बीमारू राज्यों का अच्छा प्रदर्शन

उत्तर भारत के हिंदीभाषी राज्यों को आमतौर पर पिछड़ा मान लिया जाता है। सामाजिक विकास के तमाम पैमानों पर ये राज्य पिछड़े हुए हैं, चाहे वह शिक्षा हो, स्वास्थ्य हो या स्त्री-पुरुष बराबरी हो। जनसंख्या नियंत्रण के उद्देश्यों को पूरा करने में ये राज्य सबसे बड़ी बाधा हैं, दक्षिणी राज्यों ने औसतन 2.1 जन्म प्रति दंपति का लक्ष्य पा लिया है, यानी उनकी जनसंख्या लगभग स्थिर हो गई है। इसलिए जब ऐसे आंकड़े आते हैं, जिनसे पता चलता है कि इन राज्यों ने दक्षिणी राज्यों से बेहतर प्रदर्शन किया है, तो यह सुखद लगता है।

उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ ने अपनी अर्थव्यवस्था का विकसित राज्यों, मसलन गुजरात और महाराष्ट्र के मुकाबले बेहतर ढंग से प्रबंध किया है। पिछले छह वर्षों में इन राज्यों पर कर्ज का बोझ तेजी से कम हुआ है और इनकी विकास दर भी काफी बढ़ी है। बिहार और छत्तीसगढ़ ने लगभग नगण्य विकास से चलकर दहाई से ऊपर विकास दर हासिल की है। इस बीच कर्ज का बोझ घटाने में छत्तीसगढ़ सबसे ऊपर है, उसके पीछे-पीछे बिहार और उत्तर प्रदेश हैं।

अगर इन राज्यों की अर्थव्यवस्था में सुधार इसी गति से जारी रहे, तो विकसित राज्यों की कतार में खड़े होने में उन्हें ज्यादा वक्त नहीं लगेगा। इसके अलावा बेहतर आर्थिक प्रदर्शन का असर सामाजिक बेहतरी के पैमानों पर भी ज्यादा प्रभावशाली ढंग से दिखने लगेगा। हम उम्मीद कर सकते हैं कि इन राज्यों पर लगा ‘बीमारू’ होने का ठप्पा भी ज्यादा दिनों का मेहमान नहीं रहेगा। नब्बे के दशक तक इन राज्यों में पिछड़ों या दलितों का नेतृत्व सिर्फ प्रतीकात्मक ही था।

इसके बाद जब अर्थव्यवस्था में उदारीकरण के बाद तेज विकास का दौर शुरू हुआ, तो इनमें से ज्यादातर राज्य राजनीतिक उथल-पुथल के शिकार हुए। मंडलवाद के बाद सबसे ज्यादा राजनीतिक अस्थिरता इन्हीं राज्यों में हुई और इस वजह से आर्थिक और सामाजिक विकास की उपेक्षा हुई। पिछले कुछ वर्षों से इन सभी राज्यों में राजनीतिक स्थिरता है, इसलिए राजनीतिक नेतृत्व विकास के नजरिये से काम कर पाया है। बिहार, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में एक ही पार्टी या गठबंधन के वही मुख्यमंत्री दूसरे कार्यकाल में काम कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश में लंबे अर्से के बाद एक पार्टी को पूर्ण बहुमत मिला और मुख्यमंत्री ने बिना किसी राजनीतिक संकट के अपना कार्यकाल पूरा किया है।

पिछले वर्षों में हुए चुनावों ने यह भी साबित किया है कि अगर सरकार जनता की अपेक्षाओं पर खरी उतरती है, तो जनता उसे फिर चुन सकती है, फितरतन सरकार बदलना उत्तर भारतीय जनता के मिजाज में नहीं है। ऐसे में, मौजूदा सत्तारूढ़ पार्टियां या गठबंधन और मुख्यमंत्री फिर से चुने जाने की उम्मीद कर सकते हैं, इसलिए वे ठोस काम करके भी दिखा रहे हैं। यह इसलिए भी जरूरी था, क्योंकि उत्तर-दक्षिण का भेद भारतीय राजनीति में आजादी के बाद से ही बड़ी भूमिका निभा रहा है।

दक्षिण भारत में सामाजिक सुधार के आंदोलन पहले हो गए थे, इसलिए वहां पिछड़े या दलितों में प्रभावशाली नेतृत्व भी था और आगे बढ़ने की ललक भी। इस वजह से उन राज्यों ने तेजी से तरक्की की। दक्षिण के राज्यों में इस तरह की शिकायतें भी होती रहीं कि उत्तर और दक्षिण में विकास का फर्क दक्षिणी राज्यों पर बोझ बन रहा है, हालांकि यह भी सच है कि दक्षिणी या पश्चिमी राज्यों के विकास में उत्तरी राज्यों के प्राकृतिक संसाधनों और सस्ते श्रम का बहुत बड़ा योगदान है। इन सभी उत्तरी राज्यों की विकास दर राष्ट्रीय विकास दर के आसपास है या आगे है। अगर ये राज्य देश के विकास के इंजन बनते हैं, तो भला इससे बेहतर क्या हो सकता है।

साभार: हिंदुस्तान