हमारे बदहाल होते शहर

बारिश आई नहीं कि हमारे शहरों के बखिए उधडऩे लगते हैं। ताशमहल की तरह ढहते पुराने या निर्माणाधीन (अक्सर अवैध) नए मकान, बदहाल सड़कें, जलभराव से अदृश्य बने फुटपाथ, वाहन चालकों के दु:स्वप्न बने सड़कों पर बिछे जर्जर जड़ों वाले उखड़े पेड़, ट्रैफिक जाम और बिना ढक्कन वाले मेनहोलों से भलभलाकर सड़क पर उफनाते शहरी नाले; यह आज मानसूनी महीनों के दौरान देश के तकरीबन हर बड़े शहर का नजारा है। फिर गर्मी आई तो बिजली, पानी की कमी और बीमारियों का प्रकोप चालू हुआ। जब-जब इस बदहाली के दोष का विभिन्न राजनेताओं के बीच बंटवारा होने लगता है, तब-तब कहा जाने लगता है कि हमारा दोष नहीं, अमुक ने समय रहते शहर की बदहाली को नहीं संवारा। अमुकजी कहते हैं, हम क्या करते? हमारे पहले या बाद में आए हुओं ने लाखों घुसपैठियों का नया वोट बैंक बनाने के लालच में यहां बाहरियों को लाकर भर दिया। वे ही शहर का बंटाढार कर रहे हैं। इससे इनकार करना कठिन है कि शहरों की बदहाली की एक बड़ी वजह ग्रामीण इलाकों से रोजी-रोटी कमाने के लिए महानगरों को हो रहा पलायन है, जो हमारे बड़े शहरों की आबादी तथा अवैध रिहायशी बस्तियों की संख्या लगातार बढ़ा रहा है। अनुमानित यह भी है कि इस रफ्तार से 2025 तक दुनिया की आबादी का पांचवां हिस्सा हमारे शहरों में मौजूद होगा और मुंबई जो आज दुनिया का छठा सबसे घनी आबादीवाला शहर है, नंबर दो की पायदान पर खड़ा हो जाएगा। फिर भी राज ठाकरे या बोडो नेताओं की तरह उप-क्षेत्रीयता की हांक लगाकर महानगर के ढेरों वे काम, जो स्थानीय लोग नहीं कर सकते या करना नहीं चाहते, संभाले हुए बाहरिया लोगों के खिलाफ हिंसा को तूल देना खतरनाक ही नहीं, बेमतलब भी है।

सच तो यह है कि अहमदाबाद, नासिक से लेकर मुंबई और बेंगलुरु तक हमारा हर महानगर बाहरी क्षेत्रों से आए इन सस्ते और हुनरमंद श्रमिकों के बूते ही फला-फूला है। असम में निर्माण कार्य में बांग्लादेशी कारीगर बरसों से दिनभर दिहाड़ी लगाने आते रहे हैं। पंजाब के खेत, गुजरात में हीरों की पॉलिशिंग व बुनकरी का काम, बेंगलुरु व चेन्नई में रेस्तरां के बेयरों या ब्यूटीशियनों का हुनर, सब प्रवासी ही संभाले हुए हैं। केरल की चुस्त नर्सों के बिना तो देश के तमाम अस्पताल ठप हो जाएंगे।

आज यदि गरीबी की मार से बिहार के लोग महाराष्ट्र में आते हैं, तो यह भी सच है कि वे मुफ्तखोरी से नहीं, उत्पादक व कामगार बनकर ही परदेस में अपनी जगह बना पाते हैं। शहरों के अपराधों में कुछ नाम उनके भी भले हों, लेकिन बड़े अपराध तंत्र अक्सर गवली या दाऊद सरीखे स्थानीय मुखिया, लोकल नेताओं की सरपरस्ती से ही चलाते हैं। उन्नीसवीं सदी में (पहले मुगल शासन के पतनकाल में और फिर पुणे में पेशवाशाही की समाप्ति के साथ) प्रवास की गंगा उत्तर को बहती थी। तब महाराष्ट्रीय मूल के हर जाति और आयवर्ग के लोगों की भारी आबादी (जिसमें ग्वालियर, इंदौर और झांसी के क्षत्रप भी थे) बिहार और उत्तर प्रदेश से उत्तराखंड को गई और उनमें से अधिसंख्य उत्तर में ही बस रहे। नानासाहब पेशवा को तो ब्रिटिश लोगों ने वाराणसी कभी नहीं जाने दिया, क्योंकि उनको डर था कि वे वहां बसे अनेक महाराष्ट्रीय परिवारों से मिलकर बगावत की शुरुआत न कर डालें। उत्तराखंड में बसे महाराष्ट्रीय मूल के परिवारों में कालांतर में पं. गोविंद बल्लभ पंत और सुमित्रानंदन पंत सरीखे लोग भी जन्मे। वे भी केरल से गुजरात में आकर अमूल की शुरुआत करने वाले श्वेत क्रांति के जनक वर्गीज कुरियन या गुजरात से मुंबई में आन बसे अजीम प्रेमजी और राजस्थान से बंगाल जा बसे बिरला परिवार की तरह राष्ट्रीय पहचान रखते हैं। अन्य क्षेत्र में प्रवासी बनकर इन सबने अपने उपक्रमों से अपनी नई मातृभू को समृद्धि दी और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा ही दिलाई। आज का शहरी क्षरण और घटती जनसुविधाएं तो ई-कचरे की तरह आधुनिक सभ्यता से हर जगह उपजी समस्या हैं और उनसे निबटने के लिए गैर-क्षेत्रीय आबादी पर हमला करना असली बात को नकारना ही है। गौरतलब है कि शिवसैनिकों या श्रीरामसेना वालों का नकली गुस्सा जब गैर-क्षेत्रीय आबादी पर फूटता है तो अमीरों तक उसकी आंच कभी नहीं जाती। नजला गरीब लोगों, उनकी बस्तियों और उनकी कमाई के साधनों पर ही झाड़ा जाता है।

हमारे देश में किसी भी क्षेत्र और प्रदेश का निर्माण व विकास तभी हुआ है, जब जनता सबसे अधिक संचरणशील हुई और खुलकर अपने क्षेत्र से इतर इलाकों में जाकर घुली-मिली। हमारी जनता के मन में अपने देश की सशक्त पहचान बनाने में रेलों ने, यातायात सुविधाओं ने और संचार साधनों ने कोई कम योगदान नहीं दिया है। वरना 19वीं दी के शुरुआती बरसों तक उत्तर-भारतीय दक्षिणी लोगों के लिए लगभग हमेशा एक आर्यावर्तवासी और विंध्य तले का मानुस उत्तर के लोगों के लिए दाक्षिणात्य (मद्रासी) रहा आया। हमारे देश की मूल फितरत जातियों, भाषाओं और नए-नए समुदायों के मेल-मिलाप से ही बनी है। उसे क्षेत्रीय खानों में बांटना भयावह विघटन न्योतना होगा। जभी हजारों बरस पहले वेदों ने कहा कि चरैवेति, यानी चलते रहो। बुद्ध ने स्थविरों से कहा कि वे निर्भयता से सर्वत्र विचरण करें और शंकराचार्य ने उत्तराखंड के मंदिरों में केरल के पुजारी ला स्थापित किए। संतों, स्थविरों, नाथ साधुओं, सूफी फकीरों, घुमंतू गायकों के जत्थे उमड़कर पूरे देश को न नाप रंग चुके होते तो आज जिसे हम बड़े गर्व से भारतीय सभ्यता कहते हैं, वह कैसे बन पाती?

असम से आंध्र या महाराष्ट्र तक क्षेत्रीय अलगाववाद की जो खतरनाक आंधियां इधर उठ रही हैं, उनके पीछे दरअसल कुछ राजनीतिक मठों की रक्षा का जोश और कुछ मठाधीशों की निजी पारिवारिक लाग डांट ही अधिक बलशाली है। बाहरियो भागो! चिल्लाने वाले नेताओं के भीतर राष्ट्रीय अस्मिता बनाने की नहीं, बस जिन्ना की तरह अपने उपराष्ट्रीय साम्राज्य को ही पहले राज्य और फिर राष्ट्र का खाका पहनाने की विघटनकारी जिद है। यह भी दुखद है कि इस तरह की स्थिति में सरकारें हिंसक रैली को भी एक तटस्थ सहानुभूति से बरतती हैं। इस तरह की अन्यायपूर्ण नर्माई से तो वही पुरानी बीमारी फिर बढ़ेगी, जिसके तहत 1960 में फ्लोरा फाउंटेन पर गोलियां चलीं, सारे प्रगतिशील भाषा की नाव की सवारी कर एक मंच पर आ जुटे और महाराष्ट्र बना। फिर 1967 में शिवसेना ने जन्म लेकर गोवा से पुर्तगाली सत्ता हटा चुके वीके कृष्ण मेनन सरीखे नेता को मुंबई से चुनाव में हरवा दिया। क्यों? क्योंकि वे मराठी मानुस नहीं, दक्षिण भारतीय थे।

वीके कृष्ण मेनन १७ अप्रैल १९५७ से ३१ अक्टूबर १९६२ तक देश के रक्षा मंत्री रहे। वर्ष १९५४ में उन्हें 'पद्म-विभूषण' अलंकरण प्रदान किया गया। यह सम्मान पाने वाले वह पहले मलयाली थे।

- मृणाल पांडे, लेखिका वरिष्ठ पत्रकार व स्तंभकार हैं।
साभारः दैनिक भास्कर