एजुकेशन सेक्टर में पॉलिसी मेकिंग, रेग्युलेशन और सर्विस डिलीवरी कार्य के घालमेल को दूर करें

मौजूदा समय में भारतीय शिक्षा के क्षेत्र में नीतियां बनाने, नियमन (रेग्युलेशन) करने और सेवा प्रदान (सर्विस डिलिवरी) करने जैसे सारे सरकारी कामों की जिम्मेदारी एक ही संस्था के जिम्मे है। हालांकि, जरूरत इन सारे कामों को तीन अलग अलग हिस्सों में बांटने की है और इन तीनोँ के बीच संबंधों में वैसी ही स्पष्ट दूरी होनी चाहिए जैसे कि वित्त, टेलीकॉम और विद्युत क्षेत्र में है। ऐसा करने से नीति निर्धारण और नियमन दोनों के श्रेष्ठ क्रियान्वयन के लिए पर्याप्त क्षमता बढ़ेगी जो कि फिलहाल सेवा प्रदान करने की जिम्मेदारी के कारण अवरुद्ध हो जाती है। जिम्मेदारियों को अलग बांटने से निजी क्षेत्र की संस्थाओं के समक्ष उत्पन्न होने वाली चुनौतियों के बाबत विस्तृत समझ बढ़ेगी परिणाम स्वरूप शिक्षा के क्षेत्र के संपूर्ण विकास संभव हो सकेगा।

भारतीय स्कूली शिक्षा के विभिन्न पक्षोँ के साथ बात करने के लम्बे अनुभव के बाद मैने महसूस किया है कि अधिकतर शिक्षा विशेषज्ञ और सरकारी नौकरशाह, भारत में शिक्षा सेवाओँ की उपलब्धता के सम्बंध में बात करते हुए यह मानते हैं कि यहाँ शिक्षा के क्षेत्र में निजी क्षेत्र की भूमिका अहम है और आगे भी बनी रहेगी (सरकारी आंकड़ें बताते हैं कि प्राइवेट क्षेत्र यहाँ 11 करोड़ बच्चोँ को शिक्षा मुहैया करा रहा है और इस आधार पर इस क्षेत्र में उनकी कुल हिस्सेदारी 44% है)। इसके अतिरिक्त, सरकारी मंत्री और नौकरशाह यह इच्छा भी रखते हैं कि ऐसे प्राइवेट स्कूल उपलब्ध होने चाहिए जहाँ अच्छी क्वालिटी वाली शिक्षा वाज़िब कीमत पर उपलब्ध हो, और इस बात को लेकर परेशान भी रहते हैं कि मौजूदा समय में ऐसा नहीं हो रहा है।

दूसरी तरफ, मैंने कई शोधकर्ताओं से भी बात की, पॉलिसी थिकंटैंक्स से बात की और निजी क्षेत्र के स्कूल सगंठनों से भी बात की और सरकार की इस आकांक्षा को पूरा करने की संभावित तौर तरीकों पर विचार किया। इस संदर्भ में जो कुछ महत्वपूर्ण सुझाव सामने आए उनमेँ से कुछ मान्यता सम्बंधी अर्हताओं में सुधार व इस क्षेत्र में प्रवेश के लिए गैर लाभकारी (नॉन-प्रॉफिट) होने की बाध्यता में सुधार से जुड़े थे। इसके साथ ही यह जरूरत भी महसूस की गई कि सरकार और निजी स्कूल एसोसिएशनोँ के बीच निरंतर संचार बना रहे और समस्याओँ का तुरंत निपटारा हो इसके लिए एक संयुक्त समिति होनी चाहिए। इसके साथ ही शिक्षा के क्षेत्र में एक पीपीपी मॉडल भी आना चाहिए जिसके माध्यम से सरकारी स्कूलोँ के संचालन की जिम्मेदारी निजी संस्थानोँ को दी जा सके ताकि यहाँ भी नवाचारों (इनोवेशन) को बढ़ावा मिल सके और सिस्टम में जवाबदेही सुनिश्चित हो सके।

भारतीय स्कूली शिक्षा के क्षेत्र में सुधार की मांग और तमाम बेहतरीन आइडिया उपलब्ध होने के बावजूद ऐसा लग रहा है कि यहाँ कोई बदलाव नहीं आ रहा है। मेरा अपना अनुभव ही नहीं बल्कि अन्य लोगोँ के अनुभव से भी ऐसा लगता है कि शिक्षा के क्षेत्र सुधार आना यदि असंभव नहीं तो अत्यंत मुश्किल जरूर है। सरकारी मंत्रियोँ और नौकरशाहोँ को इस सम्बंध में बात करने तक के लिए वक्त नहीं मिल पाता है क्योंकि जिस प्रकार से सिस्टम (भारी संख्या में स्कूलों का संचालन) कार्य करता है उससे कुल कार्य क्षमता की 99% ऊर्जा प्रबंधन कार्य में ही व्यय हो जाती है जिससे नीतियों के निर्माण और नियमन के लिए ऊर्जा बचती ही नहीं है। बतौर स्कूल संचालक मैं इस बात से अच्छी तरह वाकिफ हूं कि किसी स्कूल के संचालन और उसके प्रबंधन के कार्य में किस हद तक ऊर्जा की जरूत पड़ती है। संचालन कार्य में आने वाली दिन प्रतिदिन की चुनौतियां और आकस्मिक उत्पन्न हुए कार्य अधिकतम समय और ऊर्जा बर्बाद कर देते हैं। हरियाणा जैसे छोटे से राज्य में सरकार का शिक्षा विभाग 14000 से अधिक स्कूलों का संचालन करता है। इसमें बिल्कुल आश्चर्य की बात नहीं कि इस विशाल कार्य को अंजाम देने की प्रक्रिया के बाद निजी क्षेत्र सहित पूरे शिक्षा क्षेत्र के बाबत नीति निर्माण और नियमन के बारे में विस्तार से सोचने का समय नहीं बचता होगा।

ऐसी स्थिति में, कोई भी किसी तरह के निश्चित सुधार की उम्मीद नहीं की जा सकती है। यहाँ तक कि, नियमोँ में जो भी बदलाव हो रहे हैं वह सिर्फ बिना सोचे-समझे राजनैतिक प्रतिक्रिया स्वरूप हो रहे हैं, जैसे कि गुजरात में फीस रेगुलेशन बिल, जिनके जरिए सिर्फ समस्या के लक्षणोँ तक पहुंचा जा सकता है, इनकी जड हो खत्म नहीं किया जा सकता। इस प्रकार के काम चलाऊँ बदलाव स्थिति को और खराब कर सकते हैं।

प्राइवेट स्कूलोँ के साथ सौतेले व्यवहार का एक और कारण यह है कि पूरे सरकारी अमले का सारा समय और ऊर्जा सरकारी स्कूल सिस्टम के संचालन में लगा देने के बाद उनकी सफलता का मुख्य पैमाना परफॉर्मेंस (जैसे कि पास पर्सेंटेज, सरकारी स्कूलोँ के कितने बच्चे आईआईटी में प्रवेश ले सके, आदि आदि...) पर आंका जाता है। और उनकी परफॉर्मेंस को प्राइवेट स्कूलोँ के बच्चोँ के साथ तुलना करना तो जैसे अवश्यम्भावी रहता है, यहाँ तक कि मंत्रियोँ द्वारा मीडिया में इसे बढ़ा चढ़ाकर भी पेश किया जाता है। परिणाम स्वरूप, सरकारी और निजी स्कूलोँ के बीच एक प्रतिस्पर्धा का भाव उत्पन्न होता है और निजी स्कूलोँ के प्रति एक नकारात्मक भाव पनपने लगता है। यह नकारात्मक विचारधारा तब और ज्यादा भी हावी हो जाती है जब निजी स्कूलों के सम्बंध में कोई नीति बनायी जाती है। आप इस बात को एयरटेल और जियो के उदाहरण से समझ सकते हैं। सोचिए कि एयरटेल के मन में जियो के लिए कैसे विचार आते होंगे और क्या होगा यदि जियो को टेलिकॉम पॉलिसी तैयार करने की जिम्मेदारी प्रदान कर दी जाए!

इस स्थिति को एक अन्य उपमान से समझ सकते हैं, मान लीजिए कि केंद्र सरकार के वित्त मंत्री को पीएसयू बैंकोँ के प्रतिदिन के संचालन की जिम्मेदारी ही सौंप दी जाए। और हाँ, इनकी पूरी प्रक्रिया के नियमन के लिए आरबीआई के सुझाव भी उपलब्ध न हो! ऐसे में यह बड़ी आसानी से समझा जा सकता है कि यह स्थिति निजी क्षेत्र के बैंकोँ और वित्तीय संस्थानोँ के लिए कैसी होगी, ये सब बहुत ही खराब स्थिति में पहुंच जाएंगे और आर्थिक क्षेत्र के विकास की सेहत बुरी तरह से बिगड़ जाएगी।

चलिए एक पल को उस स्थिति की कल्पना करते हैं, जब वक्त की कमी के साथ सरकारी स्कूलोँ का संचालन प्राइवेट क्षेत्र के लिए तय नियमोँ के आधार पर किया जाए तब क्या होगा। मैं यह कल्पना कर सकता हूँ कि नियमोँ को तय करने के लिए समय का अभाव होने की स्थिति में सरकारी सिस्टम पर भी गहरा असर पड़ेगा। दूसरा किस स्थिति में है, इस बात का अनुमान लगाने के लिए खुद को भी उस स्थिति में रखकर अनुमान लगाना पडता है।

इन सारी समस्याओँ के समाधान का उपाय तकनीकी रूप से बहुत ही आसान है- पॉलिसी मेकिंग को सरकार के सर्विस डिलिवरी फंक्शन से अलग करके तीन हिस्सोँ में बांट दिया जाए और इन तीनोँ को एक संस्था की तीन भुजाओँ के रूप में एक-दूसरे के साथ जोड्कर रखा जाए। जैसा कि पीएसयू बैंकोँ मे मामले में होता है, सरकारी स्कूलोँ की ‘सर्विस डिलिवरी’ को अलग सरकारी विभाग में लाना चाहिए। स्पष्टतः चूंकि शिक्षा राज्य से सम्बंधित मामला है, ऐसे में ये उपाय राज्य स्तर पर ही किए जा सकते हैं। भारत को इस तरह के विभाजन के सम्बंध में केंद्र सरकार को तमाम विभागोँ का अनुभव है जैसे कि (वित्त, टेलीकॉम और एयरलाइन्स) और इसी प्रकार से राज्य को (विद्युत क्षेत्र) में विभिन्न स्तर पर जिम्मेदारियोँ के विभाजन का अनुभव है। ऐसे में, इस सुझाव को अमल में लाना बेहद आसान है। इसके आगे जो सबसे बड़ी रुकावट है वह है अ) विषय के संबंध में जागरूकता का अभाव ब) बदलावोँ के लिए राजनैतिक इच्छाशक्ति।

- विकास झुनझुनवाला (लेखक, सनसाइन स्कूल्स, नई दिल्ली के संस्थापक और सीईओ हैं)