बाल श्रम क़ानून में सुधार– सही या गलत?

कैबिनेट द्वारा अनुमोदित बाल मजदूरी पर प्रस्तावित अधिनियम को मीडिया बाल मजदूरी को बदावा देने वाला एक पिछडा कदम बता रही है। वास्तव में, यह अधिनियम बाल मजदूरी को लगभग पूरी तरह से प्रतिबंधित  करता है। 
 
वर्तमान कानून सीमित तौर पर ही बाल मजदूरी को निषेध करता है – अनुसूची में वर्णित 16 निर्दिष्ट व्यवसायों और 65 निर्दिष्ट प्रक्रमों जिसमे फैक्ट्री अधिनियम में निर्दिष्ट प्रक्रमों के अलावा और भी खतरनाक प्रक्रम शामिल है। सामान्य या गैर-जोखिम रोज़गार क्षेत्रों में बाल मजदूरी पर रोक नहीं है। प्रस्तावित बिल बाल-श्रम पर रोक का दायरा ना केवल सार्वत्रिक बनाने को है, बल्कि किशोरों (14-18 वर्ष) के जोखिम-भरे-क्षेत्रों में रोज़गार पर भी पाबंदियां लगाने को हैं। दो अपवाद छोड़े गए है – एक, जहां बच्चा अपने परिवार  या पारिवारिक व्यवसाय में मदद करता हो और दूसरा, जो बच्चा दृश्य-श्रव्य मनोरंजन क्षेत्र में कार्यरत हो। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया है कि इस तरह के कार्य में केवल विद्यालय के समय पश्चात अथवा छुट्टियों में कार्यरत हुआ जा सकता है।
 
देश में बड़े पैमाने पर परिवारों के भीतर बच्चे कृषि कार्य या कारीगरी में अपने माता-पिता की मदद करते हैं और इस तरह अपने माता-पिता की मदद करते हुए वे इस काम के गुर भी सीखते हैं। इसलिए बच्चे की शिक्षा और देश की सामाजिक-आर्थिक स्थिति के साथ इसके ताने-बाने के बीच संतुलन बैठाने की जरुरत है। यही वजह है कि कैबिनेट ने बाल श्रम कानून में संशोधनों को मंजूरी देते हुए बच्चों को उनके परिवार या परिवार के उद्यमों में मदद देने की अनुमति दे दी हैं।
 
कई एनजीओ कार्यकर्ताओं ने इस बिल की इसी आधार पर आलोचना की है कि ये दो अपवाद भी क्यों छोड़े गए। क्यों नहीं बाल श्रम को पूरी तरह से प्रतिबंधित किया जाए। लेकिन, इस अवधारणा में कई सवाल नदारद हैं जैसे- क्यों गरीब अभिभावक अपने बच्चों को काम पर भेजते हैं? क्यों प्रतिबंधों, छापों और बचाव अभियान के बावजूद बच्चे वापिस काम पर जाते है? 
 
बाल श्रम के कारणों में मांग और आपूर्ति पक्ष दोनों शामिल है – यानि कि बाल मजदूरों की बाज़ार में मांग और उनकी सस्ती उपलब्धता।  
 
बाल मजदूरी की उपलब्धता का सबसे बड़ा कारण है – सरकारी स्कूलों में पढाई ना होना। भारतीय सरकारी स्कूल अध्यापक-अनुपस्थिति के मामले में विश्व में युगांडा के बाद दूसरे नंबर पर हैं। शिक्षा की गुणवत्ता जांचने वाली पीसा स्टडी में भारत का प्रदर्शन इतना खराब था कि सरकार ने उसके बाद कभी उसमे भाग नहीं लिया। एनजीओ ‘प्रथम’ द्वारा किया जाने वाला ‘असर’ सर्वे हमें बताता है कि सरकारी स्कूलों के अधिकतर बच्चे पांचवी कक्षा में होने के बावजूद तीसरी कक्षा के स्तर पर नहीं पहुँच पाते। दूसरा, स्कूलों में कौशल विकास बिलकुल भी नहीं बल्कि मैकाले-ब्रांड क्लर्क बनाने वाली रट्टा-मार पढाई ही होती है। तो क्यों बच्चे स्कूल जाना चाहेंगे और क्यों अभिभावक उन्हें स्कूल भेजना चाहेंगे? 
 
बाल-श्रम की सस्ती उपलब्धता का  कारण है – भारतीय अर्थव्यवस्था में अनौपचारिक या असंगठित  सेक्टर का तेजी से विकास। 120 करोड़ नागरिकों के देश में केवल 3 करोड़ कर्मचारी जो की संगठित सेक्टर में है, 400 श्रम कानूनों में किसी ना किसी कानून के अंतर्गत आते हैं। करीब 36 करोड़ श्रमिक किसी भी सार्थक श्रम कानून के अंतर्गत नहीं आते। चूँकि संगठित सेक्टर कठोर श्रम कानूनों व नियमों में अत्यधिक जकड़ा हुआ है जिससे श्रम नियमों की कड़ी निगरानी तो होती है पर इसके अनपेक्षित परिणामस्वरुप काफी काम असंगठित, अनौपचारिक क्षेत्र को जाता है। नतीजतन, असंगठित क्षेत्र कृषि-क्षेत्र के बाद बाल-श्रम का सबसे बड़ा नियोक्ता है। बड़े उद्यमों में मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी, कुछ बुनियादी सुविधाएँ तो देनी आवश्यक है ही, साथ ही उन्हें नौकरी से निकालना या छंटनी करना बहुत ही मुश्किल है और इसलिए संगठित सेक्टर में कठोर श्रम कानूनों के कारण लागत अधिक होती है। सो, अपनी लागत कम करने के लिए, अक्सर काम को ठेकेदारों को दिया जाता है जिनपर निगरानी रख पाना बहुत मुश्किल हो जाता है। असंगठित क्षेत्र का संगठित ना हो पाना, आधुनिकरण ना कर पाना या व्यापार के पैमाने को न बढ़ा पाना – ये बाल-मजदूरी की मांग का कारण है। एक ओर संगठित सेक्टर में अत्यधिक कड़े कानून है, दूसरी और असंघटित सेक्टर में कोई निगरानी नहीं। ज़रूरत संतुलन बनाने की है। अगर श्रम कानूनों में सुधार किया जाए, तो वयस्क श्रम भी सस्ते में उपलब्ध हो सकेगा और बाल श्रम की मांग घटेगी।
 
गरीबी का एक कारण लाईसेंस परमिट राज भी है। शहर के सूक्ष्म-उद्यमों, जैसे की साइकिल रिक्शा, ऑटो रिक्शा, रेहड़ी-पटरी आदि को देखे तो इन सभी में व्यापार के विस्तार पर रोक है। आप एक से अधिक परमिट नहीं ले सकते और ना ही परमिट किराए पर दे या ले सकते हो। तो फिर, गरीब कैसे अपने व्यवसाय को बढ़ा पायेगा और अमीर बनेगा? इसी तरह, कृषि में भी, भू-सुधार कानूनों के परिणामस्वरूप छोटे भू-पट्टों बने, जिन के कारण खेती की उत्पादकता बहुत कम रह गयी, और गरीब किसानों को शहरों की और पलायन करना पड़ा। 
 
1991 और 2001 के बीच बाल-श्रम (5-14 साल के आयु वर्ग के बच्चों) में वृद्धि हुई – 1,12,00,000-1,26,00,000. लेकिन 2011 में,  यह संख्या मात्र 43 लाख रह गयी/ यह सरकारी जनगणना के आंकड़े हैं और (अनौपचारिक अनुमान भारत में 6 करोड बच्चे मजदूर है) जो काफी कम है/ उसे ध्यान में रखते हुए भी , 2001 और 2011 के बीच इस ज़बरदस्त  गिरावट का उच्च विकास दर और गरीबी में कमी से कुछ तो सम्बन्ध अवश्य है, ऐसा हम कह सकते है। सुरेश तेंदुलकर सूत्र के अनुसार, 1993-94 और 2004-05 के बीच गरीबी 0.74 प्रतिशत अंक घटी और 2004-05 और 2011-12 के बीच गरीबी 2.18 प्रतिशत अंकों घटी। हालांकि जागरूकता और सतर्कता भी बढ़ गई है और पुलिस में भी इस अवधि के दौरान सुधार हुआ है, लेकिन फिर भी इन आंकडो के बीच ठोस सम्बन्ध है।
 
यह अच्छा होता कि वर्तमान सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों को देखते हुए गैर-जोखिम क्षेत्रों में भी बाल श्रम को प्रतिबंधित ना करके स्कूल के बाद वाले समय और छुट्टियों में स्वीकार्य रहने दिया जाता। ज़ाहिर सी बात है कि बाल श्रम अगर वैध हो तो बाल-श्रमिकों के पास रोज़गार के अधिक सुअवसर होंगे जबकि अवैध होने पर केवल माफिया ठेकेदार किस्म के लोग उन्हें नौकरी पर रख शोषण और दमन करेंगे। 
बाल मजदूरी के जड़ से उन्मूलन के लिए प्रतिबन्ध की बजाय तीन सबसे प्रभावी उपाय है – (1) अच्छे स्कूल – वाउचर और निजी स्कूलों को बढ़ावा, (2) लाइसेंस परमिट राज का खात्मा और उच्च विकास दर; और (3) श्रम कानूनों में सुधार। 
बाल-श्रम के बुनियादी आर्थिक कारणों को संबोधित किए बिना आप कितने ही छापा मार अभियान चलाये या प्रतिबन्ध लगाएं, यह समस्या जड़ से खत्म नहीं होगी।
 
 
 
- एड. प्रशांत नारंग (लेखक सेंटर फॉर सिविल सोसायटी व iJustice से जुड़े हैं)