विकास की राह में विषमता की फिक्र छोड़ दें

लोग अगर पूरी तरह स्वतंत्र हों तो सबसे ज्यादा प्रतिभावान ( और सौभाग्यशाली ) लोग सबसे सुस्त और दुर्भाग्यशाली लोगों से कहीं ज्यादा अमीर होंगे। यानी स्वतंत्रता से असमानता पैदा होगी। कम्युनिस्ट देशों ने तानाशाही नियंत्रण के जरिए समाज में समता लाने का प्रयास किया , लेकिन वह पाखंड मात्र था। इन देशों में नियम बनाने वालों और उनका पालन करने वालों के बीच ताकत की कोई समानता मौजूद नहीं थी। स्वतंत्रता और समानता के बीच का तनाव कम करने के लिए देशों को अवसरों की समानता लाने का लक्ष्य लेकर चलना होता है , परिणाम की समानता का नहीं। इसके बावजूद अर्थशास्त्री लगभग हर जगह विषमता का आकलन परिणाम के ही पदों में करते हैं। इससे आंकड़ों का विरोधाभास उत्पन्न होता और गलत विश्लेषण सामने आता है।

साथ की टेबल में उपभोग की दृष्टि से छह सबसे सम और और इतने ही सबसे विषम राज्यों के आंकड़े दिए हुए हैं। आकलन का आधार गिनी सूचकांक को बनाया गया है, जिसे समानता की मानक सांख्यिकीय माप माना जाता है। 1 की उच्चता वाले गिनी का अर्थ है पूर्ण विषमता और 0 की न्यूनता वाले गिनी का अर्थ है पूर्ण समानता। हम देख सकते हैं कि उपभोग की सबसे ज्यादा समानता (यानी सबसे कम ग्रामीण गिनी) वाले राज्य देश के सबसे गरीब राज्य ही हैं। 0.17 गिनी वाले राज्य बिहार और असम देश में सबसे ज्यादा समतापूर्ण हैं। लेकिन क्या वे सबसे न्यायसंगत और सबसे खुशहाल लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं ? बिल्कुल नहीं। दशकों तक उन्हें गरीबी , कुशासन और धीमी वृद्धि दर का अभिशाप झेलना पड़ा है।

हाल में नीतीश कुमार के शासन में बिहार ने रेकॉर्ड वृद्धि दर हासिल की है और उसके शासन की दशा में भी सुधार हुआ है। 2009-10 के लिए जब बिहार में समानता के आंकड़े जारी होंगे तो निश्चित रूप से उनमें उपभोग की विषमता बढ़ी हुई नजर आएगी। विश्लेषक इसकी व्याख्या बिहार में बढ़ती विसंगति के रूप में कर सकते हैं , लेकिन यह महज एक बकवास होगी। बिहार, उड़ीसा और छत्तीसगढ़ जैसे गरीब राज्यों में खराब गिनी के बावजूद मुख्यमंत्रियों को अधिक बहुमत के साथ दोबारा चुने जाने का अवसर प्राप्त हो रहा है। ऐसे राज्यों में लोगों के लिए सुधार के अवसर बढ़े हैं और यह उनके लिए परिणामों आधारित समानता से ज्यादा महत्वपूर्ण है।

ग्रामीण गिनी के मामले में सबसे ज्यादा विषमतापूर्ण स्थिति देश के सबसे अमीर राज्यों की है। 0.31 के साथ हरियाणा इस सूची में सबसे ऊपर है और फिर केरल (0.29), महाराष्ट्र (0.27), तमिलनाडु (0.26), पंजाब (0.26) और गुजरात (0.25) का नंबर आता है। गरीब राज्यों में उपभोग की समानता 0.25 के अखिल भारतीय स्तर से नीचे और अमीर राज्यों में इससे ऊपर है। यह समानता संबंधित समाजों में मौजूद संतुष्टि का नहीं बल्कि वहां की बेचैनी की परिचायक है। लोग काफी समय से समतापूर्ण लेकिन गरीब राज्यों से विषमतापूर्ण लेकिन समृद्ध राज्यों की ओर पलायन करते आए हैं। अधिक समतापूर्ण ग्रामीण क्षेत्रों को छोड़कर लोग अधिक विषमतापूर्ण शहरी क्षेत्रों की तरफ भी पलायन करते हैं। अमीर और गरीब इलाकों के बीच फासला जितना ज्यादा होता है, पलायन से होने वाले फायदे उतने ही बढ़ जाते हैं।

ज्यादातर लोगों के लिए इस टेबल में सबसे ज्यादा आश्चर्यजनक आंकड़ा केरल का होगा। काफी समय से यह राज्य अपने समाज की कल्याणकारी, समाजवादी व्यवस्था पर गर्व करता आया है, लेकिन ग्रामीण उपभोग विषमता के आंकड़े (0.29) इसे ऊपर से दूसरे स्थान पर रखते हैं। इस माप से केरल की हालत बिहार और यूपी से कहीं ज्यादा खराब नजर आती है। ध्यान रहे, केरल मुख्यत : बाहर से आने वाले वेतन पर चलने वाली अर्थव्यवस्था है और इसके जीडीपी का एक चौथाई इसी मद से आता है। जिन घरों में बाहर की कमाई आती है, उनकी हालत बाकी घरों से बेहतर होती है। सामाजिक संसूचकों के मामले में केरल की स्थिति भारत में सबसे अच्छी है। इसका अर्थ यह है कि वहां अवसरों की समानता सबसे ज्यादा है। लेकिन इसका अर्थ परिणामों की समानता नहीं है, और ऐसा होने की कोई वजह भी नहीं है। जाहिर है, विषमतापूर्ण केरल लोगों को समतापूर्ण बिहार और यूपी से बेहतर लगता है, क्योंकि वहां ऐसे कौशल विकसित करने के अवसर ज्यादा हैं, जिनसे बाजार में ज्यादा पैसे कमाने की संभावना बनती है।

हरियाणा में ग्रामीण उपभोग विषमता सबसे ज्यादा है। दिल्ली के बगल में इसकी उपस्थिति ने यहां जमीन की प्रति एकड़ कीमत करोड़ों में पहुंचा दी है और बड़े किसानों को अचानक रईस बना दिया है। और तो और, यहां एक एकड़ के किसान भी करोड़पति हैं, लेकिन इसे पकड़ पाना गिनी के बूते से बाहर है। ये छोटे किसान उन शहरी लोगों से भी ज्यादा अमीर हैं, जो एक लाख रुपये महीने से ज्यादा कमाते हैं, लेकिन जायदाद के नाम पर जिनके पास कुछ भी नहीं है।

यह टेबल यह भी बताती है कि अमीर और गरीब, दोनों ही तरह के राज्यों के शहरी गिनी में ज्यादा अंतर नहीं है। अंतर उनके ग्रामीण गिनी में है। एक ही राज्य के भीतर होने वाले पलायन की मात्रा एक राज्य से दूसरे राज्य को होने वाले पलायन की तुलना में कहीं ज्यादा है। कुलीन भूस्वामी लोकल थाने और मालगुजारी के अफसरों को अपनी जेब में रखे रहते हैं और बाकी गांव वालों को जरा भी तरक्की नहीं करने देते। ग्रामीण गरीब उनकी एकछत्र सत्ता के अत्याचारों से बचने के लिए पास के शहरों में चले जाते हैं। यह कहना आसान है कि बाकी चीजें समान हों तो आय की बराबरी समाज की बेहतरी का परिचायक होगी। लेकिन बाकी चीजें समान होती ही नहीं, क्योंकि अवसरों की समानता परिणाम की विषमता को जन्म देती है। जिस तरह जीडीपी से लोगों की खुशहाली के बारे में ज्यादा कुछ नहीं जाना जा सकता, उसी तरह आय की समानता से भी किसी समाज के न्यायसंगत होने की पूरी तस्वीर सामने नहीं आती।

- स्वामीनाथन अय्यर

स्वामीनाथन अय्यर