साक्षात्कारः कानून बनाना ही नहीं उनका समापन भी विधायिका का ही काम है

26 नवंबर यानी की राष्ट्रीय संविधान दिवस। इस दिन देश के समस्त नागरिकों विशेषकर युवाओं को संविधान और संविधान दिवस की महत्ता से अवगत कराने के लिये सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर तमाम कार्यक्रमों और गोष्ठियों का आयोजन किया जाता है। कुछ वर्षों से इस दिन को पुराने और अप्रासंगिक कानूनों के समापन के दिवस के तौर पर मनाने की मांग जोर पकड़ती जा रही है। इस मांग को अभियान का रूप देने के अगुआ के रूप में थिंकटैंक सेंटर फॉर सिविल सोसायटी का नाम सर्वप्रमुख है। इस विषय पर सेंटर फॉर सिविल सोसायटी के एसोसिएट डायरेक्टर व सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रशांत नारंग से बातचीत कर रहे हैं आज़ादी.मी के संपादक अविनाश चंद्र..

प्रश्नः प्रशांत, सबसे पहले तो आप हमारे पाठकों को ये बताइए कि ‘रिपील लॉ कैंपेन यानी कानूनों के समापन का अभियान’ है क्या?

उत्तरः इस कैंपेन को समझने के लिए सबसे पहले हमारे लिए यह जानना जरूरी है कि किसी भी देश में संविधान का महत्व और उद्देश्य होता क्या है? दरअसल, देश का संविधान वह व्यवस्था होती है जिसके परे जाना देश की  सरकार जिसमें कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका शामिल होते हैं, के लिए संभव नहीं होता है। अब आते हैं देश में संविधान दिवस मनाने और इसकी महत्ता पर। हम संविधान दिवस मनाते समय बड़े गौरवान्वित होते हैं कि हमारा संविधान दुनिया का सबसे लंबा संविधान है। जबकि संविधान का मूल वहां के नागरिकों की स्वतंत्रता की रक्षा करना होता है। सबसे लंबा संविधान होने का मतलब ये है कि संविधान में अनेकों पेंच हैं, बहुत सारे अगर-मगर है और इसे समझना बेहद पेचीदा है। हमारा विश्वास है कि नागरिक और राज्य के बीच की सीमाएं बहुत स्पष्ट होनी चाहिए। यानी ये समझना जरूरी है कि नागरिकों के मौलिक अधिकार कौन कौन से हैं और राज्य किस हद तक उसमें दखलंदाजी नहीं कर सकता है।
देश के कानून की किताब में तमाम ऐसे कानून हैं जो अंग्रेजों के जमाने के हैं और 150 वर्ष से भी अधिक पुराने हैं। संभव है कि ये कानून उस समय के लिए आवश्यक होंगे लेकिन वर्तमान समय में ये अप्रासंगिक हो चुके हैं। इसके अलावा सरकारों के द्वारा समय समय पर तमाम नए कानून बनाए जाते हैं। इनमें ऐसे कानून भी होते हैं जो पूराने कानूनों को बर्खास्त करते हैं या फिर उनका विस्तार करते हैं। इस प्रकार वे पुराने कानून अप्रासंगिक हो जाते हैं लेकिन उनके समापन पर आमतौर पर ध्यान नहीं दिया जाता है। विधि की किताबों में इन कानूनों के बने रहने से असमंजस की स्थिति पैदा होती है और उनके दुरुपयोग की भी संभावना बनी रहती है। इसलिए  हमारी मांग है कि वर्ष में कम से कम एक दिन ऐसा अवश्य हो जिसदिन सभी मशीनरी मिलकर कानूनों के समापन का काम करे।

प्रश्नः जरूरी कानूनों को बनाने और अप्रासंगिक हो चुके कानूनों के समापन का काम तो सतत चलने वाली प्रक्रिया है, फिर एक दिन विशेष क्यों?

उत्तरः बहुत अच्छा प्रश्न है ये। देखिए संसद के द्वारा कानून बनाने के लिए सत्र तो तय हैं लेकिन कानूनों के समापन के लिए नहीं है। हमारा प्रयास विधि निर्माताओं को उनकी इस जिम्मेदारी को याद दिलाना है कि कानून बनाना यदि उनका काम है तो कानूनों का समापन भी विधायिका का ही काम है, जो बेहद जरूरी है। हम सिर्फ ये चाहते हैं कि कम से कम एक दिन तो वर्ष में ऐसा जरूर हो जिस दिन कानून को समाप्त करने पर विचार किया जाए। इस नेक कार्य के लिए संविधान दिवस से बेहतर दिन और क्या हो सकता है।

प्रश्नः कुछ ऐसे कानूनों का उदाहरण दीजिए जिससे पाठकों को समझ में आए की बेकार कानूनों से आपलोगों का क्या तात्पर्य है?

उत्तरः द मद्रास लाइव स्टॉक इम्प्रूवमेट एक्ट 1940 के मुताबिक गाय का बछड़ा आगे चलकर बैल बनेगा अथवा सांड यह तय करने का अधिकार पशुपालक को नहीं बल्कि सरकार को है। सरकार द्वारा जारी लाइसेंस के अनुसार ही पशुपालक बछड़े को सांड या बैल के तौर पर अपने पास रख सकता है। वर्तमान समय में यह कानून बेहद अप्रासंगिक है और गाय का बछड़ा बैल बने या सांड यह अधिकार पशुपालक के उपर छोड़ना ही बेहतर है। हैबिचुअल ऑफेंडर्स एक्ट नामक कानून एक जनजाति विशेष के सभी लोगों को अपराधी मानते हुए उनके अधिकारों को सीमित करता है। यह कानून अंग्रेजों द्वारा अपने निहित स्वार्थो के तहत लागू किया गया था और आज के दौर में ऐसे भेदभाव वाले कानून अस्वीकार्य हैं। अंग्रेजों के दौर का ही एक और कानून है जिसे सराय एक्ट 1867 के नाम से जानते हैं। देश के सभी सराय आदि इस एक्ट के तहत आते हैं। यह एक्ट कहता है सभी सरायों को सभी आने जाने वालों को मुफ्त में पानी पिलाना जरूरी होगा। ऐसे तमाम कानून है जो आज के जमाने के गणतंत्र देश में भेदभाव और शोषण को बढ़ावा देते हैं।

प्रश्नः यदि बेकार और अप्रासंगिक कानूनों को विधि की किताब से हटा दें तो यह किस प्रकार से गुड गवर्नेंस के कार्य को बढ़ावा देंगे?

उत्तरः गुड गवर्नेंस के तहत सिर्फ पुराने कानूनों का समापन ही पर्याप्त नहीं है। लेकिन अप्रासंगिक कानूनों का समापन गुड गवर्नेंस की ओर एक पहला और सबसे महत्वपूर्ण काम है। इसके बाद का कदम मौजूदा कानूनों और आगामी कानूनों की गुणवत्ता को सुनिश्चित करना है। जिस प्रकार घर अच्छा दिखे उसके लिए उसकी साफ सफाई आवश्यक है और पुराने और बेकार पड़ी चीजों का निस्तारण इसका पहला कदम है ठीक उसी प्रकार गुड गवर्नेंस के लिए पुराने और बेकार कानूनों का समापन इस ओर पहला कदम है।

प्रश्नः एक आखिरी प्रश्न। अप्रासंगिक कानूनों को दूर करने के कार्य से देश के आम नागरिकों का क्या फायदा होगा? विशेषकर तब जब कि आम आदमी को इस बात का पता ही नहीं कि कौन से कानून विधि की किताब में हैं और उससे उनका क्या फायदा या नुकसान है?

उत्तरः देखिए, ऐसे कानून जो प्रयोग में नहीं हैं उनका आम तौर पर नागरिकों के जीवन पर ज्यादा फर्क रोजमर्जा की जिंदगी पर तो नहीं पड़ता लेकिन गाहे बगाहे वर्ष दो वर्ष के दौरान ऐसा होता रहता है कि किसी ने पुराने पड़े किसी कानून का दुरुपयोग कर लिया। उस समय वह कानून चर्चा में आता है और फिर न्यायपालिका और संबंधित विभागों की नजर उस ओर जाती है और उसके समापन के प्रयास किये जाते हैं। इसलिए कानून यदि कम और स्पष्ट होंगे तो आम आदमी के जीवन पर इसका काफी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

इस साक्षात्कार को https://azadi.me/appeal-for-repeal-law-day-on-constitution-day-of-India पर भी देखा जा सकता है।

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