अच्छे दिन सिर्फ तीव्र आर्थिक विकास और नौकरियोँ से आते हैं

मुख्य आर्थिक सलाहकार के पद से जाते जाते अरविंद सुब्रमणियन शब्दकोश को एक नयी शब्दावली “कलंकित पूंजीवाद” देते गए। इसके जरिए वह यह कहना चाहते थे कि स्वतंत्र बाजार को आज भी भारत में समुचित स्थान नहीं मिल सका है। समस्या गहरी होती जा रही है। अधिकतर भारतीय वैश्विक आर्थिक संकट के बाद से बगैर सोचे ही आर्थिक विकास पर सवाल उठाने के पाश्चात्य सनक को अंगीकार कर रहे हैं।

ऐसा लगता है कि अर्थशास्त्र की शिक्षा के दौरान पहले वर्ष में पढ़ाई जाने वाली बात को हम भूल चुके हैं, जिसमेँ यह बताया जाता है कि केवल तीव्र विकास की दर ही वह एक मात्र जरिया है जिसकी मदद से किसी गरीब देश के अमीर बनने की उम्मीद लगाई जा सकती है। विकास के प्रति संशय रखना उस स्थिति में सही हो सकता है जब प्रति व्यक्ति आय 40,000 डॉलर हो, उस स्थिति में नहीं, जब यह 200 डॉलर से भी कम हो। यूपीए-2 आंशिक रूप से इसलिए असफल हुई क्योंकि उसने समानता के लिए विकास से समझौता कर लिया; और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसलिए अच्छे दिन नहीं ला सके क्योंकि वह एकनिष्ठता से नौकरिया उत्पन्न नहीं कर सके और तीव्र विकास नहीं हुआ।

मैने वर्ष 2010 के शुरुआत में एक टीवी प्रोग्राम में खुशी मनाई थी जब भारत की जीडीपी में पहली तिमाही के मुकाबले 10% अधिक विकास दर्ज किया गया था, यहाँ उल्लेखनीय बात यह है कि लगभग एक दशक तक यह इसमें लगातार 8% की बढोत्तरी जारी रही। मैने कहा था कि अब अंततः भारत को वर्ष 1991 में किए गए आर्थिक सुधारोँ का लाभ मिल रहा है और अगर विकास की यह दर अगले दो दशकोँ तक जारी रही तो हमारा देश एक सम्मानजनक मध्यम आय वर्ग की श्रेणी में आ जाएगा। लेकिन उस वक्त मुझे बेहद हैरानी हुई जब प्रोग्राम के अन्य पैनलिस्ट मेरे ऊपर आक्रमण करने लग गए।

एक ने इसे ‘जॉबलेस ग्रोथ’ कहकर खारिज कर दिया। दूसरा ने मुझे ‘संयुक्त विकास’ के संदर्भ में ज्ञान देना शुरू कर दिया’। मुझे बहुत दुख हुआ और मैं हैरान भी था। कोई भी देश साल-दर-साल इस तरह का विकास देखने के लिए मरता है और यहाँ बैठे दो नेता इस बात को लेकर शर्मिंदा हो रहे थे।

सोनिया गांधी की एडवाइजरी काउंसिल के दौरान विकास को लेकर संशयवाद अपने चरम पर पहुंच चुका था। परिणामस्वरूप, सरकार ने अपना ध्यान विकास से हटाकर नरेगा, खाद्य सुरक्षा और अन्य ऐसी योजनाओँ पर लगा दिया जो गरीबोँ के लिए शुरू की गई थीँ और इसने एक ‘पॉलिसी पैरालिसिस’ की स्थिति को जन्म दिया। इसमेँ कोई संदेह नहीं है कि वर्ष 2011 के बाद विकास गोते खाने लग गया और इसने मोदी को सत्ता में लाने में मदद की, क्योंकि उन्होने विकास का वादा किया, जो कि तीव्र विकास और नई नौकरियोँ के सृजन का एक कोड वर्ड है। सात साल बाद भी, अर्थव्यवस्था 2011 से पहले के मोमेंटम में नहीं पहुंच पाई है और मोदी अपना वादा पूरा नहीँ कर पाए हैं।

जीडीपी विकास को लेकर अमीर देशोँ में सवाल उठना लाजमी है क्योंकि वहाँ हाल के दशकोँ में विकास का लाभ समान रूप से वितरित नहीँ हुआ है। अमेरिका में डोनल्ड ट्रम्प को सत्ता में लाने के पीछे भी आंशिक रूप से यह कारण जिम्मेदार है। भारत के लिए इस सबसे सावधानी वाला यह पाठ सीखने की नहीं इससे सीखने की जरूरत है कि कैसे पश्चिम और  इससे सुदूर स्थित पूरब अमीरी के मामले में पहले स्थान पर पहुंच गए हैं।

मानवीय इतिहास के अधिकतर काल में हर देश गरीब ही रहा है। गंभीर विकास की शुरुआत दुनिया में करीब 1800 में औद्योगिक क्रांति के जरिए हुई। वर्ष 1 से लेकर 1800 तक, दुनिया की प्रति व्यक्ति औसत जीडीपी प्रवाहहीन थी, 200 डॉलर से भी नीचे, 2000 तह यह 6,539 डॉलर तक बढ़ गई। इस अप्रत्याशित आर्थिक विकास के परिणाम स्वरूप लोगोँ के जीवनस्तर में सुधार आया। यहाँ तक कि स्वतंत्रता के बाद भारत का विकास शुरू हुआ, 1950 में 71 डॉलर प्रति व्यक्ति आय 2018 में 1,975 डॉलर प्रति वर्ष हो गई। चाइना में यह अधिक नाटकीय रहा।

यहाँ तक कि डेविड पिलिंग, जिन्होंने अपनी हालिया किताब द ग्रोथ डायल्यूज़न में जीडीपी के सिद्धांत पर सवाल उठाया है, मानते हैं कि, ‘यदि आप गरीब होते हो तो आर्थिक विकास सुधारात्मक हो सकता है। मैने विकास संदेहवादियोँ से पूछा, क्या दुनिया में तेजी से रहन-सहन के स्तर में हो रहा सुधार गलत चीज है?

सिद्धांत की कुछ प्रत्यक्ष सीमाएँ हैं। जीडीपी आय के वितरण, सरकारी सेवाओँ के महत्व, स्वच्छ हवा, किसानोँ के भोजन उपलब्ध कराने हेतु मेहनतकश कार्य और उन सभी लोगोँ की कर्योँ को नही दर्शाता है जो अनौपचारिक अर्थव्यवस्था का हिस्सा हैं, जबकि दुनिया की एक तिहाई आबादी इसी श्रेणी में आती है। इसमेँ घर के कार्योँ, बुजुर्गोँ और बच्चोँ की देखभाल को भी शामिल नहीं किया जाता है, जो अधिकतर महिलाएँ करती हैं।

अगर अर्थव्यवस्था में तीव्र विकास हो रहा हो और बावजूद इसके अधिकतर लोगोँ को लाभ न मिल रहा हो तब तो यह सवाल पूछ्ना बनता है कि ऐसे जीडीपी विकास का क्या मतलब है। लेकिन एक गरीब देश में ऐसा नहीं होता है, जहाँ तीव्र विकास अपने साथ तमाम फायदे लेकर आता है और लेफ्ट के उस कथन को नकार देता है कि बाजार कामकाजी वर्ग को दरिद्र बना देगा।

विकास संदेहवादी जापान के क्लासिक उदाहरण का उल्लेख करते हैं, जहाँ 25 सालोँ तक विकास की गति रुकी हुई थी बावजूद इसके गिरती अथवा स्थिर बनी हुई कीमतोँ के चलते जीवन स्तर में सुधार महसूस किया जा रहा था। लेकिन वर्ष 1990 और 2007 के बीच जापान की वास्तविक जीडीपी व्यति व्यक्ति असल में 20% तक बढ़ गई। इसकी मिस्ट्री उस गलती में छिपी हुई थी जिसके तहत नॉमिनल जीडीपी का इस्तेमाल किया गया जबकि विकास को मापने का सही तरीका प्रति व्यक्ति जीडीपी, मुद्रास्फीति है।

मैं उन पर्यावरणविदोँ से पूरी तरह सहमत हूँ जो अधिक से अधिक पानी के इस्तेमाल को लेकर चिंतित हैं, अधिक से अधिक कार्बन डाईऑक्साइड उगलने और अधिक से अधिक कोयला जलाने के लेकर परेशान रहते हैं। निश्चित रूप से भारत को अपनी आबो-हवा और नदियोँ के प्रदूषण को दूर करना चाहिए। लेकिन आर्थिक विकास को प्रदूषण के साथ बराबरी में लाकर देखना और यह निष्कर्ष निकालना सही नहीं है कि हमेँ विकास और पर्यावरण में से किसी एक को प्राथमिकता देने की जरूरत है। ऐसा पूरी तरह से सम्भव है कि हम स्वच्छ वातावरण सुनिश्चित करते हुए अनंत विकास के लक्ष्य को हासिल कर सकेँ।
समस्या जीडीपी के साथ नहीं है बल्कि हम इसे योजनाएँ बनाने में किस प्रकार इस्तेमाल करते हैं उसमेँ है। अगर हम इसका इस्तेमाल अन्य सूचियोँ को साथ लेकर करेँ जैसे कि मानवीय विकास और प्रसन्नता, तो हमेँ इंसानी खुशहाली को बेहतर ढंग से आंकने का अवसर मिलेगा। बाजार की असमानता के बारे में सोचने के बजाए हमेँ अच्छे स्कूल व हॉस्पिटल आदि में निवेश के जरिए अवसरोँ में सुधार की समीक्षा की जानी चाहिए।

आइए हम बिना सोचे समझे आधुनिकतम अंतरराष्ट्रीय फैशन को अपनाना बंद कर देँ और यह याद करेँ कि हमारे विकास के चरण में, लगातार तीव्र आर्थिक विकास, नौकरियाँ और वैश्विक अर्थव्यवस्था को लेकर खुलापन समृद्धि का मुख्य द्वार है।

- गुरचरण दास (लेखक प्रॉक्टर एंड गैम्बल इंडिया के पूर्व सीईओ हैं)

साभारः http://gurcharandas.org/newspapers/times-india

गुरचरण दास

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