्त विधायक दल के अस्तित्व और कुछ राज्यों में कांग्रेस की कमजोर होती जमीन के साथ-साथ टूटने लगा। 1967 से 1971 के बीच कई राज्यों की सरकारें गई और परिणाम हुआ कि 1951 से 1967 तक अनवरत चला लोकसभा और विधानसभा चुनाव एकसाथ होने का क्रम टूट गया। इतिहास के इस पक्ष को जब देखते हैं तो यह सवाल स्वाभाविक है कि यदि 1951 से 1967 तक, जब देश में न तो आज जैसी तकनीक थी और न ही इतने संसाधन, ये चुनाव साथ हो सकते थे तो अब क्यों नहीं है ? इस आधार पर साथ चुनाव कराने से असहमत पक्ष की वह दलील भी खारिज होती है कि भारत का मतदाता जागरूक नहीं है तथा इससे संघीय ढाँचे पर खतरा उत्पन्न होता है। चूँकि यह तो सभी मानते हैं कि 1951 की तुलना में आज का मतदाता अधिक जागरूक है तथा उस दौर का मतदाता भी केंद्र में कांग्रेस और प्रांतों में गैर-कांग्रेसी सरकारें चुनने लगा था, तो आज के मतदाता की जागरूकता पर संदेह कितना उचित है ? यह दलील भी मजबूत नहीं नजर आती कि एकसाथ लोकसभा और विधानसभा के चुनाव कराने से देश के संघीय ढाँचे को कोई खतरा है। एकसाथ लोकसभा चुनाव कराने को लेकर अस्सी के दशक से ही चर्चाएँ उठती रही हैं, लेकिन अभी तक यह व्यवहार में लागू नहीं हो सका है।

इतिहास में जाकर पड़ताल करें तो समकालिक चुनाव का विचार सबसे पहले चुनाव के आयोग द्वारा 1983 में जारी वार्षिक रिपोर्ट में आया था। इसके बाद 1999 में विधि आयोग की रिपोर्ट संख्या-170 और वर्ष 2015 में संसद की स्थायी समिति की रिपोर्ट संख्या-79 में भी समकालिक चुनावों पर सकारात्मक चर्चा उभर कर आई थी। इस विषय पर 2017 में नीति आयोग ने भी एक विश्लेषण पत्र जारी करके समकालिक चुनावों की सिफारिश की है। इसी वर्ष 17 अप्रैल 2018 को विधि आयोग द्वारा समकालिक चुनावों पर तीन पृष्ठों का एक श्वेत पत्र जारी किया गया। इस मसौदे में विधि आयोग ने तथ्यों के आधार पर समकालिक चुनावों की जरूरत पर बल देते हुए इससे जुड़ी व्यापक चर्चा का आह्वान भी किया था। विधि के आयोग के मसौदे में समकालिक चुनावों को लेकर पूर्व में उठी मांगों अथवा सिफारिशों का हवाला भी दिया गया है। विधि आयोग के आह्वान के बाद गत 13 अगस्त सत्ताधारी दल, भाजपा के अध्यक्ष ने विधि आयोग के अध्यक्ष के नाम एक विस्तृत पत्र लिखकर ‘एकसाथ चुनाव’ कराने से सहमति व्यक्त करते हुए अपने सुझावों एवं तर्कों को प्रस्तुत किया।

इसमें कोई दो राय नहीं कि भारत जैसा देश जहाँ 29 राज्य हों और कई स्तरों पर चुनाव होते हैं, वहां अलग-अलग समय पर चुनाव कराने की वजह से देश का कोई न कोई हिस्सा हर समय चुनावी मोड में रहता है। राजनीतिक दल भी चुनावी तैयारियों में रहते हैं। चूँकि जनता द्वारा चुने गये ज्यादातर जनप्रतिनिधि भी किसी न किसी राजनीतिक दल के सदस्य होते हैं, लिहाजा वे भी चुनावी गतिविधियों का हिस्सा स्वाभाविक तौर पर बनते हैं। सरकारी धन और सरकारी संसाधनों जैसे, प्रशासनिक अधिकारी, सरकारी कर्मचारी, सुरक्षा बल आदि, का चुनावों में इस्तेमाल स्वाभाविक है। इसके अलावा चुनावों के दौरान लागू आदर्श आचार संहिता का नकारात्मक प्रभाव भी विकास और प्रगति के कार्यों पर पड़ता है। आंकड़ों की कसौटी पर देखें तो मई, 2014 में केंद्र में भाजपानीत राजग की सरकार बनने के बाद से अबतक प्रत्येक साल लगभग चार से सात राज्यों में विधानसभा के लिए चुनाव हुए हैं। इसके अलावा स्थानीय निकायों के चुनाव भी अनेक राज्यों में हुए हैं। महाराष्ट्र का यह आंकड़ा, जिसका जिक्र भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के पत्र में है, चौंकाने वाला है कि ‘वर्ष 2016-17 के दौरान 365 दिनों में 307 दिन तक राज्य का कोई न कोई हिस्सा चुनावों की वजह से आदर्श आचार संहिता के अंतर्गत रहा है।’ ऐसे में सवाल है कि क्या वाकई देश को समकालिक चुनावों की तरफ ले जाने की पहल नहीं करनी चाहिए ? क्या इसके लिए यह सर्वाधिक अनुकूल अवसर नहीं है क्योंकि देश में सर्वाधिक हिस्से में सत्ता पर काबिज दल इसके लिए तैयार है! क्या इस अवसर को समकालिक चुनावों के लिहाज से इसलिए माकूल नहीं माना चाहिए, क्योंकि  सत्ताधारी दल के साथ-साथ विधि आयोग और नीति आयोग जैसी संस्थाएं इसपर गंभीरता के साथ विचार कर रही हैं!

एकसाथ लोकसभा और विधानसभा के चुनाव कराने को लेकर जो बुनियादी चुनौती दिख रही है, वह कानूनी संशोधन और संसाधनों की उपलब्धता को लेकर है। यह सच है कि इस प्रणाली पर यदि सभी दल सहमत हो जाते हैं तो इसके लिए संविधान में कुछ संशोधन करने होंगे। अगर सभी दल इसपर सहमत हो जाते हैं तो इस मोर्चे पर कठिनाई नहीं आनी है। रही बात संसाधनों की उपलब्धता को लेकर तो दैनिक भास्कर की एक खबर के मुताबिक़ ‘16 मई को विधि आयोग के साथ बैठक के बाद चुनाव आयोग ने कहा था कि दोनों चुनाव साथ कराने के लिए 12 लाख ईवीएम और इतनी ही वीवीपीएटी मशीनों की जरूरत होगी। इनके खरीदने में 4500 करोड़ रुपए खर्च होंगे।‘ यह चुनौती भी इतनी बड़ी नहीं है जिसे पूरा नहीं किया जा सके। चूँकि चुनाव दर चुनाव बढ़ रहे चुनावी खर्चे की तुलना में यह राशि बहुत बड़ी नहीं नजर आती है। एक आंकड़े के अनुसार 2014 के आम चुनावों में लगभग सरकारी खजाने से 4000 करोड़ रूपये खर्च हुए थे, जो 2009 की तुलना में तीन गुना से ज्यादा है। ऐसे में एकसाथ चुनाव के लिए अगर संसाधनों की जरूरतों पर होने वाले खर्चे को देखें तो यह कोई कठिन रास्ता नहीं नजर आता।

विधि आयोग ने समकालिक चुनावों पर देश के संविधान विशेषज्ञों, राजनीतिक दलों सहित इसके सभी हितधारकों को पक्ष रखने का अवसर दिया है। ऐसे में लोकतंत्र और चुनाव के सबसे बड़े हितधारक के रूप में देश के नागरिक हैं। क्या इसबात पर आम सहमति बन सकती है कि एक साथ चुनाव कराने को लेकर एक आम जनमत संग्रह कराया जाए, जिससे इस मुद्दे पर देश की जनता का मिजाज पता चले। यह किसी एक दल की चुनौती नहीं है। अत: इसे दलगत आधार पर खोने-पाने की सोच से ऊपर उठकर देखने की आवश्यकता है।   

- शिवानन्द द्विवेदी (लेखक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन में रिसर्च फैलो हैं।)

शिवानंद दिवेदी