बिहार की नयी राह

बिहार में नीतीश कुमार की लहर चली है। उन्हें इस बार जीत पांच साल पहले के विधानसभा चुनाव और पिछले साल के लोकसभा चुनाव से भी बड़ी मिली है। पिछले साल भी उनके नेतृत्व वाले एनडीए को 171 विधानसभा सीटों पर बढ़त मिली थी। मगर अब आंकड़ा उसके पार चला गया है।

बेशक, विजेता के जयगान की परंपरा के तहत अब बिहार के चुनाव नतीजों को नीतीश कुमार और उनके गठबंधन के दावों के नजरिए से देखा जाएगा। और इसे विकास की जीत बताया जाएगा। जीत इतनी बड़ी है कि इस वक्त इस दावे को चुनौती देने की हिम्मत शायद ही कोई दिखा सके। लेकिन इस दावे को चुनौती दिए जाने की जरूरत है।

यह ठीक है कि लालू-राबड़ी राज के आखिरी पांच वर्षों में बिहार में जैसी अराजकता रही और विकास के साधारण पैमानों की जैसी अनदेखी की गई, उसकी तुलना में नीतीश कुमार के राज में हालत में सुधार हुआ। कानून-व्यवस्था की स्थिति में सुधार शायद उनकी सबसे बड़ी कामयाबी रही। इसके अलावा पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं को पचास फीसदी आरक्षण और लड़कियों को साइकिल बांटने जैसे प्रगतिशील कदमों ने भी उनकी लोकप्रियता बढ़ाई। मगर यह जीत सिर्फ ऐसे कदमों का नतीजा नहीं है।

इस जीत को दो दूसरी वजहों पर ध्यान देते हुए संभवतः कहीं बेहतर ढंग से समझा जा सकता है। उनमें पहली बात नीतीश कुमार का जातीय समीकरण बनाने में उस्ताद साबित होना है। पांच साल पहले वे मंडलवादी राजनीति की कामयाबी से उबल रहीं सवर्ण जातियों एवं लालू-राबड़ी के कुशासन से उकताए लोगों के समर्थन और फौरी स्वार्थ में गठबंधन की अनदेखी किये हुये लालू प्रसाद की राजनीतिक नासमझी के परिणास्वरूप सत्ता में आए। उन्हें इस बात का श्रेय दिया जाना चाहिए कि सत्ता में आकर वे किसी भ्रम का शिकार नहीं रहे और यह बात साफ-साफ समझ ली कि अगर सत्ता में टिकना है, तो लालू प्रसाद के सामाजिक आधार को तोड़ना होगा। उन्होंने अति-पिछड़ा, महा-दलित और पसमांदा मुसलमान के कार्ड खेल कर यह सियासी मकसद हासिल करने की कोशिश की। 2009 के लोकसभा और ताजा विधानसभा चुनाव के नतीजों से जाहिर हुआ है कि इसमें वे पूरी तरह सफल रहे हैं।

नीतीश कुमार की सफलता की दूसरी वजह लालू प्रसाद की राजनीति का बंद गली में पहुंच जाना है। आखिर लालू प्रसाद आज क्या उम्मीदें जगाते हैं? 1990 के दशक में वे पिछड़ों और दलितों की सामाजिक मुक्ति का प्रतीक थे। उनके मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बने रहने भर से बिहार के समाज में वह उथल-पुथल हुई, जिसने वहां की राजनीति की सूरत भी बदल दी। वह पिछड़ा उभार का दौर था। असल में लालू प्रसाद यादव से अगर बिहार की सवर्ण जातियां लगभग नफरत करती हैं, तो इसकी वजह यही है कि लालू ने उस परिघटना का नेतृत्व किया, जिसने उन जातियों को सियासत में अगर हाशिये पर नहीं, तो कम से कम केंद्र से बहुत दूर धकेल दिया। अगर लालू एक दूरदर्शी नेता होते, तो इतिहास ने तब उन्हें जो मौका दिया था, उसमें वे एक ऐतिहासिक शख्सियत बनकर उभर सकते थे। लेकिन कुछ तो व्यवस्था पर पकड़ रखने वाले समूहों द्वारा घेर लिए जाने और कुछ पारिवारिक एवं जातीय स्वार्थों से आगे न देख पाने की अपनी संकुचित दृष्टि की वजह से उन्होंने यह मौका गवां दिया। धीरे-धीरे उनकी राजनीति सिर्फ जातीय गोलबंदी के उद्देश्यों तक सीमित हो गई। इसका सबसे बेहतरीन उदाहरण महिला आरक्षण बिल पर उनका पुरजोर विरोध और जातीय जनगणना की मांग के पीछे अपनी पूरी ताकत झोंक देना है। इस तरह लालू प्रसाद प्रगतिशील एजेंडे से संकीर्ण सिसायत के दायरे में सिमट जाने वाले नेता की एक मिसाल बन गए। ऐसे नेता से बिहार के लोग क्या आशा करते? उन्होंने जिन रामविलास पासवान से गठबंधन बनाया, उनकी कहानी भी काफी कुछ लालू प्रसाद जैसी ही है। तो यह दो ऐसे नेताओं का मेल था, जिनके पास समाज को जो कुछ देने लायक था, वे दे चुके हैं और अब बस उसकी बची-खुची विरासत पर राजनीति में जिंदा रहना चाहते हैँ।

इसके बावजूद लालू प्रसाद यादव को यह श्रेय देना होगा कि उन्होंने धर्मनिरपेक्षता के मुद्दे पर कभी समझौता नहीं किया। यानी वे उस दौर में भी धर्मनिरपेक्ष खेमे में रहे, जब हवा का रुख हिंदुत्व की पक्ष में बहता दिख रहा था और वामपंथी मोर्चे से बाहर की तमाम गैर-कांग्रेस पार्टियां भाजपा की धुरी पर इकट्ठी होती जा रही थीं। लेकिन बदले राजनीतिक माहौल में यह भी गुजरे वक्त का ही एक पहलू है, जिसकी प्रासंगिकता कम से कम वोट की सियासत में घटती जा रही है।

जाहिर है, एक ऐसे विपक्ष के सामने मुकाबला आरंभ होने के पहले ही नीतीश कुमार एक मजबूत ताकत थे। फिर भी वे मुश्किल में पड़ सकते थे, अगर उनके अतिपिछड़ा-महादलित कार्ड से नाराज सवर्ण जातियां सचमुच उनके खिलाफ मतदान करने की हद तक चली जातीं, जैसाकि पिछले साल 18 विधानसभा सीटों के उपचुनाव के वक्त उन्होंने किया था। गौरतलब है कि तब नीतीश कुमार का गठबंधन आधी से ज्यादा सीटों पर हार गया था। लेकिन अब एक बार फिर लालू प्रसाद की छवि नीतीश कुमार की मददगार बनी। सवर्ण जातियों के लिए वो नीतीश कुमार आज भी लालू प्रसाद की तुलना में ज्यादा माफिक हैं, उन्होने डी बंदोपाध्याय कमेटी की रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में डालकर बटाईदारी कानून का मुद्दा फिर न उठाने का वादा कर दिया। गौरतलब है कि इस बार जनता दल (यू) के चुनाव घोषणापत्र में भुमि-सुधार का वह वादा कहीं दफना दिया गया है, जो 2005 में उसका हिस्सा था।

इसके बाद सवर्ण जातियों ने नीतीश कुमार के मुखौटे को गले लगाए रखने में ही अपना हित देखा। इस तरह नीतीश कुमार ने एक बेहद मुश्किल, परस्पर विरोधी हितों वाले सामाजिक समूहों का गठबंधन अपने नेतृत्व में बना लेने में सफलता पा ली है। यही उनकी कामयाबी का राज़ है। इस पर विकास का मुलम्मा चढ़ाना विकास की परिभाषा को संकुचित करना है। इसलिए कि नीतीश कुमार के समर्थन आधार का बहुत बड़ा हिस्सा राजनीतिक और सामाजिक रूप से यथास्थितिवादी-प्रतिक्रियावादी ताकतों का है। इस बात की पुष्टि उनके गठबंधन के भीतर इस बार भाजपा को मिली पहले से बेहतर कामयाबी से भी होती है। इसीलिए इसमें कोई हैरत की बात नहीं है कि नीतीश कुमार ने अब तक विकास के जिस एजेंडे को आगे बढ़ाया है, वह मोटे तौर पर उन यथास्थितिवादी-प्रतिक्रियावादी शक्तियों के हितों और सोच के मुताबिक है। आगे भी ऐसा ही करने वाले हैं। विकास का उनके सामने सबसे प्रगतिशील एजेंडा बंदोपाध्याय कमेटी की रिपोर्ट पर अमल होता, जिससे वे मुकर गए हैँ। इसलिए उनकी जीत पर उन्हें बधाई दीजिए, लेकिन मेहरबानी कीजिए, कृपया इसे विकास और सुशासन की जीत मत बताइए।

- सत्येंद्र रंजन