विकल्प दीजिए, ना कि खैरात

एक बार फिर स्कूल एडमीशन की सरगर्मियां जोरो पर है। इसी बीच स्कूल संगठनों ने यह मांग दोहराई है कि उन्हें मैनेजमेंट कोटा के अंन्तर्गत एडमीशन की छूट दी जाए। पर जिस तरह से मैनेजमेंट सीटों की नीलामी की जाती है, उसे देखते हुए सरकार शायद ही इसे छूट दे। आखिर ऐसा क्यों है कि निजी स्कूल मनमाने पैसे वसूल कर नर्सरी में दाखिला देना चाहते है?

एक अनुमान के अनुसार, दिल्ली में एक लाख के करीब निजी नर्सरी सीटें और चार लाख बच्चे हैं। यह विडंबना ही है कि दिल्ली में सर्वोत्तम स्कूलों में से आधे दक्षिण दिल्ली में स्थित है, फिर भी नर्सरी सीटों की संख्या जनसंख्या के अनुपात सबसे कम है - ३ प्रति 1000 लोग। दक्षिण दिल्ली में एक बच्चे को स्कूल में दाखिल करवाना सबसे कठिन है। जिला उत्तरी दिल्ली में 1000 लोगों में ३.२ निजी नर्सरी सीटें हैं, जबकि जिला नई दिल्ली में १७ है।

मांग और आपूर्ति में बहुत बड़ा अंतर है. आर टी ई लागू होने के बाद से निजी स्कूलों में समाज के आर्थिक रूप से कमजोर और वंचित वर्गों से 25% बच्चों को भी एडमीशन देना होगा। इस से सीटों की संख्या जनरल केटेगरी के लिए और भी कम रहेगी और स्कूलों के खर्चें बढ़ेंगे। सरकार चाहे जितनी सख्ती बरते, लेकिन सभी स्कूलों पर नजर रखना असंभव है और अत्यधिक सख्ती केवल मुकदमेबाजी और शिकायतों की भरमार लगा देगी।

तो फिर समाधान क्या है? अधिक सरकारी स्कूल खोलना? अभिभावक इसका जवाब ना में देते है। ज़्यादातर सरकारी स्कूल के शिक्षक और सरकारी अफसर खुद भी अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों, खास कर एमसीडी के स्कूलों में नहीं पढाते।

समाधान है: लाइसेंस परमिट राज से छुटकारा। अधिक से अधिक निजी स्कूल खुलने चाहिए और अधिक विकल्प और प्रतिस्पर्धा होनी चाहिए। परन्तु जब तक शिक्षा गैर-मुनाफे का क्षेत्र है, ऐसा नहीं हो सकता।

कौन सा गैर सरकारी संगठन दक्षिण दिल्ली में एक प्राथमिक स्कूल खोलने के लिए 50 करोड़ रुपये का निवेश करना पसंद करेगा? कॉर्पोरेट भारत औपचारिक रूप से शिक्षा के क्षेत्र में निवेश अवश्य करेगा, बशर्ते  सरकार लाभ-के-लिए  स्कूलों को अनुमति प्रदान करे। ऐसा सुनने में अटपटा लग सकता है, कि जिन निजी स्कूलों को कंट्रोल करना अभी टेढ़ी खीर साबित हो रहा है, उन्हें अधिक छूट देने से समस्या सुलझ जायेगी। पर ऐसा अवश्य होगा। अभी एक स्कूल खोलने के लिए १५ से ज़्यादा लाइसेंस और परमिट चाहिए और इस प्रक्रिया में कई साल लगते है। इसे सुगम बनाने की आवश्यकता है। लोग अपने बच्चों के लिए बढ़िया शिक्षा चाहते है, न कि मुफ्त शिक्षा।

 

- प्रशांत नारंग 

(अधिवक्ता, आई-जस्टिस – सेंटर फॉर सिविल सोसाईटी की एक जन कानूनी पहल )