भेड़िया जो कभी आया ही नहीं

खुदरा में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश पर बहस अंततः समाप्त हो गई। उम्मीद है कि अब इसने उन अन्य गरमागरम बहसों की आत्माओं के बीच अपनी शांतिपूर्ण जगह बना ली होगी, जिनसे हमारा लोकतांत्रिक देश यदा कदा गुजरता रहता है। हर समय लगता है मानो यह हमारे जीवन मरण का मुद्दा हो और हम विनाश के कगार पर खड़ें हों। अगर आप उनमें से हैं, जो प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के विरोधियों द्वारा की गई बर्बादी की भविष्यवाणियों से डरते हैं तो यहां प्रस्तुत है इसी तरह की पहले हुई कुछ बहसों का छोटा सा इतिहास। यह बताने के लिए कि लाखों भारतीय नौकरी से निकालकर फेंक नहीं दिए जाएंगे। और भारत वॉलमार्ट या टेस्को का उपनिवेश नहीं बनने जा रहा।

रंगीन टेलीविजन संभ्रांतवादी है!
क्या भारत में रंगीन टेलीविजन होना चाहिए? यह भले ही आज बचकाना सवाल लगे, लेकिन 1982 में ऐसा नहीं था। केंद्र की कांग्रेस सरकार एशियाई खेलों से पहले रंगीन टेलीविजन ट्रांसमिशन लागू करने की जल्दी में थी और विपक्ष ने उसके खिलाफ कमर कस ली थी। वह इसे सार्वजनिक धन की जबर्दस्त बर्बादी बता रहा था, क्योंकि इससे सिर्फ उन्हीं ज्यादा अमीरों को लाभ होता, जिनके पास टीवी सेट खरीदने के पैसे होते। यह भी इस तथ्य के बाद कि रंगीन टीवी तीन दशक से था और चीन जैसे कम्युनिस्ट देश तथा दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में कई साल पहले ही आ गया था। आज राजनीतिक दल विधानसभा चुनाव में आम आदमी के वोट जीतने के लिए मुफ्त रंगीन टीवी सेट देने का वादा कर रहे हैं।

कंप्युटर खा जाएंगे बैंक की नौकरियां
आज यह कल्पना करना भी कठिन है कि कंप्यूटर के बिना कोई बैंक काम करता हो। लेकिन अस्सी के दशक में बैंक कर्मचारी और उनके राजनीतिक संरक्षक कंप्यूटरीकरण और रोजगार में उसके संभावित बुरे परिणामों के विरोध में सड़कों पर थे। दशकों बाद, उन्हें स्वयं को भी यह स्पष्ट हो गया कि वह कितना मूर्खतापूर्ण था। एक विदेशी पत्रिका को दिए साक्षात्कार में माकपा नेता और पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य को कहना पड़ाः

“वह मूर्खता थी, मूर्खता। यह तब शुरू हुई, जब वे बैंकों और (इंश्योरेंस कंपनियों) में कंप्यूटर ला रहे थे। उनके कर्मचारियों ने विरोध और हमने इसका समर्थन किया। लेकिन आप आधुनिक प्रौद्योगिकी को रोक कैसे सकते हैं?”

गैट/ डब्ल्यूटीओ भारतीय कृषि और उद्योग को मार देंगे!
जब नरसिम्हाराव की कांग्रेस सरकार जनरल एग्रीमेंट ऑन टैरिफ्स एंड ट्रेड पर हस्ताक्षर करने वाली थी, जिसमें 1995 में विश्व व्यापार संगठन की स्थापना होती, भाजपा और वाम ने दिल्ली और देश के अनेक हिस्सों में व्यापक विरोध प्रदर्शन किए। दलील थी समझौते पर हस्ताक्षर कर भारतीय कृषि और उद्योग को नष्ट करने की बजाए भारत को डब्ल्यूटीओ से बाहर रहना चाहिए। भारत को अब डब्ल्यूटीओ का सदस्य बने 17 साल हो गए और इन वर्षों में भारत के जीडीपी, निर्यात और विदेशी मुद्रा भंडार में हमेशा से ज्यादा तेजी से बढ़ोतरी देखी गई! किसी ने अभी तक यह मानने की शालीनता भी नहीं दिखाई कि उनके विरोध प्रदर्शन ‘मूर्खतापूर्ण’ थे, लेकिन किसी भी राजनीतिक दल ने अभी तक यह मांग भी नहीं की कि हम डब्ल्यूटीओ से बाहर आ जाएं।

पेप्सी/कोक/केएफसी/मैकडॉनल्ड्स/कैलॉग्स भारतीय कंपनियों और नौकरियों को मार देंगे!
बहुराष्ट्रीय कंपनियों के खिलाफ यह विशेष तर्क बार-बार लौट आता है, लेकिन यह 1988 में शुरू हुआ था, जब पेप्सी भारत में प्रवेश की पुरजोर कोशिश कर रही थी। जनता सरकार ने 1977 में कोकाकोला को प्रभावी तरीके से लात मारकर भारत से बाहर कर दिया था। यह जोर दिया गया था कि या तो वह अपने ट्रेड सीक्रेट बताए या देश से बाहर हो जाए। कोक ने देश छोड़ना ही बेहतर समझा। एक दशक बाद प्रतिस्पर्धी पेप्सी ने दृढ़निश्चय के साथ भारतीय बाजार में प्रवेश का प्रयास किया। भले ही इसका मतलब खाद्य प्रसंस्करण संयत्रों में निवेश जैसी कड़ी शर्तें स्वीकार करना ही क्यों न हो। लेकिन पेप्सी के प्रवेश को राष्ट्रहित बेचने के समान माना गया। ऐसा ही बाद में केएफसी, मैकडॉनल्ड्स और कैलॉग्स जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आगमन के समय हुआ।

दलीलः बहुराष्ट्रीय कंपनियों की जेबें गहरी होती हैं, वे ढाबों, रेस्तराओं और नमकीन निर्माताओं को बिजनेस से बाहर कर देंगी। हुआ क्या, निश्चित ही उसके ठीक उलट। पिछले दो दशक में खाद्य प्रसंस्करण उद्योग तेजी से विकसित हुआ। सरवण भवन और हल्दीराम जैसी खाद्य श्रृंखलाएं विश्वभर में अपनी शाखाएं खोलने में व्यस्त हैं।

यह सूची बहुत लंबी हो सकती हैं, लेकिन चूंकि स्थान सीमित है, इसलिए हमें जो अन्य भय थे, उनका महज उल्लेख ही करना पड़ेगा कि भारत अमेरिका परमाणु समझौते से भारत को अपनी संप्रभुता खोनी पड़ेगी। मीडिया में विदेशी निवेश को अनुमति देने से भारतीय मीडिया घराने की मौत होगी। या सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के निजीकरण से व्यापक बेरोजगारी होगी अथवा मोबाइल फोन (या कारफून जैसा कि वे अस्सी के दशक में कहलाते थे) विलासिता है, जिसके बिना भी भारत का काम चल सकता है।

उपरोक्त पर नजर डालें तो इनमें से कोई भी डरावनी भविष्यवाणी सच साबित नहीं हुई और यह भी कि जो विलासिता लगती थी, वह बहुत जल्द जरूरत बन गई। असल में जिन नीतियों को लोग मानते थे कि वे निश्चत ही भारतीय अर्थव्यवस्था और बिजनेस को कमजोर करेगी, उन्होंने ही उनको ज्यादा मजबूत किया और बाहर जाकर विश्व बाजार में जगह बनाने और जीतने का विश्वास पैदा करने में मदद की।

जबसे हमने खुलापन अपनाया है, विश्व व्यापार में भारत का योगदान बढ़ रहा है, कम नहीं हो रहा। भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है, धीमी नहीं हो रही और हमारी गरीबी का प्रतिशत घट रहा है बढ़ नहीं रहा।

- टोनी जोसफ (लेखक बिजनेसवर्ल्ड के पूर्व संपादक और मीडिया सर्विस फर्म के चेयरमैन हैं)
साभारः दैनिक भास्कर