हस्तक्षेप हों कम, स्कूल हों ज्यादा

कोई भी राष्ट्र तब तक प्रगति और उन्नति नहीं कर सकता जब तक कि सभी बच्चों के लिए अच्छे स्कूल न हों। ऐसे में और स्कूलों का होना लाजमी है। ढेरों नए सरकारी स्कूलों के आने की उम्मीद बहुत कम है, क्योंकि हमारे यहां के सत्ताधारी स्कूलों और अन्य सामाजिक ज़रूरतों पर खर्च करने के बजाए वोट पाने की उम्मीद में लोकलुभावने ‘लॉलीपॉप’ देने के प्रति अधिक आशक्त हैं।

अपनी पसंद के स्कूलों में अपने बच्चों का दाखिला सुनिश्चित न कर पाने से निराश अभिभावकों की लगातार बढ़ती संख्या इस बात को दर्शाती है कि हमारी शिक्षा प्रणाली के साथ सबकुछ ठीक नहीं है।

लोक कल्याणकारी राज्य में, शिक्षा प्रदान करना मुख्य रूप से राज्य की जिम्मेदारी है। सरकार से जिन सेवाओं को उपलब्ध कराने की अपेक्षा होती है निजी संस्थान केवल उसे अनुपूरित ही कर सकते हैं। आवश्यकता कई सारे और स्कूलों को खोलने की है, लेकिन सरकार नए ‘गुणवत्ता’ स्कूल की स्थापना करे, ऐसा विरले ही देखने को मिलता है। जो स्कूल अस्तित्व में हैं भी, वो भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं और ऐसी शिक्षा प्रदान नहीं करते हैं जिससे कि उन्हें ‘अच्छे’ स्कूलों के प्रतिस्पर्धी स्कूल की श्रेणी में रखा जा सके।

आम धारणा यह है कि निजी स्कूलों द्वारा प्रदान की जाने वाली शिक्षा की गुणवत्ता उच्च स्तर की है। इसलिए आश्चर्य की बात नहीं कि लोगों की वरीयता निजी स्कूल के प्रति होती है, भले ही वे अधिक महंगे हों। लेकिन सच्चाई यह है कि, ‘अच्छे’ निजी स्कूलों की भी कमी है, और अधिक से अधिक गुणवत्ता वाले स्कूलों के खुलने के लिए प्रोत्साहन का अभाव है। 

जरा सोचिए कि एक अच्छे निजी स्कूल को स्थापित करने के लिए किन किन चीजों की आवश्यकता पड़ती हैः  वाणिज्यिक दरों पर खरीदी गई भूमि; एक आधुनिक स्कूल बनने के लिए जिन जिन चीजों की जरूरत होती है उसके अनुकूल इमारत; फर्नीचर; और सबसे महत्वपूर्ण बात, अपेक्षित अनुभव और योग्यता वाला एक शिक्षक। इसके अलावा, तमाम सारे और खर्च हैं जैसे कि रखरखाव पर आने वाली लागत और कर्मचारियों का वेतन जिसमें हमेशा बढ़ोत्तरी होती रहती है। इसके अलावा यदि कोई नया पाठ्यक्रम शुरू करना है या किसी नए शिक्षक को रखना है तो उसमें भी अतिरिक्त लागत लगती है। उनके द्वारा लिए जाने वाले शुल्क के लिए अनावश्यक रूप से उनकी आलोचना की जाती है। शुल्क में किसी प्रकार की वृद्धि हो उसकी आलोचना की जाती है लेकिन उनके द्वारा गुणवत्ता युक्त जो शिक्षा प्रदान की जाती है उसका शायद ही कहीं उल्लेख होता है।

प्रायः इन स्कूलों द्वारा लिए जाने वाले फीस व अन्य खर्चों के बारे में जानते हुए भी अभिभावक अपने बच्चों का दाखिला यहां कराना चाहते हैं। और एक बार जब दाखिला हो जाता है तो वे फीस के विरोध में प्रदर्शन करना शुरू कर देते हैं।

प्रत्येक निजी स्कूलों का स्टैंडर्ड फीस निश्चित होता है। फीस में सालाना 8 फीसदी की बढ़ोतरी का मतलब है कि एक स्कूल जो 8,000 रुपये प्रति माह का शुल्क लेता उसकी तुलना 500 रुपये प्रति माह फीस लेने वाले स्कूल से नहीं की जा सकती है वसूलता है। वास्तव में, एक स्कूल को चलाने के लिए 1.5 करोड़ रुपये से अधिक के वार्षिक अनुदान की जरूरत होती है!

एक और पहलू शिक्षा का अधिकार कानून है, जो स्कूलों में आर्थिक रूप से कमजोर ( ईडब्ल्यूएस) वर्ग के बच्चों के 25 प्रतिशत दाखिले को अनिवार्य बनाता है। इसके अलावा, ऐसे छात्रों को हर साल अगली कक्षा में प्रोन्नत किये जाने का प्रावधान भी है, भले ही वे इसके लिए उपयुक्त और इच्छुक हों या न हों। कक्षा 8वीं तक, जिसके बाद छात्र को स्कूल छोड़कर जाना पड़ता है, स्कूलों को उन्हें प्रोन्नत करते रहना पड़ता है। यह समझ के बाहर है कि इससे छात्रों का क्या भला होगा। ऐसे छात्र सामान्य वर्ग के उन अन्य छात्रों को अवसरों से वंचित करने का काम करते हैं जिन्हें आरक्षण प्रणाली के कारण दाखिला नहीं मिल पाता है।

इसके अलावा, अधिनियम में ईडब्ल्यूएस छात्रों को दाखिला देने के ऐवज में सरकार द्वारा स्कूलों को भुगतान करने का प्रावधान है, लेकिन क्या सरकार ऐसा करती है? सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया है कि किसी भी बच्चे को दूसरे बच्चे की शिक्षा के लिए भुगतान नहीं करना चाहिए, लेकिन वास्तव में यह तब होता है जब सरकार ईडब्ल्यूएस छात्रों के मद में किए जाने वाला भुगतान नहीं करती है या समय पर भुगतान नहीं करती है।

कोई भी राष्ट्र तब तक प्रगति और उन्नति नहीं कर सकता जब तक कि सभी बच्चों के लिए अच्छे स्कूल न हों। ऐसे में और स्कूलों का होना लाजमी है। ढेरों नए सरकारी स्कूलों के आने की उम्मीद बहुत कम है, क्योंकि हमारे यहां के सत्ताधारी स्कूलों और अन्य सामाजिक ज़रूरतों पर खर्च करने के बजाए वोट पाने की उम्मीद में लोकलुभावने ‘लॉलीपॉप’ देने के प्रति अधिक आशक्त हैं।

स्पष्ट रूप से नए स्कूलों के निर्माण की सारी उम्मीदें निजी क्षेत्र पर टिकी हुई हैं, लेकिन ऐसा होने के लिए, सरकार को शुल्क में वार्षिक वृद्धि की सीमा निर्धारित करने के काम से खुद को दूर रखना होगा, साथ ही यदि निजी स्कूलों का मकसद पूर्णतया वाणिज्यिक हो तो भी उन्हें आगे आने देना चाहिए।

जितनी अधिक संख्या में स्कूल होंगे, उनके बीच उतनी ही ज्यादा प्रतिस्पर्धा होगी, जो आने वाले समय में, निश्चित रूप से, शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार करेगी और उन्हें सस्ती भी बनाएगी। स्कूलों को छात्रों को आकर्षित करने के लिए अपने स्तर को और अधिक निखारना ही होगा। इसका यह फायदा होगा कि महंगे स्कूलों में जाने वाले छात्रों की संख्या जितनी अधिक होगी, उतना ही कम खर्चीले स्कूलों में प्रवेश के लिए दबाव कम होगा। सरकार को बस स्कूलों द्वारा प्रदान की जा रही शिक्षा की गुणवत्ता पर अधिक ध्यान केंद्रीत करना होगा।

निजी स्कूलों के मुकाबले निजी अस्पतालों के प्रति सरकार के रवैये में कितना विरोधाभास है। ये अस्पताल क्या शुल्क वसूल करते हैं इस पर किसी प्रकार की कोई रुकावट नहीं है। इतने सारे निजी अस्पतालों के खुलने के कारण यह पूरी तरह से मरीजों पर निर्भर करता है कि वो अपना इलाज कहां कराना वहन कर सकते हैं। इन निजी अस्पतालों ने सरकारी अस्पतालों पर से दबाव को कम कर दिया है, जबकि निजी स्कूलों के संदर्भ में सरकार केवल फीस को लेकर ही चिंतित है।

हमारा देश भद्र राष्ट्रों के बीच अपने लिए वांछित उस मुकाम को तबतक हासिल नहीं कर सकता जबतक हमारे यहां बच्चों के लिए अच्छी शिक्षा सुविधा सुनिश्चित नहीं करता।

-एस. एस. सोधी (इलाहाबाद हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश)

साभारः द ट्रिब्यून