कानून के शासन से ही लोकतंत्र बचेगा

 

सांप्रदायिक दंगों के मामलों में राजनेताओं सहित सभी दोषियों को दंड मिलने से हिंसा रुकने का रास्ता खुलेगा।

न्याय पाने की उम्मीद भी लुटा चुकेलोगों की सारी नजरें अब कुछ बड़े दिग्गज ‘परीक्षण मामलों’ पर टिकी हैं, जिनमें सज्जन कुमार और जगदीश टाइटलर जैसे वरिष्ठ राजनेता शामिल हैं। लोग मानते हैं कि इन्होंने नरसंहार करने वाली भीड़ का नेतृत्व किया था।

जिला जज आर्यन ने जैसे ही कांग्रेस नेता सज्जन कुमार को बरी करने का फैसला सुनाया, कोर्ट केभीतर बुरी तरह रोने की आवाजें आने लगीं, जो बाहर के लोगों में गुस्से के उफान से मेल खा रही थीं। यह फैसला 29 साल के इंतजार के बाद आया था और इसमें उन्हें उकसाने और राष्ट्रीय राजधानी में सिखों की हत्या करने वाली भीड़ का नेतृत्व करने जैसे गंभीर आरोपों से बरी किया गया था। वृद्ध लेकिन मजबूत बीबी जगदीश कौर मुख्य गवाह थी। उसने अपने पति और तीन भाइयों को भीड़ द्वारा कत्ल होते देखा था। गुस्से में उसने एलान किया कि ‘उसे अब न्याय प्रणाली पर कोई भरोसा नहीं रहा।’

प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की दो सिख गार्डो द्वारा 1984 में हत्या के बाद सिखों के नरसंहार मामले में एक भी बड़े कांग्रेसी नेता को दंड देने में न्यायिक प्रणाली की लगातार विफलता, सिख लोगों के जहन के खुले घावों से निकलती पीप है। इतने सालों में सिर्फ 29 लोगों को सजा मिली है। ये भी उसके प्यादे थे जिसे मोटे तौर पर संगठित नरसंहार माना जाता है, जिसमें आधिकारिक तौर पर 2733 मौतें केवल दिल्ली में हुई थीं।

नेल्ली, दिल्ली, भागलपुर और गुजरात में इस व्यापक हिंसा से बचे लोगों के साथ मेरा अनुभव बताता है कि जब तक वे अत्याचारियों को सजा मिलते नहीं देख लेंगे, उनके घाव नहीं भरेंगे। लेकिन न्याय देने की बजाय, भारतीय लोकतंत्र के संस्थानों ने दंड से मुक्ति की व्यवस्था की या आश्वस्त किया कि जिन लोगों ने धर्म (या जाति) के आधार पर लोगों को व्यापक हिंसा का निशाना बनाया, उन्हें कभी दंड न मिल सके। दंडमुक्ति की इस संस्कृति ने अगले नरसंहार के लिए ईंधन का काम किया।

अगर  1983 के नेल्ली नरसंहार (जिसमें आज तक एक भी व्यक्ति को सजा नहीं मिली) में पहले ही न्याय मिल जाता तो 1984 के दिल्ली, या उसके बाद 1989 के भागलपुर, 1992-93 के मुंबई और 2002 के गुजरात नरसंहार शायद नहीं होते। आखिरकार गुजरात दंगों ने मुझे इस बात का कायल बना दिया कि बिना कानूनी न्याय के सांप्रदायिक कत्ल होते रहेंगे, भारत की सदियों पुरानी बहुलवाद की कीमती विरासत नष्ट होती रहेगी। इसलिए हमें गुजरात की अदालतों में सैकड़ों आपराधिक मुकदमों को हल करवाने की कोशिश जारी रखनी होगी। यही कई अन्य अच्छे और बहादुर संगठन भी महसूस करते हैं। इसीलिए बिल्कीस बानो के सामूहिक दुष्कर्मियों और नरोडा के जनसंहार के दोषियों को सजा मिल सकी।

लेकिन 1984 के दंगों में बचे लोगों की यह उम्मीद मरती जा रही है कि बड़े पैमाने पर हत्या करने वालों को कभी दंड मिलेगा। सेंटर फॉर इक्विटी स्टडीज ने एक अध्ययन में कहा है, हमने 1984 के दंगों के बाद दर्ज ज्यादातर आपराधिक मामलों के रिकॉर्ड सूचना के अधिकार के तहत हासिल कर लिए हैं। हमें इन्हें ढंकने के ऐसे रोंगटे खड़े करने वाले तरीके का पता चला, जिसका ज्यादा परिष्कृत स्वरूप मुंबई और गुजरात दंगों में देखने को मिला।

पुलिस के सामने दर्ज बयान अजीब तरीके से अधूरे हैं, गवाहों और आरोपियों के नाम जान बूझकर छोड़ दिए गए हैं। जमानत आराम से मिल गई और गवाहों को धमकाया जा रहा है। कई आरोपी लापता बताए गए हैं। नकली-सी जांच है, अभियोजन पक्ष ऐसे काम कर रहा है मानो बचाव पक्ष हो, और अदालतें सोचे-विचारे तरीके से पुलिस और अभियोजन द्वारा मामलों को तबाह करता देखने को लाचार हैं।

न्याय पाने की उम्मीद भी लुटा चुकेलोगों की सारी नजरें अब कुछ बड़े दिग्गज ‘परीक्षण मामलों’ पर टिकी हैं, जिनमें सज्जन कुमार और जगदीश टाइटलर जैसे वरिष्ठ राजनेता शामिल हैं। ज्यादातर लोग मानते हैं कि इन्होंने नरसंहार करने वाली भीड़ का नेतृत्व किया था। इन मामलों की किस्मत हत्याकांड केसभी पीड़ितों और निस्संदेह पूरे समुदाय के लिए ‘सांकेतिक न्याय’ का प्रतिनिधित्व करेगी। फिर भी दोनों राजनेता अपने राजनीतिक कॅरिअर में मंजे हुए हैं और कानून के चंचल हाथ से बार-बार फिसलने और बचने का इंतजाम कर लेते हैं।

सज्जन कुमार के मामले में जज ने उनके खिलाफ जगदीश कौर की गवाही को इस आधार पर मानने से मना कर दिया कि उनका नाम 1984 को पुलिस में दर्ज शिकायत में नहीं है। भले ही सुप्रीम कोर्ट कई अवसरों पर कह चुका है कि अदालतों को देरी के आधार पर गवाही को खारिज करने से पहले सांप्रदायिक दंगे के तत्काल बाद की परिस्थितियों- डर, धमकी और खुले पुलिस दुराग्रह पर भी जरूर ध्यान देना चाहिए। जज ने माना कौर विश्वसनीय गवाह हैं, इसी मामले में दूसरे आरोपियों को सजा देने में हुई देरी केबावजूद उसकी गवाही मानने लायक है, लेकिन कुमार का मामला आते ही दोहरा मापदंड।

यह कि सज्जन कुमार के खिलाफ मामला केवल अफवाह या सुनी-सुनाई बातों पर आधारित नहीं है। तीन सरकारी समितियों और आयोगों- जैन-बनर्जी, जैन-अग्रवाल और जीटी नानावटी- में सबने कुमार के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश की है। कम से कम 7 एफआईआर में कुमार का नाम आरोपी के रूप में दर्ज है। लेकिन मामले बंद कर दिए गए क्योंकि घोषित कर दिया गया कि उनका ‘पता नहीं चल रहा।’ इस मामले में तो मई 2010 में सीबीआई ने सज्जन कुमार को कोर्ट में पेश ही नहीं किया।

जब मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट ने सीबीआई के डायरेक्टर को निजी तौर पर पेश होने की धमकी दी, तब मीडिया का ध्यान भी इस ओर गया। तब सज्जन कुमार दिल्ली हाई कोर्ट से जमानत लेने केबाद निचली अदालत में पेश हुए। 2012 में सीबीआई ने कोर्ट को बताया कि सज्जन कुमार ने सिख विरोधी दंगे आयोजित किए, उन्हें उनका संरक्षण हासिल था। इतना होते हुए भी वह आज भी आजाद है। सज्जन कुमार मामले में न्याय से सिर्फ सिख समुदाय की घायल आत्माओं के घाव ही नहीं भरेंगे। अगर हम और व्यापक हिंसा रोकना चाहते हैं, भारत के धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र को बचाना चाहते हैं और देश के कानून के समक्ष सब समान हैं, यह विश्वास दिलाना चाहते हैं तो इस मामले में न्याय होना बहुत महत्वपूर्ण है।

 

- हर्ष मंदर, (डायरेक्टर, सेंटर फॉर इक्विटी स्टडीज)

साभारः दैनिक भास्कर