जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध..

आज रामधारी सिंह दिनकर की जयंती है। अज्ञेय ने उनके बारे में कहा था, ''उनकी राष्ट्रीय चेतना और व्यापक सांस्कृतिक दृष्टि, उनकी वाणी का ओज और काव्यभाषा के तत्वों पर बल, उनका सात्विक मूल्यों का आग्रह उन्हें पारम्परिक रीति से जोड़े रखता है।'' वाकई दिनकर समूचे जीवन राष्ट्र और राष्ट्रवाद से जुड़े रहे। 

भारतीय पौराणिक आख्यान हों, राष्ट्रवाद, पुराण या किसान, सबकी व्याख्या में दिनकर के लिए भारत ही सर्वोपरि था। उनका शुरुआती जीवन काफी संघर्ष में बीता। वह बिहार के मुंगेर जिले के सिमरिया घाट नामक गांव में 23 सितंबर, 1908 को पैदा हुए थे। शिक्षा मोकामा घाट के स्कूल तथा फिर पटना कॉलेज में हुई जहां इतिहास में बीए आनर्स की परीक्षा उत्तीर्ण की।

बाद में वह एक विद्यालय के प्रधानाचार्य, सब-रजिस्ट्रार, जनसम्पर्क विभाग में उप-निदेशक, भागलपुर विश्वविद्यालय के कुलपति, भारत सरकार के हिंदी सलाहकार आदि विभिन्न पदों पर रहे। इस दौरान उन्होंने प्रचुर लेखन किया। भाषाओं को सीखने के प्रति उनकी ललक बेहद सराहनीय थी। कहते हैं उन्हें संस्कृत, अंग्रेजी, उर्दू, बांग्ला आदि भाषाओं का उम्दा ज्ञान था। वे अहिंदीभाषी जनता में भी बहुत लोकप्रिय थे, क्योंकि उनका हिंदी प्रेम दूसरों की अपनी मातृभाषा के प्रति श्रद्धा और प्रेम का विरोधी नहीं, बल्कि प्रेरक था।

1952 में प्रकाशित खंडकाव्य 'रश्मिरथी' ने उन्हें लोकप्रियता के नए शिखर पर पहुंचा दिया। रश्मिरथी में उन्होंने कर्ण की महाभारतीय कथानक से ऊपर उठाकर उसे नैतिकता और वफादारी की नई भूमि पर खड़ा कर उसे गौरव से विभूषित कर दिया है। 'रश्मिरथी' में दिनकर ने कर्ण के चरित्र के सभी पक्षों का सजीव चित्रण किया है।

रामधारी सिंह दिनकर की मृत्यु 25 अप्रैल, 1974 को हुई, पर इससे पहले वे विविध विधाओं में भरपूर साहित्य सृजित कर चुके थे। अपनी पुस्तकों और साहित्य-सेवाओं के लिए उन्हें कई विश्वविद्यालयों से डीलिट की मानद उपाधि मिली थी। इसके अलावा वह साहित्य अकादमी पुरस्कार तथा ज्ञानपीठ सम्मान से भी नवाजे गए। भारत सरकार ने उन्हें पद्मभूषण की उपाधि से सम्मानित किया था..

दिनकर की याद में उनकी ही एक कविता 'समर शेष है..'

ढीली करो धनुष की डोरी, तरकस का कस खोलो, किसने कहा, युद्ध की वेला चली गयी, शांति से बोलो?

किसने कहा, और मत वेधो ह्रदय वह्रि के शर से, भरो भुवन का अंग कुंकुम से, कुसुम से, केसर से?

कुंकुम? लेपूं किसे? सुनाऊँ किसको कोमल गान? तड़प रहा आँखों के आगे भूखा हिन्दुस्तान।

फूलों के रंगीन लहर पर ओ उतरनेवाले! ओ रेशमी नगर के वासी! ओ छवि के मतवाले!

सकल देश में हालाहल है, दिल्ली में हाला है, दिल्ली में रौशनी, शेष भारत में अंधियाला है ।

मखमल के पर्दों के बाहर, फूलों के उस पार, ज्यों का त्यों है खड़ा, आज भी मरघट-सा संसार।

वह संसार जहाँ तक पहुँची अब तक नहीं किरण है, जहाँ क्षितिज है शून्य, अभी तक अंबर तिमिर वरण है

देख जहाँ का दृश्य आज भी अन्त:स्थल हिलता है, माँ को लज्ज वसन और शिशु को न क्षीर मिलता है

पूज रहा है जहाँ चकित हो जन-जन देख अकाज, सात वर्ष हो गये राह में, अटका कहाँ स्वराज?

अटका कहाँ स्वराज? बोल दिल्ली! तू क्या कहती है? तू रानी बन गयी वेदना जनता क्यों सहती है?

सबके भाग्य दबा रखे हैं किसने अपने कर में? उतरी थी जो विभा, हुई बंदिनी बता किस घर में

समर शेष है, यह प्रकाश बंदीगृह से छूटेगा, और नहीं तो तुझ पर पापिनी! महावज्र टूटेगा

समर शेष है, उस स्वराज को सत्य बनाना होगा, जिसका है ये न्यास उसे सत्वर पहुँचाना होगा

धारा के मग में अनेक जो पर्वत खडे हुए हैं, गंगा का पथ रोक इन्द्र के गज जो अड़े हुए हैं

कह दो उनसे झुके अगर तो जग मे यश पाएंगे, अड़े रहे अगर तो ऐरावत पत्तों से बह जाऐंगे

समर शेष है, जनगंगा को खुल कर लहराने दो, शिखरों को डूबने और मुकुटों को बह जाने दो

पथरीली ऊँची जमीन है? तो उसको तोडेंगे, समतल पीटे बिना समर कि भूमि नहीं छोड़ेंगे

समर शेष है, चलो ज्योतियों के बरसाते तीर, खण्ड-खण्ड हो गिरे विषमता की काली जंजीर

समर शेष है, अभी मनुज भक्षी हुंकार रहे हैं, गांधी का पी रुधिर जवाहर पर फुंकार रहे हैं

समर शेष है, अहंकार इनका हरना बाकी है, वृक को दंतहीन, अहि को निर्विष करना बाकी है

समर शेष है, शपथ धर्म की लाना है वह काल, विचरें अभय देश में गाँधी और जवाहर लाल

तिमिर पुत्र ये दस्यु कहीं कोई दुष्काण्ड रचें ना, सावधान हो खड़ी देश भर में गाँधी की सेना

बलि देकर भी बलि! स्नेह का यह मृदु व्रत साधो रे, मंदिर औ' मस्जिद दोनों पर एक तार बाँधो रे

समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध, जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध