कम संसाधन अधिक लाभ यही है जुगाड़ का हिसाब

मुझे फेविकोल का एक चर्चित विज्ञापन याद आता है जिसमें एक बस को दिखाया गया है कि कैसे बस के अंदर-बाहर और ऊपर तमाम लोग लदे हुए हैं। देश के अद्र्घशहरी तथा ग्रामीण इलाकों में यह दृश्य आम तौर पर देखा जा सकता है। विज्ञापन खत्म होता है और बस के पिछले हिस्से में फेविकोल का बोर्ड नजर आता है। हालांकि यह भारत में प्राय: नजर आने वाला एक विशिष्ट दृश्य है, वहीं यह भारतीयों के 'जुगाड़' के स्वभाव का भी परिचायक है। बस की बात करें तो उसमें जितनी सीट होती हैं, उससे कहीं अधिक लोगों को बस में बिठाया जा सकता है, इसके अलावा ढेर सारे लोग खड़े होकर और बस की छत पर बैठकर भी सफर कर सकते हैं बल्कि करते ही हैं। वाहन चालक भी बस को बहुत धीरे-धीरे चलाता है, लगभग ऊंट की तरह। उसका ध्यान बस की छत पर बैठे लोगों पर भी होता है ताकि वे आराम से सफर कर सकें।

हालांकि यह देखने में असुरक्षित प्रतीत होता है लेकिन देश के उन दूरदराज इलाकों में शायद ही कभी दुर्घटना घटित होती हो। न केवल बस चालक बल्कि यात्री भी इस तरीके से यात्रा करने की कला में पारंगत हो चुके हैं। कई बार मुझे आश्चर्य होता है कि बस निर्माता ऐसी बसें क्यों नहीं बनाते हैं जिनमें सीटें कम हों और खड़े होने की जगह ज्यादा हो (कुछ कुछ हवाई अड्डे पर चलने वाली उन बसों की तर्ज पर जो यात्रियों को विमानतल से वायुयान तक ले जाती हैं)। इतना ही नहीं बस में खड़े होकर और बैठकर सफर करने वाले यात्रियों से अलग-अलग शुल्क दर भी वसूल की जा सकती है।

जुगाड़ भारतीयों के जीवन जीने का तरीका बन चुका है। अपनी पुस्तक 'जुगाड़ इनोवेशन' में नवी रादजाउ, जयदीप प्रभु ओर सिमोन आहुजा ने जुगाड़ की परिभाषा एक ऐसे उपाय के रूप में दी है जो होता तो तात्कालिक है लेकिन जिसे सरलता और चतुराई से अंजाम दिया जाता है। हमें हर रोज अपने आसपास इसके उदाहरण देखने को मिल जाएंगे। कई बार यह असुरक्षित और गैर कानूनी भी हो सकता है।

बहरहाल औसत भारतीय की घरेलू और कारोबारी मनोदशा को समझने के लिए इन नई पहल का अध्ययन किया जाना आवश्यक है। ये नये तरीके आगे चलकर बाजार से जुड़े लोगों के लिए काम के साबित हो सकते हैं। जुगाड़ के मूल में दरअसल अर्थव्यवस्था की कमजोरी है। जहां लोगों को सीमित संसाधनों से अपना काम चलाना होता है। इस तरह वे न्यूनतम संसाधनों से अधिकतम हासिल करने की कोशिश करते हैं। क्षमता से ज्यादा लदी हुई बसें इसका एक उदाहरण मात्र हैं। इसी तरह औसत भारतीय गृहिणी हर चीज को किसी न किसी तरह दोबारा इस्तेमाल करती है। बोतलें ओर केन उसके लिए सामान रखने का डिब्बा या गमले बन जाते हैं, हैंडल टूटे हुए मग को वह पेन स्टैंड बना लेती है। इसी तरह किराने की दुकान से मिले प्लास्टिक बैग को वह कचरा फेंकने के लिए इस्तेमाल कर लेती है। यहां तक कि उच्च मध्य वर्ग के लोग भी कम कचरा होने या आम दिनों में ऐसे ही पॉलिथीन का इस्तेमाल कचरा आदि फेंकने के लिए करते हैं। चटाई वाले बोरों का इस्तेमाल घर के भीतर अथवा दुकानों या कार्यालय में घुसने से पहले पांव पोंछने के लिए किया जाता है। टूटी बाल्टियों का इस्तेमाल बच्चों के खिलौने एकत्रित करने के लिए किया जाता है, लकड़ी के बड़े बक्से को चादर से ढककर दीवार से टिका दिया जाता है और इस तरह उसे ड्राइंग रूम में रखे सोफे में तब्दील कर दिया जाता है। कस्बाई और ग्रामीण इलाकों में वाशिंग मशीन का इस्तेमाल लस्सी बनाने के लिए किया जाता है और खेती का समय नहीं होने पर ट्रैक्टर को टैक्सी के बतौर इस्तेमाल किया जाता है।

भारतीय कारोबारी जगत भी वैध तरीकों से न्यूनतम में से अधिकतम हासिल करने के प्रयत्न करता रहता है जिन्हें पश्चिमी दुनिया के लोग आसानी से नहीं समझ सकते। पूर्ण सक्षम होना पश्चिमी जगत की मान्यता है इसलिए वहां एक प्लंबर, प्लंबर के काम में ही विशेषज्ञ होगा, किसी और काम में नहीं। लेकिन भारत में प्लंबर घर में कई दूसरी तरह के काम भी बहुत आसानी से निपटा सकता है। कई बार तो वह घरों में कारपेंटर के रूप में भी काम कर लेता है। इस तरह वह जो साख बनाता है उसके आधार पर वह अधिक मूल्य अर्जित करता है। कई बार वह इसी साख की बदौलत अपने गांव के किसी व्यक्ति को लाता है और उसे भी अपने काम के नेटवर्क में शामिल कर लेता है। यह लॉयलिटी मार्केटिंग और उपभोक्ता से ताउम्र संबंध जोडऩे का बढिय़ा उदाहरण है।

जीवन बीमा निगम (एलआईसी) के विचार के पीछे भी जुगाड़ की सहज भावना थी। वर्षों पहले उसने अपनी योजनाएं बेचने के लिए अंशकालिक एजेंटों की नियुक्ति करके बहुस्तरीय विपणन की शुरुआत की जिसे पश्चिम में एवॉन और टपरवेयर ने अपनाया। इस तरह उसने यह पहचान की कि मध्यवर्गीय क्लर्क जैसे पदों पर काम करने वाले लोग अतिरिक्त आय अर्जित कर सकते हैं। एलआईसी ने इन लोगों के नेटवर्क का इस्तेमाल किया और उनकी वित्तीय साख का प्रयोग अपने उत्पाद बेचने में किया। आश्चर्य नहीं कि कई क्लर्कों ने छुट्टिïयां लेकर जीवन बीमा निगम के लिए काम किया।

वहीं दूसरे सिरे पर ऐसी ही चतुराईपूर्ण सोच की बदौलत उडुपी रेस्टोरेंट का जन्म हुआ। इसके मालिकों ने अपने गांव से श्रमिकों को बड़े शहरों में लाने और उनको रोजगार तथा आवास मुहैया कराने का काम किया। रेस्टोरेंट की इस शृंखला के पीछे श्रमिकों की बहुत अहमियत थी और मैकडॉनल्ड्स तथा केएफसी के आगमन से पहले इसने तत्काल सेवा प्रदान करने वाले रेस्टोरेंट का मॉडल खड़ा किया था। इन दोनों विख्यात कंपनियों ने जहां पश्चिम में इस मॉडल को अपनाया जबकि भारत में यह अपेक्षाकृत सस्ती दरों पर उपलब्ध था। उडुपी भारतीय ग्राहकों को भारतीय तरीके से जल्दी सेवा मुहैया कराता है। कैब शेयर करने का विचार भी बहुत रोचक है। इसके जरिये मुंबई जैसे शहर में लोग कैब से कार्यालय जाते हैं और उनको पूरा किराया भी नहीं देना होता। इसमें हर कोई अपने हिस्से का किराया देता है और कैब चालक को भी उससे कहीं अधिक आमदनी होती है जितनी कि उसे एक व्यक्ति को पहुंचाने से होती। ये सबके लिए लाभ की स्थिति है। कार पार्किंग में होने वाली भारी भीड़ ने भी इसी तर्ज पर पार्किंग सहायकों की नई भूमिका को जन्म दिया है।

दरअसल जुगाड़ का मतलब है मितव्ययिता और लचीली सोच। इसका संबंध अपने दैनिक जीवन में थोड़ी थोड़ी चीजों से कुछ अधिक हासिल करने के बारे में। आइए जुगाड़ के कुछ और उदाहरण देखते हैं। असभ्य लोगों को दीवार गंदी करने से कैसे रोका जाता है? वहां भगवान की तस्वीर लगाकर। पेन की बिक्री का बढिय़ा तरीका क्या है? किसी कॉलेज के बाहर परीक्षा के वक्त। मैंने एक बार एक पेन विक्रेता को पेन बेचते देखा था। वह कह रहा था, 'यह पेन खरीदिए यह तीन घंटे तक बिना रुके चलता है। इसे इस्तेमाल करने से परीक्षा में आपके हाथ भी नहीं दर्द करेंगे।' इस बात ने कई परीक्षार्थियों के दिल को छू लिया। बिक्री में निपुण होने के लिए आपको किसी डिग्री की आवश्यकता नहीं है। बस प्रतिस्पर्धा में बने रहने की इच्छा आपको रास्ता दिखा देती है।

मधुकर सबनवीस
(हिंदी बिजनेस स्टैंडर्ड से साभार)