सवाल सांसदों के आपराधिक मामलों के त्वरित फैसले का

सांसदों के आपराधिक मामलों की जल्द सुनवाई के बारे में सुप्रीम कोर्ट का यह कहना सैद्धांतिक तौर पर सही है कि ऐसा करने से एक अलग श्रेणी बन जाएगी, लेकिन अगर महिलाओं और वरिष्ठ नागरिकों से जुड़े मामलों की जल्द सुनवाई की जरूरत महसूस की जा रही है तो फिर ऐसा ही सांसदों के मामले में क्यों नहीं सोचा जा सकता? चूंकि फिलहाल यह प्रश्न अनुत्तरित है और सुप्रीम कोर्ट राजनीति के अपराधीकरण पर लगाम लगाने के लिए संसद सदस्यों के खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों के शीघ्र निपटारे के लिए तैयार नहीं इसलिए अब देखना यह होगा कि मोदी सरकार इस सिलसिले में राज्यों से विचार-विमर्श के बाद कोई प्रभावी प्रस्ताव तैयार कर पाती है या नहीं?
 
यह सवाल इसलिए, क्योंकि ज्यादातर राजनीतिक दलों की इसमें दिलचस्पी नहीं कि संसद सदस्यों के आपराधिक मामलों की सुनवाई आनन-फानन हो। उनके रवैये को देखते हुए इसमें संदेह है कि वे इस विषय पर केंद्र सरकार के साथ विचार-विमर्श करने के लिए आगे आएंगे। सुप्रीम कोर्ट ने सांसदों के आपराधिक मामलों की जल्द सुनवाई के मामले में गेंद न केवल केंद्र सरकार के पाले में डाल दी है, बल्कि नए सिरे से यह भी रेखांकित किया है कि निचली अदालतें किस तरह संसाधनों के अभाव से जूझ रही हैं। इस अभाव के चलते अदालतों में करोड़ों मुकदमे लंबित हैं और फिलहाल इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं कि उनका निपटारा कैसे होगा?
 
करोड़ों लंबित मामले सुशासन की बुनियादी धारणा के खिलाफ हैं। देशवासियों को समय पर न्याय न मिलना लोकतंत्र के बुनियादी सिद्धांतों के भी खिलाफ है। हालांकि एक लंबे अर्से से लंबित मुकदमों का मामला बार-बार उठता है। कभी सरकार की ओर से और कभी न्यायपालिका की ओर से, लेकिन ऐसी व्यवस्था बनने के आसार अभी भी नजर नहीं आते जिससे न्यायिक प्रक्रिया को गति मिल सके और अदालतों में मुकदमों के बोझ को कम किया जा सके। समय पर न्याय उपलब्ध कराने के लिए त्वरित अदालतों के गठन से भी अभीष्ट की पूर्ति होती नहीं दिखती। इसी तरह सांध्य अदालतों के गठन की प्रक्रिया भी अभी अधर में ही है। चिंताजनक यह है कि राज्य सरकारें इसके प्रति तनिक भी सजग नजर नहीं आतीं कि निचली अदालतों में लंबित मुकदमों का निपटारा समय पर हो। निचले स्तर की अदालतों को जरूरी संसाधन प्रदान करने के मामले में ज्यादातर राज्य सरकारों का रवैया ढुलमुल ही है। समस्या यह है कि उच्च न्यायालय भी पर्याप्त संसाधनों से लैस नजर नहीं आते।
 
शायद ही कोई उच्च न्यायालय हो जहां न्यायाधीशों के पद रिक्त न हों। इन स्थितियों में इसका कोई मतलब नहीं कि बार-बार इसका उल्लेख किया जाए कि देश में मुकदमों के निपटारे की प्रक्रिया कितनी शिथिल है। इस शिथिलता से देश को उबारने की जिम्मेदारी देश के नीति-नियंताओं की है। बेहतर हो कि वे इस मसले पर उच्चतम न्यायालय के साथ विचार-विमर्श कर कोई ऐसी रूपरेखा तैयार करें जिसे शीघ्र अमल में भी लाया जा सके। लंबित मुकदमों के बोझ को समाप्त करने का यही तरीका है और इस दिशा में आगे बढ़ने में अब और अधिक देरी नहीं होनी चाहिए। 
 
 
- अविनाश चंद्र