शिक्षा में निजी क्षेत्र की भूमिका पर अमिताभ कांत का यू-टर्न

पिछ्ले हफ्ते आई एक न्यूज रिपोर्ट ने काफी खलबली मचा दी थी, जिसमेँ नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत ने कहा था कि स्कूल, कॉलेज और जेलोँ को निजी क्षेत्र के हवाले कर देना चाहिए। जैसा कि पहले से पता था, उनके इस वक्तव्य पर बवाल तो मचना ही था, अधिकतर लोग इस क्षेत्रोँ के निजीकरण की बात सुनकर नाराज हुए, परिणाम्स्वरूप कांत को यह स्पष्ट करना पड़ा कि वह सिर्फ स्कूलोँ के भौतिक संसाधनो में निजी क्षेत्र की भागीदारी की बात कर रहे थे।

लेकिन शिक्षा के अकादमिक स्तर पर निजी क्षेत्र की अधिक भागीदारी में समस्या क्या है? ऐसा तो नहीं है मौजूदा समय में प्राइवेट प्लेयर्स इस क्षेत्र में काम नहीं कर रहे हैं। और ऐसा भी नहीं है कि वे खराब काम कर रहे हैं। जबकि सच तो यह है कि पैरेंट्स का रुझान भी इनकी तरफ ज्यादा है। अब इस बात पर फोकस करते हैं कि वो कौन सी बात है जिसकी वजह से स्कूल स्तर पर निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने की बात पर लोगोँ की भावुक प्रतिक्रिया आ रही है।

युनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इंफॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन (यूडीआईएसई) के आंकड़ें यह दिखाते हैं कि सरकारी स्कूलोँ में दाखिला लेने वाले बच्चों की संख्या में लगातार गिरावट आ रही है और निजी स्कूलोँ में होने वाले दाखिले लगातार बढ़ रहे हैं। 2013-14 में, कक्षा 1 से 8 में प्राइवेट स्कूलोँ में होने वाले दाखिले 35.82 फीसदी थें; 2015-16 में यह 37.95 फीसदी हो गया था। दूसरी ओर, इस दरम्यान सरकारी स्कूलोँ में आंकड़ा 61.32 फीसदी से घटकर 59.44 फीसदी हो गया। युनिवर्सिटी कॉलेज, लंदन की गीता गांधी किंग्डन ने दिखाया है कि निजी स्कूलोँ में होने वाले दाखिलोँ की संख्या में कैसे दोगुना की बढ़ोत्तरी हुई है। 2005 में यह आंकड़ा 15.1 फीसदी का था जो कि 2014 में बढ्कर 31.4 फीसदी हो गया। उनके मुताबिक राजस्थान के 18,000 सरकारी स्कूलोँ में 20 से भी कम छात्र हैं, महाराष्ट्र के 4,000 स्कूलोँ में यही स्थिति है जबकि छत्तीसगढ़ के 3,000 स्कूलोँ में 10 से भी कम छात्र हैं।

अब जिनके पास पैसा है वे अपने बच्चोँ को सरकारी स्कूल में नहीं भेजते हैं; सिर्फ वही लोग भेजते हैं जो खर्च वहन नहीं कर सकते। तो अब सवाल यह उठता है कि लोग क्यूँ निजी स्कूलोँ में बच्चोँ को भेजना चाहते हैं जबकि सरकारी स्कूल में भेजकर अपने पैसे बचा सकते हैं, जहाँ सबकुछ निशुल्क उपलब्ध है?

किंग्डन कहती हैं, ऐसा इसलिए है क्योंकि प्राइवेट स्कूलों में पैसोँ की पूरी कीमत वसूल होती है। गैरसरकारी संस्था प्रथम की एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट (एएसईआर) के 2010 से 2014 के बीच के आंकड़ें बताते हैं कि बच्चोँ के सीखने के स्तर के मामले में निजी स्कूल सरकारी स्कूलोँ की तुलना में काफी बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं। 2010 में सरकारी स्कूल के चौथी कक्षा के 55.1 फीसदी बच्चे कम से कम घटाव के सवाल हल कर लेते थे, लेकिन 2014 में यह आंकड़ा घटकर 32.3 फीसदी हो गया। पांचवी कक्षा के छात्र जो भाग के सवाल लगा लेते थे उनकी संख्या 33.9 फीसदी से घटकर 20.7 फीसदी हो गई।
इस तरह की गिरावट निजी स्कूलोँ के मामले में भी देखी गई है। साल 2010 में चौथी कक्षा के 67.7 फीसदी बच्चे घटाव का सवाल हल कर सकते थे और 2014 में सिर्फ 59.3 फीसदी कर सके। 2010 में पांचवीँ कक्षा के 44.2 फीसदी बच्चे भाग के सवाल हल कर सकते थे लेकिन 2014 में सिर्फ 39.3 फीसदी बच्चे ही ऐसा कर पाने में सक्षम पाए गए। इसी तरह की स्थिति पढ़ने के मामले में भी देखी गई।

संसाधनो की बात करेँ तो यूडीआईएसई के आंकड़ें बताते हैं कि स्कूल के हर स्तर यानि की प्राथमिक, उच्च प्राथमिक अथवा दोनों के सम्बद्ध स्कूलोँ के स्तर पर भी, सरकारी स्कूलोँ के अपेक्षा प्राइवेट स्कूलोँ में औसतन अधिक क्लासरूम हैं। यही स्थिति शिक्षकोँ की संख्या के मामले में भी है - सिर्फ अपर प्राइमरी के साथ सेकंडरी और हायर सेकंडरी वाले स्कूलोँ में अपवाद स्वरूप स्थिति थोड़ी अलग है, जहाँ सरकारी स्कूलोँ में प्राइवेट स्कूलोँ की अपेक्षा औसतन अधिक संख्या में टीचर्स हैं। वस्तुतः, 2010-11 और 2011-12 के बीच 5.2 से 5 की गिरावट के बाद निजी स्कूलोँ में शिक्षकोँ की संख्या धीरे-धीरे बढ रही है, जो 2015-16 में 5.3 पर है। दूसरी तरफ सरकारी स्कूलोँ में शिक्षकोँ की औसत संख्या 2010-11 और 2014-15 के बीच 2.8 बनी हुई थी लेकिन 2015-16 में यह घटकर 2.7 हो गई।
ऐसा तो तब है जबकि किंग्डन के मुताबिक विभिन्न राज्योँ में सरकारी स्कूलोँ का प्रति छात्र खर्च प्राइवेट स्कूलोँ की तुलना में 2 से 12 गुना तक अधिक है।

ठीक है, चलिए शिक्षा को पूरी तरह से निजी क्षेत्र के हवाले नहीं करते हैं (कांत सचमुच पब्लिक-प्राइवेट भागीदारी की बात कर रहे थे), लेकिन अब खुलकर स्वीकार करने का वक्त आ गया है कि शिक्षा के क्षेत्र में सरकार की भूमिका में बदलाव लाने की जरूरत है।

शिक्षा, सरकार से जुड़ा मसला है अथवा नहीं, इस बात पर बहस तो हमेशा चलती रहेगी लेकिन अगर यह भी मान लिया जाए कि सिर्फ प्राथमिक शिक्षा ही सार्वजनिक सेवा की चीज है और इसकी व्यवस्था सरकार को ही करनी है, तो भी यह स्वीकार करना इतना कठिन क्यूँ है कि इस जिम्मेदारी को पूरा करने के अन्य तरीके भी हो सकते हैं और उनको प्रोत्साहित किया जाना चाहिए? 

यह स्पष्ट नहीं है कि पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) कामयाब होगी अथवा नहीं, प्राइवेट भागीदार को संगठित (यूनियनाइज़्ड) सरकारी स्कूल शिक्षकोँ और अन्य स्टाफ को रखेंगे अथवा नहीं। हिंदुस्तान टाइम्स के एक एडिटोरियल के अनुसार राजस्थान सरकार ने अपने 70,000 स्कूलोँ को निजी क्षेत्र को सौंपने की योजना बनाई थी, मगर उन्हें यह विचार छोड़ना पड़ा क्योंकि शिक्षकोँ की तरफ से विरोध होने लगा। पीपीपी की रूपरेखा तय करना भी काफी कठिन काम हो सकता है और अंततः इसकी परिणति एक अंधेरी डील सरीखी साबित हो सकती है।

शिक्षा के क्षेत्र में लाइसेंस राज का ख़ात्मा किया जाना एक बेहतर तरीका हो सकता है। स्कूलोँ को राज्य सरकार और स्थानीय प्राधिकारियोँ से कई तरह के लाइसेंस लेने पड़ते हैं, जिनमेँ ‘एसेंशियल सर्टिफिकेट’ भी शामिल होता है, जो यह बताता है कि स्कूल को एक तय क्षेत्रफल के दायरे में होना चाहिए। राज्य सरकारेँ स्कूलोँ और उनकी फीस को नियंत्रित करना चाहती हैं। शिक्षा के अधिकार अधिनियम 2009 में स्कूलोँ के संसाधनोँ सम्बंधी नियम के साथ-साथ शिक्षकोँ की योग्यता और वेतन भी तय किए गए हैं, लेकिन इन नियमोँ का पालन किया जा सकता है अथवा नहीं, यह नहीं सोचा गया।

इस अधिनियम के नियमोँ का असर सभी स्कूलोँ पर पड़ा है, लेकिन वास्तव में यह बजट स्कूलोँ को मार रहा है जहाँ पढ़ने वाले अधिकतर बच्चे उन तबकोँ से आते हैं जो अपने बच्चोँ को सरकारी स्कूलोँ में भेजते हैं। इन स्कूलोँ ने इस धारणा को गलत साबित किया है कि प्राइवेट स्कूलोँ का खर्चा हर कोई वहन नहीं कर सकता है (अगर ऐसा नहीं होता तो पैरेंट्स अपने बच्चोँ को सरकारी स्कूलोँ से निकालकर इन स्कूलोँ में नही डालते?)। बजट प्राइवेट स्कूल्स इन इंडिया 2017 रिपोर्ट के एक चैप्टर में किंग्डन कहती हैं कि कम आय वाले राज्योँ में गैर सरकारी सहायता प्राप्त प्राइवेट स्कूलोँ में पढ़ने वाले 70-85 फीसदी बच्चे 500 रुपये से कम मासिक फीस भरते हैं। उन्होने यह भी दर्शाया है कि स्कूलोँ की औसत वार्षिक फीस एक न्यूनतम दिहाड़ी मजदूर की सालाना आय का 10.2 फीसदी ही है। आगे उन्होनें यह भी बताया कि औसतन 26 फीसदी ग्रामीण प्राइवेट स्कूलोँ की मासिक फीस राज्योँ द्वारा तय न्यूनतम दिहाड़ी से भी कम है।

बजट प्राइवेट स्कूलोँ की आलोचना करते हुए कहा जाता है कि वे टीचिंग शॉप्स के जैसे होते हैं। वे बेहद संकरे इलाकोँ और खराब-संसाधनोँ के साथ अत्यंत छोटी जगह पर चलाए जाते हैं। आस-पड़ोस के कम आय वर्ग के बच्चोँ को पढ़ाने वाले इन स्कूलोँ से बड़ी बिल्डिंग और अत्याधुनिक उपकरणोँ की अपेक्षा रखना यथार्थवादी नहीं है। हालांकि आलोचनाओँ को पूरी तरह से दरकिनार भी नहीं किया जा सकता है। नेशनल इंडीपेंडेंट स्कूल अलायंस का भी मानना है कि कुछ स्कूलों के साथ समस्या जरूर है और वे इसके समाधान के लिए कार्य कर रहे हैं। लेकिन इसका यह मतलब तो नहीं है कि सभी स्कूलोँ को एक नजरिए से देखा जाए?

ज्यादा से ज्यादा प्राइवेट स्कूलोँ को खुलने का मौका देने से सरकारी स्कूलोँ को भी प्रतिस्पर्धा मिलेगी। मौजूदा समय में, शिक्षकोँ को अच्छा प्रदर्शन करन के लिए इंसेंटिव नहीं मिलता है क्योंकि उनके नौकरी पक्की है। लेकिन अगर सरकारी स्कूलोँ को छोड़कर बच्चे प्राइवेट स्कूलोँ में चले जाएंगे और यहाँ बच्चोँ की संख्या बेहद कम हो जाएगी तो राज्य सरकार को इन्हेँ बन्द करने का फैसला लेना पड़ेगा। इस तरह की आशंका शिक्षकोँ और प्रिंसिपल को बेहतर प्रदर्शन के लिए बाध्य करेगी।

क्या इसका यह मतलब होगा कि सरकार प्राथमिक शिक्षा से अपना पल्ला झाड़ रही है? ऐसा बिल्कुल नही है। सेंटर फॉर सिविल सोसायटी छात्रोँ को पैसा देने की मांग कर रही है न कि स्कूलोँ को। इसका मतलब है कि बच्चोँ को पैसा मिलेगा ताकि वे अपने पसंद के स्कूल में जाकर पढ़ाई कर सकेँ। आरटीई एक्ट के अनुसार स्कूलोँ को अपनी 25 फीसदी सीटेँ गरीब तबके के बच्चोँ के लिए रिजर्व रखना अनिवार्य है, लेकिन इसके साथ कई समस्याएँ हैं। इसके लिए सरकार को पैसे रीईम्बर्स करने होते हैं और ऐसे में तमाम तरह के भ्रष्टाचार होने की सम्भावनाएँ बनी रहती हैं। इससे तो कई गुना बेहतर है रीईम्बर्स्मेंट की यह सुविधा पैरेंट्स को दी जाए। इससे भ्रष्टाचार की सम्भावना कम होगी; और अगर कोई माता-पिता निशुल्क शिक्षा छोड़कर अपने बच्चे की पढ़ाई का खर्च खुद उठाना चाहेंगे तो इसका मतलब स्पष्ट है कि वे शिक्षा की कीमत समझते हैं और पैसोँ को गैर-जरूरी चीजोँ पर नहीं उड़ा रहे हैं।

इस योजना का क्रियान्वयन कैसे होगा, शिक्षा नीति को मुख्य रूप से इस पर फोकस करना चाहिए। और साथ ही प्राइवेट स्कूलोँ का चित्रण दुर्जनों की तरह करना बंद करने की जरूरत है।

 

- सीता (लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं)
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