वाउचर के जरिए होगा बच्चों का भला

पूर्वी दिल्ली के सीलमपुर स्थित नवीन पब्लिक स्कूल में 100 से ज्यादा ऐसे बच्चे हैं, जिनके अभिभावक 5,600 रुपये सालाना शुल्क भुगतान करते हैं। यह राशि दिल्ली में एक औसत निजी स्कूल के तिमाही शुल्क के बराबर है। 28 अन्य छात्र ऐसे भी हैं, जो दो वर्ष पहले तक सरकारी स्कूलों में पढ़ते थे। इसके बाद उन्होंने इस स्कूल में दाखिला लेने का फैसला किया। नवीन पब्लिक स्कूल के मालिक एवं प्राचार्य भगवती प्रसाद को इन छात्रों के अभिभावक वाउचरों के जरिए भुगतान करते हैं। दरअसल ये अभिभावक स्कूल च्वाइस नामक एक विशेष कार्यक्रम का फायदा उठा रहे हैं जिसका संचालन गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) सेंटर फॉर सिविल सोसायटी (सीसीएस) और वैश्विक प्रीपेड सेवा प्रदाता ईडनरेड करती है।

सीसीएस छात्रों के अभिभावकों को इलाके में मौजूद कुछ स्कूलों की एक सूची में से चयन का विकल्प मुहैया कराता है। इसी तरीके से कुछ अभिभावक भगवती प्रसाद के स्कूल का चयन कर रहे हैं। इस परियोजना के तहत लगभग 800 छात्रों को 4 वर्षों के लिए सालाना 3,700 रुपये के वाउचर की पेशकश की गई है। संगठन के मुताबिक सीमित संख्या में उपलब्ध सीटों के लिए हजारों अभिभावकों ने रुचि दिखाई है।

माया के पति दैनिक भत्ता पाने वाले मजदूर हैं। वह अपनी बेटी तृप्ति की पढ़ाई-लिखाई से खुश हैं। उनकी शिकायत केवल इतनी है कि वाउचर के जरिए भुगतान करने वाले अभिभावकों के बच्चे अलग कक्षाओं में बैठते हैं और उन्हें उतनी अंग्रेजी नहीं सिखाई जाती, जितनी दूसरे बच्चों को सिखाई जाती है।

हालांकि तमाम बच्चों का दाखिला तीसरी कक्षा में कराया गया है, लेकिन उनकी उम्र 11 वर्ष से लेकर 13 वर्ष तक है। भगवती प्रसाद कहते हैं कि जब इस तरह के छात्र पहली बार उनके स्कूल में आए तो वे न तो पढ़ सकते थे और न ही लिख सकते थे जबकि वे पांचवीं और चौथी कक्षाओं के छात्र थे। ये बच्चे घर में अपने-अपने मातापिता के साथ काम करते हैं और उनका मुख्य काम अगरबत्ती बनाना और बिजली के तार से तांबे को बाहर निकालना है। प्रसाद के मुताबिक इसी कारण से अभिभावक अपने बच्चों की पढ़ाई-लिखाई पर पर्याप्त ध्यान नहीं दे पाते हैं।

ऐसे बच्चे जब पहली मर्तबा स्कूल आए तो कुछ महीनों के लिए उनका दाखिला प्री-प्राइमरी स्टैंडर्ड में किया गया और उसके बाद उन्हें पहली कक्षा में डाल दिया गया। अगले साल, जब कार्यक्रम की अवधि खत्म हो जाएगी, तो इन बच्चों को पांचवीं कक्षा में डाला जा सकता है। प्रसाद का कहना है, 'हमारी कोशिश उन्हें उस दर्जें की पढ़ाई के काबिल बनाना और इसकी तैयारी कराना है।

नवीन पब्लिक स्कूल में तृप्ति और गुलिस्ता का दाखिला इसी विशेष कार्यक्रम के तहत कराया गया है। इससे पहले वे सरकारी स्कूलों में पढ़ती थीं। अब उनका कहना है कि वे अपनी-अपनी मौजूदा पढ़ाई-लिखाई को बेहतर समझती हैं हालांकि उन्हें फर्श पर बैठना पड़ता है और उनका दाखिला निचली कक्षाओं में हुआ है।

प्रसाद कहते हैं कि जब तक इस तरह के बच्चों पर अभिभावकों का पर्याप्त ध्यान नहीं जाता तब तक उनका भविष्य सुधारना कठिन है। उनका कहना है कि इन बच्चों के अभिभावक शायद ही स्कूल की बैठकों में हिस्सा लेते हैं और वे अपने-अपने बच्चों को साफ सुथरी पोशाक पहनाकर स्कूल नहीं भेजते। स्कूल आने वाले बच्चों को लगभग हर रोज शिकायत रहती है कि उन्हें समय पर जगाया नहीं गया। गौरतलब है कि शिक्षा के अधिकार कानून के तहत सीटें आरक्षित करके गरीब परिवारों के बच्चों को निजी स्कूलों में दाखिला लेने का हक दिया गया है।

सीसीएस के एक प्रवक्ता कहते हैं, 'हम उम्मीद करते हैं कि गरीब परिवार के बच्चों को निजी स्कूलों में दाखिला लेने के लिए सक्षम बनाने का हमारा वाउचर मॉडल सरकार को पसंद आएगा। ये वाउचर ईडनरेड की ओर से उपलब्ध कराए जाते हैं, जो इस विशेष कार्यक्रम के लिए बैक ऑफिस की तरह काम करती है।

ईडनरेड के प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्यकारी संदीप बनर्जी कहते हैं कि ये वाउचर कैश ट्रांस्फर (नकदी का हस्तांतरण) जैसे नहीं हैं। इसके बजाए उनका मकसद पहले से डिजाइन किए गए खास उद्देश्य हासिल करना है। मसलन, आर्यन पब्लिक स्कूल में शुल्क भुगतान और पोशाक के लिए उनका कूपन उपलब्ध कराया जाता है। यहां तक कि खाने-पीने की चीजों के लिए मासिक आधार पर 100 रुपये का एक कूपन भी जारी किया जाता है। उनकी कंपनी ने इलाके की किराना दुकानों के साथ करार किया हुआ है, ताकि बच्चों के अभिभावकों को उनकी पसंद के मुताबिक खाने-पीने की चीजें उपलब्ध कराई जा सकें। दुकानदारों को बाद में कूपन के लिए भुगतान कर दिया जाता है। उनका कहना है कि इस व्यवस्था में सबसे अच्छी बात यह है कि अभिभावक इन कूपनों का इस्तेमाल एक से अधिक स्कूलों में कर सकते हैं। इसलिए यदि किसी अभिभावक को लगता है कि कोई स्कूल उनकी उम्मीदों पर खरा नहीं उतर रहा है, तो वे इस कार्यक्रम के तहत सूचीबद्घ किसी अन्य स्कूल का विकल्प अपना सकते हैं।

बनर्जी कहते हैं कि पुडुचेरी, उत्तराखंड, राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात जैसे राज्यों की सरकारें निजी स्कूलों में गरीब परिवार के बच्चों को दाखिला दिलाने के तरीकों पर विचार कर रही हैं। निजी स्कूलों में गरीब बच्चों का दाखिला सुनिश्चित करने के लिए वाउचरों का इस्तेमाल एक बेहतर तरीका हो सकता है।

- श्रीलता मेनन