राज्य निभा रहे हैं बेहतरीन भूमिका

मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के जरिये छह से चौदह साल के हर बच्चे के लिए शिक्षा तक पहुंच का विस्तार करना,गुणवत्ता बढ़ाना और भागीदारी सुनिश्चित करना शिक्षा के अधिकार कानून का बहुत बड़ा वायदा है। इस कानून के तहत नियम बनाना राज्यों के हाथों में है और राज्य इस महान वायदे को पूरा करने के लिए नियम बना रहे हैं।

हम जब शिक्षा का अधिकार कानून की दूसरी वर्षगांठ मना रहे हैं तब 35 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में से गोवा और कर्नाटक को छोड़कर शेष  33 राज्यों ने नियमों को अधिसूचित कर दिया है। हालांकि गंभीर आशंकाएं थी कि कानून के कुछ प्रावधान उस मकसद में बाधक बन सकते हैं जिन्हें यह कानून हासिल करना चाहता है लेकिन राज्यों द्वारा बनाए गए नियमों से कई उत्साहजनक नतीजे निकलते हैं। कुछ राज्यों ने बहुत बेहतरीन नजरिया अपनाया है और कानून की आत्मा की रक्षा करने की कोशिश की है।

इस कानून के बारे में सबसे बड़ी चिंता यह थी कि स्कूलों की मान्यता के लिए जमीन के प्लाट की साइज,खेल का मैदान, शिक्षकों की योग्यता आदि जो नियम तय किए गए हैं उससे स्कूलों की लागत ही बढ़ती है। लेकिन कानून का उद्देश्य स्कूल चलाने की लागत बढ़ाना है या छात्रों की लिखाई पढ़ाई के नतीजों को बेहतर बनाना?

गुजरात और कर्नाटक (जिसे अभी नियमों के मसौदे को अधिसूचित करना है)ने पढ़ाई लिखाई के   परिणामों पर फोकस किया है। गुजरात के स्कूल मान्यता के फार्मूले के तहत 70 प्रतिशत महत्व स्कूलों के लिखाई पढ़ाई के सापेक्ष और निरपेक्ष नतीजों को दिया गया है। 15 प्रतिशत महत्व बुनियादी ढांचे को दिया गया है तो 15 महत्व छात्रों के गैर अकादमिक उपलब्धियों को। इस तरह प्रायवेट स्कूलों के लिए मान्यता के लिए बुनियादी ढांचे की आवश्यकता को 15 प्रतिशत महत्व ही दिया गया है। इसके अलावा इन शर्तों को पूरा न करनेवाले के खिलाफ कार्रवाई करने के बारे में भी व्यावहारिक नजरिया अपनाया गया है कि  इन स्कूलों को या तो तीसरे पक्ष या सरकार को हस्तांतरित किया जाएगा। यह स्वागतयोग्य है क्योंकि केंद्रीय कानून में इस तरह के स्कूलों को बंद करने और छात्रों और शिक्षकों को पड़ोस के सकूलों में स्थानांतरित करने का प्रावधान है।

कर्नाटक के नियमों के मसौदे में हर वर्ष 5प्रतिशत बच्चों के तीसरे पक्ष के द्वारा पढाई लिखाई के मूल्यांकन का प्रावधान है। नियमों  में सरकारी स्कूलों के पढाई लिखाई की गुणवत्ता के मापदंडों के आधार पर वर्गीकरण का प्रावधान है। गुणवत्ता में बुनियादी ढांचागत सुविधाएं भी शामिल हैं और पढाई लिखाई के नतीजे भी।

दूसरी तरफ पंजाब ने स्कूलों की मान्यता के लिए पंजाबी नजरिया अपनाया है। पिछली अप्रैल में राज्य के शिक्षामंत्री सेवा सिंह शेखो ने सुझाव दिया था कि कोई भी स्कूल सरकार को पहले  20000 रूपये और बाद में हर वर्ष 10000 रूपये का भुगतान करके मान्यता हासिल कर सकता है। इस तरह20000 गैर मान्यता प्राप्त  स्कूलों से 40करोड़ रूपये हासिल होंगे जिन्हें सरकारी स्कूलों की शिक्षा सुधारने के लिए खर्च किया जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट में सारी लड़ाई प्रायवेट स्कूलों में सामाजिक रूप से पिछडे,और आर्थिक दृष्टि से कमजोर छात्रों को 25 प्रतिशत आरक्षण देने को लेकर थी । कौन इस लाभ का हकदार है?

आंध्रप्रदेश ने 25 प्रतिशत सीटों के आबंटन के  लिए बहुत विस्तृत मार्गदर्शक सिद्दांत दिए हैं। अनाथों,एचआईवी प्रभावितों,अपंगों को 5 प्रतिशत सीटें दी गई हैं,अनुसूचित जातियों को 10प्रतिशत ,अनुसूचित  जनजातियों को 4प्रतिशत और अलपसंख्यक ,पिछडा़ वर्ग और प्रति वर्ष 60000 रूपये से कम कमानेवाली श्रेणियों को 6प्रतिशत रखी गई हैं। इसमें इन सीटों को भरने के बारे में कई और निर्देश हैं।

आरक्षण का यह क्रम मैदानी इलाकों के प्रायवेट स्कूलों पर लागू होता है। जहां अनाथ,एचआईवी प्रभावित और विकलांग आवेदक नहीं हैं या निश्चित सीमा तक ही हैं वहां रिक्त पद आनुसूचित जाति और जनजातियों द्वारा भरे जाएंगे। अनाथ ,एचआईवी प्रभावित  या विकलांगों ,एससी एसटी के आवेदन खत्म होने के बाद कोई सीटें नहीं भरी जा सकतीं तो ऐसी सीटों को कमजोर वर्गों के प्रतिशत के साथ जोड़ दिया जाएगा।

आदिवासी इलाकों में अनुसूचित जनजाति के बच्चों को सबसे पहले दाखिला दिया जाएगा। आदिवासी बच्चों के आवेदन खत्म होने के बाद एससी के छात्रों को दाखिला दिया जाएगा। एससी के आवेदन खत्म होने के बाद बची हुई सीटे अन्य वर्गों के द्वारा भरी जाएंगी।

अल्पसंख्यक संस्थाओं में  संबंधित अल्पसंख्यक छात्रों से सीटें पहले भरी जाएंगी।अल्पसंख्यकों के आवेदन खत्म होने के बाद  बची हुई सीटों को एसटी और पिछडे वर्गों के द्वारा भरा जाएगा।

केरल ने 25प्रतिशत सीटों को केवल दो हिस्सों में विभाजित किया है। 15 प्रतिशत सामाजिक पिछड़ों को तो 10प्रतिशत आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए।

पिछड़े समूह के छात्रों का मतलब है – एससी,एसटी और मछुआरे ,कयर बनानेवाले .कुम्हार,बेंत का काम करनवाले और बुनाई करनेवाले परिवार ,राज्य सरकार द्वारा परिभाषित समुदाय, अनाथ, एचआईवी प्रभावित, और अपंग आदि 6 से 14 वर्ष के बीच के लड़का, लड़की और  ट्रांसजेंडर छात्र शामिल हैं। कमजोर वर्ग के छात्रों से तात्पर्य यह है जिनके अभिभावक केरल राज्य में गरीबी की सीमा रेखा से नीचे की श्रेणी में आते हों।

दिल्ली का नियम यह है कि 25 प्रतिशत सीटों  को लाटरी के जरिये आबंटित किया जाए। ड्रा की सारी प्रक्रिया की वीडियोग्राफी की जाए और उसकी सीडी या डीवीडी को डिपुटी डायरेक्टर को सौंपा जाए।

प्रायवेट स्कूलों को 25 प्रतिशत सीटों के लिए किस तरह भुगतान किया जाएगा ? तमिलनाडु 50प्रतिशत भुगतान सितंबर और बाकी जनवरी में करेगा। और छात्रों की हर महीने 80 प्रतिशत अपस्थिति होनी चाहिए।टदि छात्र किसी महीने 10 दिन के लिे बीमार पड़ जाए तो क्या होगा? क्या स्कूल को उस माह का भुगतान नहीं होगा।मध्यप्रदेश साल में एक बार मार्च में भुगतान करेगा।

स्कूल मैनेजमेंट कमेटीज (एसएमसी) सरकारी स्कूलों में जवाबदेही की संस्कृति पैदा करने की कोशिश है जिसमें बहुसंख्य सदस्य अभिभावक ही होंगे। इस अनुच्छेद के दो पहलुओं में राज्यों ने कुछ नया जोड़ा है – एसएमसीज की संरचना के बारे में और एसएमसी के कामकाज।

एसएमसी की संरचना के बारे में आंध्रप्रदेश ने स्पष्ट किया है कि सबसे कम और सबसे ज्यादा अंक पाने वाले छात्र के अभिभावक एसएमसी के सदस्य होंगे। राजस्थान और आंध्रप्रदेश  दोनों ने प्रावधान किया है कि दो बच्चे एसएमसी के सदस्य होंगे। उत्तर प्रदेश ने प्रावधान किया है कि अभिभावक एसएमसी के अध्य़क्ष और उपाध्यक्ष होंगे।

एसएमसी के कामकाज के बारे में उत्तर प्रदेश एक अलग तरह का प्रावधान किया है कि शिक्षकों की शिकायतों को एसएमसी के तहत रखा है।कर्नाटक के नियमों के मसौदे में छात्रों के परफार्मेंस की निगरानी को एसएमसी के कामों के तहत रखा गया है।कर्नाटक और उत्तर प्रदेश दोनों ने एसएमसी का बैंक खाता रखने की सिफारिश की है ताकि वे अपना कामकाज चला सकें। इस तरह उन्हें केवल स्कूल विकास प्लान तैयार करने के अलावा ज्यादा अधिकार दिए हैं।

महाराष्ट्र सबसे ज्यादा उदार राज्य है – सभी छात्रों को  मुफ्त पाठ्यपुस्तकें,लेखन सामग्री और यूनिफार्म (सरकारी और प्रायवेट स्कूलो दोनों में) दिया जाएगा। यदि ऐसा है तो अपंग बच्चों  को मुफ्त विशेष लेखन सामग्री,और उपकरण उपलब्ध कराए जाने चाहिए।

- पार्थ जे शाह, सुजाथा मुथाय्या