फिर प्याज के दाम सौ रूपये किलो क्यों न हों ? - शरद जोशी (1)

मराठी के लोकप्रिय अखबार लोकसत्ता के आयडिया एक्सचेंज में पिछले दिनों किसान नेता और उदारवादी चिंतक शरद जोशी को बुलाया गया था । इस कार्यक्रम में अखबार के संपादकीय विभाग के लोग मेहमान के साथ विभिन्न मुद्दों पर बातचीत करते हैं। इस कार्यक्रम में शरद जोशी देश की कृषि की समस्याओं और उसके समाधान के बारे में विस्तार और बेबाकी  के साथ  अपने विचार रखे । हम लोकसत्ता से साभार इस बातचीत के अंश दो किश्तों में प्रकाशित कर रहे हैं । मराठी में हुई इस बातचीत का अनुवाद किया है – सतीश पेडणेकर ने। यहां प्रस्तुत है उसकी पहली किस्त -

मुकुंद सँगोराम – यह सारा भारत जानता है कि कृषि की समस्याओं के बारे में राष्ट्रीय स्तर पर जागृति पैदा करनेवाले पहले विचारक हैं शरद जोशी। वे ऐसे विचारक हैं जिन्होंने कृषि की समस्याओं को मध्यमवर्ग के ड्राइंग रूम तक पहुंचाया। उन्होंने किसानों का विशाल  संगठन खड़ा किया।। इसके अलावा उनके कृषि के अर्थशास्त्र और कृषि के चिंतन का भी बहुत बड़ा योगदान है। आयडिया एक्सचेंज कार्यक्रम में उनका हार्दिक स्वागत है।

शरद जोशी – आज मुझे महाराष्ट्र और हिन्दुस्तान में खेती की जो स्थिति दिखाई देती है वह संक्षेप में इस प्रकार है कि शेतकरी संगठना ने विचार सामने रखा उसमें यह बताया था कि कर्जमाफी क्यों होनी चाहिए। इसमें प्रमुख मुद्दा यह था कि सारे कृषि ऋण गैर कानूनी हैं, अनैतिक हैं। दुर्भाग्यवश वो लोग कर्जमाफी लाए जो कर्जमाफी के चिंतन को पर विश्वास नहीं करते थे। हमारे  नारे में –महत्वपूर्ण बात यह थी कर,कर्जा नहीं देंगे ,बिजली का बिल भी नहीं देंगे। इसमें से वे लोग बिजली के बिल की बात भूल गए। इस तरह की कर्जमाफी लागू करने के कारण किसानों के बिजली के बिल अब भी बकाया हैं। और अपने चाचा (शऱद पवार ) क्या कहते हैं इस पर ध्यान दिए बगैर भतीजा (अजित पवार) बड़े उत्साह के साथ बिजली के कनेक्शन काटने निकले हैं। किसानों के पास बिजली नहीं है। पैट्रोल और डिजल के भाव आसमान छू रहे हैं। खेती के लिए लोग नहीं मिल रहे। जो छोटे - मोटे उपकरण और मशीनें चाहिएं वो भी नहीं मिल रही हैं। केंद्र सरकार जमीन का आकार छोटा करने की योजना बना रही है। इस सबको देखने पर लगता है कि आज किसान के लिए खेती करना नामुमकिन होता जा रहा है। आज मुझे लगता है कि अन्न सुरक्षा असंभव है । उसके पीछे की सोच भी गलत है।मुझे यह कल्पना ही स्वीकार नहीं हैं कि लोगों को भीख देने से अन्न सुरक्षा हो सकती है। इस कारण मुझे संदेह है कि अन्न सुरक्षा सफल हो पाएगी। हमने कहा कि हमें अनुदान की भीख नहीं चाहिए । हमें किसानों को खुले बाजार में जो भी भाव मिले वह हमें मंजूर होगा। यदि सरकार का हस्तक्षेप न हो तो बाजार में किसानों की लागत को पूरा करने वाला भाव मिलेगा। जिस बाजार में सरकारी हस्तक्षेप है  उस बाजार में उचित कीमत तय हो पाना मुश्किल है। यही हमारी सबसे बड़ी समस्या है।

गिरीश कुबेर – आर्थिक उदारीकरण की शुरूआत 1991 में हुई ।उसे अब ग्यारह वर्ष पूरे हो रहे हैं। क्या आपको लगता है कि उदारीकरण और खेती के कल्याण के बीच कहीं कोई रिश्ता बनाने की कोशिश हुई। आप उदारीकरण के खिलाफ हैं या यह कहना चाहते हैं कि खेती में उदारीकरण नहीं हुआ।

शरद जोशी –  केंद्र सरकार को उदारीकरण का सही स्वरूप समझा ही नहीं । इसलिए किसी को यह बात स्वीकार नहीं है कि बाजार को मुक्त रखा जाना चाहिए । उसमें सरकारी हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। आज स्थिति यह है कि करूणानिधि कह दें तो कपास के निर्यात पर पाबंदी लगा दी जाती है। शरद पवार उसके बारे में कुछ नहीं कर सकते। उदारीकरण मुख्यरूप से उद्योगों और सेवाओं तक ही सीमित रह गया। कृषि तक वह कभी नहीं पहुंचा। हमारे द्वारा आयोजित एक सेमिनार में डा मनमोहनसिंह आए थे  और उन्होंने सबके सामने स्वीकार किया कि आर्थिक सुधार खेती तक नहीं पहुंच पाएं हैं। अभी सरकार कृषि पर तरह तरह के बंधन लाद सकती है जब उसके लिए यह बंधन लादाना असंभव हो जाएगा तब सही मायनों में खुला बाजार विकसित होगा। इस बाजार में जो भी भाव तय होंगे वह हमें स्वीकार होंगे। उन दामों से किसानों को न्याय मिलता है।

गिरीश कुबेर – इससे फिर नए तरह का संघर्ष पैदा होता है। इससे ऐसा लगता है कि चीजों के भाव बढ़ने दिए जाएं। इस टकराव को कैसे दूर किया जाए। क्या यह संभव है कि ग्राहक के हितों की रक्षा की जाए और किसानों के हितों की भी रक्षा की जाए।

शरद जोशी – मेरा मानना है कि सरकार किसानों और ग्राहकों के हितों में संतुलन स्थापित करने में कभी कामयाब नहीं हो पाई। मार्क्स ने शहर और गांवों के विवाद को स्पष्ट करते समय समय किसान और ग्राहकों के हितों के संघर्ष का भी जायजा लिया था। ग्राहक राजनीतिक रूप से कितने सक्रिय हैं इस आधार पर ही फैसले होते हैं। किसी वर्ष प्याज के भाव बढ़ जाने के कारण सरकार पांच सीटों पर उपचुनाव में हार गई तब तो उन्होंने सदमा झेला लेकिन अगले साल तुरंत ग्राहकों के हितों की रक्षा के लिए निर्यात पर पाबंदी लगा दी। जब प्याज के दाम एक रूपये किलो थे तब फिल्मों के बाल्कनी के टिकट के दाम ढाई रूपये थे। अब बाल्कनी के टिकट के दाम ढाई सौ रूपये हैं । इस हिसाब से प्याज के दाम सौ रूपये होने चाहिए । असली मुद्दा यह है कि ग्राहक राजनीतिक दृष्टि से जितना सक्रिय है उतना सक्रिय किसान हो सकता है क्या ? किसान राजनीतिक दृष्टि से सक्रिय नहीं हो सका क्योंकि डा़ अंबेडकर जितने बड़े पैमाने पर राजनीतिक ध्रुवीकरण कर पाए उतने बड़े पैमाने पर मैं नहीं कर पाया यह मेरी बहुत बड़ी असफलता है। शहर के ग्राहक और गांवों के किसान समुदाय की जाति अलग है और जैसा कि लोहिया ने कहा है जाति की अवधारण बहुत महत्वपूर्ण है। जाति व्यवस्था पर गौर न करने के कारण हम भारत में शहर और गांव के विवाद को कहीं भी हल नहीं कर पाए। ग्राहक और किसान के बीच की खाई ज्यादा गहरी होती गई।

हमने अगर यह अनुशासन बना लिया कि कहीं भी सरकारी हस्तक्षेप न किया जाए तो बाजार में आवश्यक समझौता हो सकता है। खेती पर कोई भी बंधन न लगाए जाएं इस मुद्दे का वास्तविक अर्थ यह है किसानों को इथेनाल बनाने दें तो देश की जरूरतें पूरी हो सकती हैं।पैट्रोल और डिजल का भाव बडे स्तरपर कम होगा। उसे प्रोत्साहन देना तो दूर रहा उस पर पाबंदी लगाई जाती है। यदि यह पाबंदी शब्द ही हटा दें तो हमारा बहुत कल्याण होगा।

विनायक करमरकर – सरकारी हस्तक्षेप को जरा अलग रखें लेकिन आढ़ती दलाल, ट्रांसपोर्टर और खुदरा व्यापारी आदि की  किसानों को लूटनेवाली मशीनरी है ही। उसका आप क्या करेंगे ?

शरद जोशी- मैंने इस सोच को कभी नहीं माना। बिचौलियों की कतार है वह अपना –अपना काम करती है। उनका काम महत्वपूर्ण है। दलालों या बिचौलियों का व्यवसाय बहुत लाभदायक नहीं होता । जबतक उन्हें राजनीतिक संरक्षण हासिल न हो उनका धंधा बहुत लाभदायक हो ही नहीं सकता। इस विषय पर डा़ लेले का सिद्धांत है। उन्होंने यह पैटर्न दिखाया है कि  जो दलाल होते हैं वे तीन वर्षों में या तो मेयर या विधायक बन जाते हैं। फिर उन्हें राजनीतिक संरक्षण मिल जाता है। उसके जरिये वे पैसे वसूल कर सकते हैं। अन्यथा दलाली कोई बहुत लाभ का धंधा नहीं है।

गिरीश कुबेर – देश में कुल मिलाकर बिचौलियों की चलती है। वे कभी राजनीतिक क्षेत्र में होते हैं कभी आर्थिक क्षेत्र में होते है ----

शरद जोशी  - यदि कृषि उत्पाद बाजार समितियां जो बनी उन्होंने अगर बिचौलियों की संस्था को फार्मलाइज न किया होता तो आज तस्वीर एकदम अलग होती।। इन समितियों के कारण किसानों का बहुत नुक्सान हुआ। पहले भाव ठीक नहीं लगा तो किसान माल देता नहीं था। वह उसके घर पर ही पड़ा रहता था। अब यह हो गया है कि माल को बेचने के लिए बाजार समिति में ले जाया जाता है और वहां जाने पर जो मिले वही भाव। उस भाव पर ही माल निकाल देना है। नहीं तो माल फिर से लाना पड़ता नहीं खाता। इसकारण वह फंस जाता है। चूहे की पिंजरे में फंसने के बाद जो स्थिति होती है वही किसान की बाजार समिति में माल लाने पर होती है। हमने यह मुद्दा उठाया कि कृषि उत्पाद बाजार समितियां किसानों बूचडखाने हैं। हाल ही में एफडीआई और रिटेल के बारे में  हमारे देश में मनमोहनसिंह ने गलती से एक सही नीति अपनाई थी लेकिन उसे तुरंत वापस ले लिया गया।

कुबेर – रिटेल में एफडीआई का दक्षिणपंथी और वामपंथी दोनों विरोध कर रहे हैं –

जोशी – कुछ वामपंथियों को फारेन शब्द से ही एलर्जी है। लेकिन फारेन डायरेक्ट इन्वस्टमेंट आनेपर क्या होता इस मुद्दे पर गौर करने पर स्पष्ट हो जाएगा कि उससे  सबसे ज्यादा कल्याण किसानों का ही होता।