पारदर्शिता का भय खोल रहा है पार्टियों की पोल

केंद्रीय सरकार ने राजनीतिक दलों को सूचना के अधिकार के दायरे से बाहर रखने के लिए इस कानून में जरूरी बदलाव लाने का निर्णय अगस्त 1 को ले लिया। इससे पहले विभिन्न प्रमुख राजनीतिक दलों पर इस विषय पर आम सहमति बनती नजर आई थी कि उन्हें सूचना के अधिकार की जिम्मेदारी से मुक्त रखा जाए। इससे राजनीतिक दलों की पोल अच्छी तरह खुल गई है और देश के नागरिकों को पता चल गया है कि चाहे सत्ताधारी दल हो या विपक्षी दल, वे सभी अपने को पारदर्शिता से बचाना चाहते हैं। इससे पहले केंद्रीय सूचना आयोग ने इस बारे में तर्कसंगत फैसला दिया था कि सूचना के अधिकार के कानून के अंतर्गत सार्वजनिक प्राधिकरण या पब्लिक अथॉरिटी की जो परिभाषा दी गई है, उस परिभाषा में राजनीतिक दल आते हैं।

पब्लिक अथॉरिटी नहीं तो क्या

सच बात तो यह है कि सूचना के अधिकार का कानून बनने के बाद राजनीतिक दलों को स्वयं ही यह घोषणा कर देनी चाहिए थी कि इस कानून के अंतर्गत जो भी जानकारी मांगी जाएगी, उसे वे उपलब्ध करवाएंगे। यदि कम से कम एक प्रमुख राजनीतिक दल ने भी ऐसा किया होता तो यह पारदर्शिता की दिशा में एक महत्वपूर्ण योगदान माना जाता। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। राजनीतिक दलों ने अपने को सार्वजनिक प्राधिकरण के रूप में स्वीकार नहीं किया और इसके लिए जो जरूरी तैयारियां उन्हें करनी चाहिए थीं, उनकी उन्होंने पूरी तरह उपेक्षा की। केंद्रीय सूचना आयोग ने उन्हें समयबद्ध निर्देश दिए थे कि इतने समय में वे सूचना अधिकारी नियुक्त करें और इस क्रम में सार्वजनिक प्राधिकरण की अन्य अनिवार्यताओं को पूरा करें। ध्यान रहे कि सूचना के अधिकार के कानून के अंतर्गत सार्वजनिक प्राधिकरण की एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी यह भी है कि वह बहुत सी जानकारियां स्वत: उपलब्ध करवाए।

छिपाने को बहुत कुछ

इस तरह की व्यापक जानकारी अब राजनीतिक दलों को उपलब्ध करवानी चाहिए। इसके साथ ही नागरिकों द्वारा सूचना मांगने पर विधि सम्मत ढंग से समयबद्ध सूचना भी उपलब्ध करवानी चाहिए। राजनीतिक दलों को इस जिम्मेदारी को स्वीकार करने से पीछे नहीं हटना चाहिए था। इस तरह की दोहरी मूल्य व्यवस्था उचित नहीं है कि दूसरों के लिए पारदर्शिता को उचित ठहराओ पर अपने को पारदर्शिता की जिम्मेदारी से दूर रखने का प्रयास करो। यह सच है कि इस समय राजनीतिक दलों के पास छिपाने के लिए बहुत कुछ है। आम चुनाव तो छोडि़ए, एक राज्य विधानसभा चुनाव में भी वे इतने पैसे खर्च कर देती हैं कि आम लोगों या कार्यकर्ताओं से उगाहे गए छोटे-मोटे चंदे के रूप में उसे किसी भी हाल में दिखाया ही नहीं जा सकता। पर इसका अर्थ यह कतई नहीं हो सकता कि उन्हें पारदर्शिता के दायरे से बाहर रहने दिया जाए। सच बात तो यह है कि पारदर्शिता की पूरी व्यवस्था में राजनीतिक दलों का पारदर्शी होना सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है। इस संदर्भ में केंद्रीय सूचना आयोग का निर्णय बेहद सार्थक और महत्वपूर्ण था, इसे लेकर तो कोई दो राय हो ही नहीं सकती।

केंद्रीय सूचना आयोग के आदेश का देश के नागरिकों ने बहुत स्वागत किया था पर प्रमुख राजनीतिक दलों ने आरंभ से ही इसका विरोध किया। इनके इस विरोध पर सत्तादल से लेकर विपक्षी दल तक और वामपंथी से लेकर दक्षिणपंथी तक, सभी एक हो गए। राजनीतिक दलों का यह रुख बहुत ही अनुचित और अनैतिक है। यह पारदर्शिता व लोकतंत्र की मूल भावना के विरुद्ध है। अत: राजनीतिक दलों को पारदर्शी बनाने और उन्हें सूचना के अधिकार के दायरे में लाने के प्रयास जारी रहने चाहिए।

आज के लगभग सभी राजनीतिक दलों में आय व खर्च संबंधी पारदर्शिता का अभाव है। वे कहां से कितना धन प्राप्त करते हैं और किस तरह खर्च करते हैं, यह आम नागरिकों को किसी भी सूरत में पता नहीं चल सकता है। इसका पूरा हिसाब तो शायद स्वयं राजनीतिक दलों के पास भी उपलब्ध नहीं होता है क्योंकि बहुत सा पैसा नेताओं द्वारा सीधे लेनदेन के रूप में वसूले गए चंदे के नाम पर प्राप्त कर लिया जाता है। ऐसे चंदे की जब रसीद ही नहीं काटी जाती है तो फिर इसका हिसाब कहां से मिलेगा।

राजनीतिक दलों में ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि जहां से चंदा प्राप्त किया जाए, चाहे वह कितना भी कम या अधिक क्यों न हो, तुरंत उसकी रसीद कटनी चाहिए। बिना रसीद के कोई भी चंदा न लिया जाए। यदि पार्टी का कोई कार्यकर्ता बिना रसीद के चंदा एकत्र करता है तो इसे भ्रष्टाचार मानना चाहिए और इसी आधार पर कार्यकर्ता के विरुद्ध कार्यवाही की जानी चाहिए। पार्टी के हर खर्च के बिल-वाउचर उपलब्ध रहने चाहिए और पार्टी द्वारा की गई किसी भी खरीद में प्रचलित नियमों का पालन किया जाना चाहिए। पार्टी के वार्षिक आय-व्यय के मुख्य पक्षों को प्रकाशित किया जाना चाहिए। वर्ष में कम से कम एक दिन को पारदर्शिता दिवस घोषित कर पार्टी के आमदनी और खर्च से जुड़ी सभी जानकारियां नागरिकों और मीडिया को देनी चाहिए।

पदाधिकारी भी हों पारदर्शी

इसके बाद भी यदि कोई नागरिक पार्टी के बही-खाते, बिल-वाउचर की जांच करना चाहे या इस बारे में किसी भी तरह की सूचना प्राप्त करना चाहे तो आरटीआई कानून के अंतर्गत नागरिकों को यह सूचना प्राप्त करने, दस्तावेजों का निरीक्षण करने और उनकी फोटोकॉपी प्राप्त करने का अधिकार दिया जाना चाहिए। दल के पदाधिकारियों को व्यक्तिगत स्तर पर भी पारदर्शिता अपनानी चाहिए और अपनी वार्षिक आय व संपत्ति का ब्यौरा प्रस्तुत करना चाहिए। उन्हें इस बारे में निर्धारित नियमों के अनुसार नागरिकों व मीडिया को सूचना देने के लिए तैयार रहना चाहिए। चुनावों संबंधी सभी चंदे व खर्चों का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए। जितना कानूनी दृष्टि से जरूरी है, उससे भी कहीं अधिक पारदर्शिता दलों को अपनी पहल पर स्वयं अपनानी चाहिए, क्योंकि समाज में उनके प्रति पैदा हो रहा संदेह और अविश्वास घूम-फिर कर देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति अनास्था का रूप लेता जा रहा है।

 

भारत डोगरा

साभारः नवभारत टाइम्स