सुधार की राह

गत पखवाड़े संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार द्वारा उठाए गए सुधार संबंधी कदमों का इस कदर स्वागत महज इसलिए हुआ क्योंकि उससे पहले सालों तक उसने निष्क्रियता दिखाई थी। जिन आर्थिक सुधारों की घोषणा की गई वे कोई ऐसे सुधार नहीं थे जो बहुत बड़ा बदलाव लाने वाले हों। बल्कि वे संकट को दूर रखने के लिए न्यूनतम जरूरी सुधार थे। बहरहाल सरकार खुद को इतना कर पाने के लिए प्रेरित कर पाई यह भी स्वागतयोग्य है। इतना ही नहीं इस क्रम में उसने अपने लिए लगातार परेशानी खड़ी करने वाले सहयोगी तृणमूल कांग्रेस का भी चुनौतीपूर्ण ढंग से मुकाबला किया। सुधारों की घोषणा के बाद निहायत अवसरवादी ढंग से तमाम राजनीतिक दल इनके विरोध में एकजुट हो गए थे लेकिन फिर भी इन्हें आंशिक तौर पर भी वापस नहीं लिया गया। सबसे उत्साहित करने वाली बात यह रही कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने खुद टेलीविजन पर आकर सरकार के इन कदमों का बचाव किया। उन्होंने इस क्रम में  और अधिक सुधारों का वादा किया। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि अब तक संप्रग नेतृत्व में बहुत कम लोगों ने सुधार के पक्ष में जोरदार ढंग से अपनी बात रखी है। तृणमूल कांग्रेस के गठबंधन से बाहर जाने का मतलब यही है कि भविष्य के सुधारों की राह और अधिक कठिन होगी। ऐसा इसलिए क्योंकि अधिक बड़े सुधारों को संसद में पारित करवाना होगा और ऐसे मौके पर विपक्ष की आपत्तियां उसके आड़े आएंगी। जब प्रधानमंत्री ने 'कड़े फैसलों' की बात की तो यकीनन वह अभी लंबित सुधारों की बात नहीं कर रहे थे। यकीनन भूमि अधिग्रहण विधेयक, पेंशन और बीमा विधेयक तथा वस्तु एवं सेवा कर आदि सभी बड़े सुधार संबंधी कदम हैं लेकिन सरकार की बुद्घिमता इसी में होगी कि वह वर्ष 2013 में अंतिम पूर्ण बजट पेश करने से पहले उन सुधारों पर ध्यान केंद्रित करे जिनको अंजाम देने के लिए उसे व्यापक राजनीतिक समर्थन की आवश्यकता नही हो। अगर सरकार आने वाले कुछ महीनों के लिए कार्य योजना तैयार करे तो यह बेहतर कदम होगा। इस दौरान सबसे महत्त्वपूर्ण लक्ष्य होना चाहिए राजकोषीय सुदृढ़ीकरण हासिल करने के लिए प्रतिबद्घता का प्रदर्शन । पेट्रोलियम उत्पादों को नियंत्रणमुक्त करना यकीनन एक सख्त कदम है लेकिन सरकार को यह सोचना चाहिए कि वह कैसे धीरे-धीरे इस दिशा में बढ़ सकती है। सब्सिडी को गरीबों तक नकदी के रूप में हस्तांतरित करने के लिए आधार योजना पर आधारित व्यवस्था तैयार होने के बाद ऐसा किया जा सकता है। उर्वरक सब्सिडी को आधार के साथ जोडऩे के काम को भी गति दी जा सकती है। एक और प्रशासनिक सुधार तथा 'बड़ा कदम' है बिजली क्षेत्र में बदलाव का क्रियान्वयन। इसमें राज्य बिजली बोर्डों के कर्ज पुनर्गठन से संबंधित प्रस्तावित सुधार शामिल हैं। कोयला रॉयल्टी में इजाफा और प्राकृतिक संसाधनों से होने वाले बेतहाशा लाभ के मूल्यांकन की पारदर्शी और साफ प्रक्रिया बनाकर संकेत दिया जा सकता है कि सरकार पिछले कई वर्षों के दौरान संसाधनों के आवंटन आदि में हो रहे भ्रष्टाचार की जगह सुधार लागू करने की मंशा रखती है। अंत में, बुनियादी ढांचा संबंधी परियोजनाओं को स्वीकृति संबंधी प्रशासनिक सुधार लंबे समय से लंबित है। हालंाकि प्रधानमंत्री बहुत स्वाभाविक और सहज संवाद करने वाले नेता नहीं हैं लेकिन उन्होंने सरकार द्वारा किए जा चुके छोटे सुधारों का बखूबी बचाव किया। लेकिन उनके भाषणा का सबसे महत्त्वपूर्ण हिस्सा वह था जिसमें उन्होंने और सुधारों का वादा किया। अब उन्होंने जो उम्मीदें जगाईं हैं उन्हें निराशा में नहीं बदलने देना चाहिए। भविष्य के 'सख्त कदमों' का खाका प्रतीक्षित है।

(हिंदी बिजनेस स्टैंडर्ड से साभार)