ईंट दर ईंट ऐसे ढही...

बर्लिन की दीवार बनने का फैसला साम्यवाद को बचाने की आखिरी कोशिश कहा जा सकता है लेकिन दुनिया का दस्तूर है दीवारों के सहारे दुनिया को सुरक्षित रखने के नाम पर असुरक्षित नहीं रखा जा सकता। वैमनस्य और शोषण का प्रतीक बनी यह दीवार किन हालातों में बनी और ढहीः

  • 1945 जर्मनी के आत्मसमर्पण करने के साथ ही दूसरे विश्व युद्ध का अंत हो गया। पोस्टडैम कांफ्रेंस में जर्मनी और बर्लिन को चार जोनों, ब्रिटिश, अमेरिकी, फ्रांसीसी और सोवियत में विभाजित कर दिया गया।
  • 1948 में पूर्वी  और पश्चिमी बर्लिन में अलग-अलग सरकारों का गठन हुआ।
  • 1949 अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस ने फेडरल रिपब्लिक ऑफ जर्मनी के रूप में एक लोकतांत्रिक जर्मनी की स्थापना की जबकि सोवियत संघ ने कम्युनिस्ट पूर्वी जर्मनी के रूप में जर्मन डेमोक्रेटिक रिपब्लिक का गठन किया।
  • 1950-60 अमेरिका और सोवियत संघ में शीत युद्ध चलता रहा। पश्चिमी जर्मनी और समृद्ध हो रहा था जबकि पूर्वी बर्लिन से 30 लाख लोग पश्चिम को पलायन कर चुके थे।
  • 13 अगस्त 1961 को पूर्वी जर्मनी के सैनिकों ने पूर्वी और पश्चिमी बर्लिन के बीच तार की बाड़ लगा दी। दो दिन बाद वहां कंक्रीट की स्लैब लगा दी गईं। अपने अंतिम रूप में बर्लिन की दीवार 96 मील लंबी थी और 12 फुट ऊंची।
  • 1970-80 के दशक में लोगों का चोरी छिपे दीवार की दूसरी ओर जाना जारी रहा।
  • 1985 में सोवियत संघ में मिखाइल गोर्बाचॉफ ने सत्ता की बागडोर संभाली। उन्होंने लोकतांत्रिक सुधारों की शुरूआत की। वहीं पूवी जर्मनीवासियों ने कम्युनिज्म के खिलाफ आवाज बुलंद करनी शुरू की।
  • 9 नवंबर 1989 को बर्लिन की दीवार को हटा दिया गया। आवाजाही संबंधी प्रतिबंध हटा दिए गए।