विचारधारा संबधी प्रस्ताव या वैचारिक लीपापोती

पिछले दिनों मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की सेंट्रल कमेटी की अत्यंत महत्वपूर्ण  बैठक में पार्टी के विचारधारा संबंधी प्रस्ताव के मसौदे को अंतिम रूप दिया । इस प्रस्ताव को अगले वर्ष होनेवाली पार्टी कांग्रेस में पेश किया जाएगा।पार्टी कांग्रेस ही माकपा की सबसे बड़ी नीति नियंता होती है।इस प्रस्ताव को इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि माकपा  बीस साल बाद एक बार फिर विचारधारा संबधी प्रस्ताव तैयार कर रही है।यह बात अलग है कि साम्यवादी आंदोलन के कई जानकार ये मानते हैं कि यह प्रस्ताव वैचारिक लीपापोती ही होगी क्योंकि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टियों में वैचारिक साहसिकता और ईमानदारी का घोर अभाव है। वह विचार मंथन का सारा नाटक करके आखिरकार  पुरानी वैचारिक रूढ़ियों को ही  सीने से लगाकर रखेंगी।

भारत की कम्युनिस्ट पार्टियां पिछले कुछ वर्षों से भारतीय राजनीति के हाशिए पर रही हैं। इस वर्ष हुए पश्चिम बंगाल और केरल विधानसभा चुनावों में चारों खाने चित होने के बाद तो वे हाशिए के भी हाशिए पर चली गई हैं। इस पराजय के  बाद हमेशा आंतरराष्ट्रीयतावाद के आकाश में विचरण करनेवाली इन पार्टियों को पहली बार शिद्दत से यह अहसास हो रहा है कि उनके पांव तले से जनाधार की जमीन खिसक चुकी है। राजनीति के हाशिए पर रहने के बाद भी सभी को गरीबोन्मुख और जनहितकारी राजनीति का पाठ पढ़ानेवाली कम्युनिस्ट पार्टियां एक बार फिर वैचारिक चौराहे पर खडी हैं क्योंकि अब न तो उनके साथ गरीब हैं न जनता। इसलिए एक बार फिर उनके मन में अपनी वैज्ञानिक कहलानेवाली विचारधारा को लेकर सवाल पैदा हो रहे हैं। साथ ही अपनी रणनीति का जायजा लेने की जरूरत महसूस हो रही है।

एक पुराने  कम्युनिस्ट कार्यकर्ता का कहना था कि एक जमाने में कामरेडों में अपनी विचारधारा को लेकर गजब का आत्मविश्वास था।मुट्ठीभर होने के बावजूद उन्हें लगता था कि उनकी विचारधारा एकमात्र वैज्ञानिक विचारधारा है इसलिए साम्यवाद एक ऐतिहासिक अनिवार्यता है वह एक न एक दिन जरूर आएगा।तभी तो शमशेर बहादुर सिंह जैसे कवि लिखते थे –दिशा वाम वाम वाम ,समय साम्यवादी।लेकिन सोवियत संघ विघटन और उसके बाद पूर्वी यूरोप के साम्राज्य के विसर्जन  ,चीन के पूंजीवाद की तऱफ भटकाव और दुनियाभर में बहती वैश्वीकरण और आर्थिक उदारीकरण की बयार ने   कामरेड़ों के आत्मविश्वास को ध्वस्त कर दिया है । अब तो यह कहने की नौबत आ गई है- दिशा दक्षिण दक्षिण दक्षिण ,समय पूंजीवादी।इस घोर पूंजीवादी समय में साम्यवाद को विलुप्त होने से कैसे बचाया जाए अब यही माकपा की चिंता है। कुल मिलाकर साम्यवादी आंदोलन अब आक्रमण की नहीं बचाव की मुद्रा में है।

पार्टी सूत्रों के मुताबिक 20 वर्ष के बाद इस तरह का विचारधारात्मक प्रस्ताव पेश किया जा रहा है। इससे पहले सोवियत संघ के पतन के बाद की स्थितियों का जायजा लेने  लिए 1992 में विचारधारात्मक प्रस्ताव पारित किया गया था लेकिन वह भी लीपापोती ही ज्यादा था उससे यह कतई नहीं लगता कि माकपा ने सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप में उसके साम्राज्य के विखंडन की गंभीरतापूर्वक विश्लेषण कर उससे कोई सबक लिया हो । इसलिए यह नई पहल कोई नया गुल खिलाएगी ऐसा नहीं लगता। अपने आप को क्रांतिकारी कहनेवाली कम्युनिस्ट पार्टियों में वैचारिक जड़ता इतनी ज्यादा है कि आश्चर्य नहीं कम्युनिस्ट पार्टियां भारतीय राजनीति की विलुप्त प्रजाति न बन जाएं।

माकपा के नेता सीताराम येचुरी ने पत्रकारों को बताया कि पिछले कुछ वर्षों में वैश्वीकरण और उदारीकरण के कारण सारी दुनिया में बहुत महत्वपूर्ण बदलाव आए हैं। इन बदलावों के साथ कदम मिला कर चलने के लिए हम विचारधारात्मक दृष्टिकोणों का जायजा लेना चाहते हैं।

माकपा की दिक्कत यह है कि वह अब भी समाजवाद का जाप करती है लेकिन हकीकत यह है कि विश्व स्तर पर विकास के समाजवादी मॉडल को अप्रासंगिक माना जाने लगा है क्योंकि वह वितरण न्याय की बात तो करता है लेकिन विकास और समृद्धि लाने में बुरी तरह नाकाम रहा है। यही कारण है कि चीन जैसे कट्टर साम्यवादी देश को अपने विकास के लिए माओवादी मॉडल को छोड़कर बाजारवादी अर्थव्यवस्था को अपनाना पड़ा। इसके नतीजे भी स्पष्ट हैं। चीन विश्व में एक बड़ी आर्थिक महाशक्ति के तौर पर उभरा है और अमेरिका को चुनौती दे रहा है। साम्यवादी व्यवस्था की इससे बड़ी नाकामी और क्या हो सकती है कि साम्यवाद का स्वर्ग कहा जानेवाला सोवियत संघ ताश के पत्तों से बने महल की तरह ढह गया। तो दूसरे बड़े साम्यवादी मुल्क चीन ने बाजारवादी व्यवस्था को अपना लिया। यह दोनों देश भारत की कम्युनिस्ट पार्टियों के लिए वैचारिक प्रेरणास्त्रोत थे।सोवियत संघ पर तो कम्युनिस्ट पार्टियां इस कदर निर्भर थी कि कहा जाता था कि मास्को में बारिश होती थी कामरेड भारत में छाता तान लेते थे। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टियों और बुद्धिजीवियों में वैचारिक आलस्य इतना ज्यादा रहा कि उनमें कभी देश की प्रकृति और परिस्थितियों के अनुरूप साम्यवाद की अलग राह बनाने की क्षमता पैदा ही नहीं हो पाई। बड़ी अजीब स्थिति है कम्युनिस्ट पार्टियों की कि समाजवादी मॉडल अप्रासंगिक हो गया है। दूसरी तरफ वे वैश्वीकरण और उदारीकऱण की घोर विरोधी हैं। और इन दोनों से अलग कोई तीसरा रास्ता उन्हें सूझता नहीं। इस कारण वे वैचारिक दिग्भ्रम का शिकार होती हैं। पश्चिम बंगाल में ऐसा ही हुआ। राज्य के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य राज्य का विकास करने की हडबडी में बिना वैचारिक जमीन बनाए हुए आर्थिक उदारवाद की तरफ चल पड़े जिसके घातक नतीजे वाममोर्चा सरकार को ले डूबे। माकपा की आर्थिक मोर्चे पर दुविधा का इससे बड़ा उदाहरण क्या हो सकता है कि पश्चिम बंगाल में वह आर्थिक उदारवाद के रास्ते पर चलने की कोशिश करती रही और केरल में कट्टर मार्क्सवादी मुख्यमंत्री  अच्युतानंदन के नेतृत्व में समाजवादी आर्थिक विकास के रास्ते पर। और दोनों ही राज्यों में जनता ने उसे नकार दिया क्योंकि जनता को न तो उसका अधकचरा समाजवाद रास आया न अवसरवादी कारणों से अपनाया गया उदारवाद। 

माकपा और अन्य कम्युनिस्ट पार्टियों की विडंबना यह है कि वे विचारधारा का जायजा लेने की बात तो करती है लेकिन मार्क्सवाद के वैचारिक मकड़जालों को पूरी सफाई करने का साहस कभी नहीं चुटा पाई। इसलिए उसकी कथनी और करनी में सुसंगतता का अभाव है। वह व्यवहार में तो संसदीय लोकतंत्र के रास्ते पर चल रही है और लोकतांत्रिक तरीके से ही समाजवाद लाने का दावा करती है लेकिन उसने अभीतक सर्वहारा की तानाशाही जैसी घोर लोकतंत्र विरोधी वैचारिक संकल्पना को भी छोड़ा नहीं है। एक तरफ वह मानव अधिकारों की पुरजोर वकालत करती है दूसरी तरफ सोवियत संघ के क्रूर तानाशाह स्तालिन को अपना महानायक भी मानती है जिसने लाखों निर्दोष लोगों को मौत के घाट उतार दिया ।तमाम मानव अधिकारों को कुचलकर सोवियत संघ को लौह आवरणवाले देश में बदल दिया।उसके बाद से साम्यवाद मानवीय मूल्यों और मानव अधिकारों के हनन का पर्याय बन गया। दरअसल सीलवी सदी के तीन प्रमुख हत्यारे थे हिटलर,स्तालिन और माओ। इनमें से स्तालिन और माओ साम्यवादी थे लेकिन कम्युनिस्ट पार्टियां कभी उनकी खुलकर निंदा नहीं करती। ऐसे माओ और  स्तालिन को अपना महानायक माननेवाली माकपा के बारे में यह कैसे मान लिया जाए कि उसने सचमुच मानव आधिकारों की रक्षक है और उसने तहे दिल से  सर्वहारा की तानाशाही का लोकतंत्र विरोधी रास्ता छोड़कर लोकतंत्र का रास्ता अपना लिया है। यहां कंम्पुचिया की पोल पोट  की सामूहिक हत्याएं करनेवाली सरकार के मामले में भी वे चुप्पी ही साधे रहीं।

दरअसल माकपा को लगता यह है कि यदि वे सर्वहारा की तानाशाही और उत्पादन के साधनों पर सरकारी स्वामित्व की बात को सिद्दांतत:नकार देंगी तो एक कम्युनिस्ट पार्टी के तौर पर उनकी पहचान खत्म हो जाएगी और उनमें और अन्य सोशल डेमोक्रेट या लोकतांत्रिक समाजवादी  पार्टियों में कोई खास फर्क ही नहीं रह जाएगा।

भारत की कम्युनिस्ट पार्टियां अक्सर बात तो करती है कि वे भारत की परिस्थतियों के मुताबिक अपना रास्ता बनाने की लेकिन यही एक काम है जो उन्होंने कभी नहीं किया।पिछले दिनों भी जब माकपा महासचिव प्रकाश कारत से माकपा के वैचारिक प्रस्ताव के सिलसिले में पूछा गया कि वे किस माडल को अपनाएंगे तो उनका कहना था हम  किसी के पिछलग्गू नहीं हैं हम अपना माडल खुद ईजाद करेंगे। लेकिन बहुत सारे राजनीतिक चिंतक यह बात बार-बार उठाते रहे हैं कि भारत की परिस्थियों के अनुरूप अपना नया रास्ता बनाने की बात करनेवाली कम्युनिस्ट पार्टियां आजतक देश जाति समस्या पर कोई अलग नजरिया बनाने में नाकाम रही हैं.वे अब भी वर्ग संघर्ष की ही बात करती है उन्होंने सामाजिक परिवर्तन में वर्णसंघर्ष को महत्वपूर्ण नहीं माना । नतीजा सामने है कि वे  भारत की जनता में को बड़े स्तरपर अपने साथ नहीं जोड़ पाईं। जिन लोगों को उसने अपने साथ जोड़ा भी उनमें भी उनका प्रभाव अब तेजी से खत्म होता जा रहा है।

यही कारण है कि पहले देश के कई हिस्सों में उनका प्रभाव था जो बाद में पशिचम बंगाल,केरल और त्रिपुरा जैसे तीन राज्यों में सिमटकर रह गया। अब वहां भी खत्म हो रहा है। लाल किले पर लाल निशान फहराने का हसीन सपना देखनेवाली पार्टियों की इससे बड़ी शोकांतिका और क्या हो सकती है।लेकिन उससे बड़ी शोकांतिका यह है कि वे इस नाकामी से कोई सबक सीखने को तैयार नहीं हैं।

-सतीश पेड़णेकर