नानी पालकीवाला पुण्यतिथि विशेष

बहस एक ऐसा उपकरण है जो लोकतंत्र में बुनियादी अधिकारों को सुरक्षित रखने में मददगार साबित होता है। ऐसे ही कई अहम बहसों के माध्यम से लोकतांत्रिक और संवैधानिक अधिकारों को सुरक्षित करने वाले शख्स थे नानी पालकीवाला। नागरिकों के अधिकारों को अक्षुण्ण बनाने के लिए की पालकीवाला द्वारा की गई बहसों से सुप्रीम कोर्ट से लेकर संसद परिसर तक गुंजायमान रहते थे। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने जब आपातकाल लागू किया तो नानी पालकीवाला ने इसका पुरजोर विरोध किया। उनका यह योगदान हमेशा याद रखा जाएगा। आज इस मशहूर वकील, कर और आर्थिक मामलों के जानकार उदारवादी विचारक नानी पालकीवाला की पुण्यतिथि है। आइए नानी पालकीवाला के जीवन व कार्यों पर एक सरसरी निगाह डालते हैं..

नानी पालकीवाला के पूर्वज पालकी बनाने और उनकी मरम्मत करने का काम करते थे। यह काम ही उनकी पहचान बन गई और पालकीवाला उनका सरनेम बन गया। अपनी बहसों और दलीलों के माध्यम से राजनैतिक और संवैधानिक हलकों में तहलका मचाकर रखने वाले नानी पालकीवाला बचपन में हकलाकर बोलते थे। लेकिन उन्होंने ने अपनी इस कमी को कभी भी सफलता के आड़े नहीं आने दिया। उन्होंने अथक प्रयासों के द्वारा इस खामी को दूर करने में सफलता पाई। नानी ने बंबई के सेंट ज़ेवियर कॉलेज से इंग्लिश में एमए किया। उनकी इच्छा बंबई यूनिवर्सिटी में लेक्चरर बनने की थी। लेकिन उनकी जगह एक पारसी युवती का चयन हो गया। कोई और वेकेंसी न होने के कारण उन्होंने कानून की पढ़ाई करने के लिए कॉलेज में दाखिला ले लिया। उनका यह फैसला उनके कैरियर के लिए मील का पत्थर साबित हुआ। नानी की पहचान देश के विख्यात वकील के तौर पर बन गई।

लॉ पढने के बाद नानी पालकीवाला 1944 में मुंबई की मशहूर लॉ फ़र्म जमशेद जी कंगा के साथ जुड़ गए. बतौर असिस्टेंट उनका पहला केस ‘नुसरवान जी बलसारा बनाम स्टेट ऑफ़ बॉम्बे’ था जिसमें बॉम्बे शराबबंदी कानून को चुनौती दी गयी। 1950-51 तक वे अपने केस की पैरवी खुद करने लगे थे।

1954 में नानी पालकीवाला ने एंग्लो-इंडियन स्कूल बनाम महाराष्ट्र सरकार केस में पैरवी की थी। अदालत में जिरह के दौरान उन्होंने संविधान की धारा 29 (2) और 30 का हवाला दिया जिनके तहत अल्पसंख्यकों के सांस्कृतिक अधिकारों की रक्षा का प्रावधान है। हाई कोर्ट से सरकार के ख़िलाफ़ आदेश पारित करवाकर नानी जीत गए। राज्य सरकार इस मसले को सुप्रीम कोर्ट ले गयी, लेकिन नानी वहां भी जीत गए। कुछ ही सालों में वे इतने मशहूर हो गए उनकी दलील और पैरवी सुनने के लिए कोर्ट रुम में भीड़ जमा हो जाती थी।

नानी खुद को बंबई यूनिवर्सिटी की उस पारसी महिला लेक्चरर के ताउम्र एहसान मंद मानते रहे। वह उस महिला का शुक्रिया अदा करने के लिए हमेशा डिनर पर बाहर ले जाते रहे। उनका मानना था कि यदि वह न होती और लेक्चरर के पद पर यदि उस दिन नानी का चयन हो गया होता तो उन्हें वह पहचान नहीं मिल पाती जो उन्होंने बाद में हासिल की।

टैक्स और कॉर्पोरेट मामलों में नानी पालकीवाला को महारत हासिल थी पर वे जनता की आवाज़ बने। 1970 में उन्होंने ‘आरसी कूपर बनाम केंद्र सरकार’ नाम का एक अहम केस लड़ा था। इसमें इंदिरा गांधी सरकार द्वारा बैंकों के राष्ट्रीयकरण को चुनौती दी गई थी। नानी पालकीवाला ने इंदिरा सरकार द्वारा पारित बिल के ख़िलाफ़ पैरवी कर जीत पाई। बाद में, सरकार ने संविधान में संशोधन कर बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया।

नानी पालकीवाला ने राजाओं और नवाबों से जुड़ा प्रिवी पर्स (पूर्व राजाओं और नवाबों को सरकार से मिलने वाले भत्ते) का मामला भी लड़ा था। यह मामला भी सुप्रीम कोर्ट में गया था जिसने सरकार को प्रिवी पर्स बंद न करने का आदेश दिया। इंदिरा सरकार ने फिर संविधान संशोधन करके प्रिवी पर्स की सहूलियत बंद कर दी।

नानी पालकीवाला के लिए ‘केशवानंद भारती बनाम केरल सरकार’ का मामला जीवन का सबसे महान केस साबित हुआ। इस केस को उनका ही नहीं, इसे भारतीय संविधान की आत्मा को अक्षुण रखने वाला सबसे महान मामला कहा जाता है।

नानी पालकीवाला कर यानी टैक्सेशन और कॉर्पोरेट मामलों के माहिर थे और अर्थ-शास्त्र का ज्ञान उन्होंने अपने अनुभवों के आधार पर हासिल किया था। केंद्रीय बजट पर उनका भाषण सुनने के लिए लोग इतने आतुर रहते थे कि इसके लिए मुंबई में स्टेडियम बुक किए जाते थे। कहा जाता था कि बजट पर दो ही भाषण सुने जाने चाहिए। एक वित्त मंत्री का बजट पेश करते हुए और दूसरा नानी पालकीवाला का उसकी व्याख्या करते हुए। कहा जाता है कि बजट पेश करने के बाद स्वयं वित्तमंत्री भी अपने बजट की समीक्षा सुनने के लिए नानी के व्याख्यान का इंतजार करते थे।
1970 के दशक में तत्कालीन कानून मंत्री पी गोविंद मेनन ने नानी को अटॉर्नी जनरल बनने की पेशकश की थी। थोड़ी ना-नुकर के बाद नानी ने हामी भर दी। लेकिन अगले ही दिन उन्होंने सरकार का प्रस्ताव ठुकरा दिया। कुछ इसी तरह जब उन्हें सुप्रीम कोर्ट का जज बनने का ऑफर आया तो उन्होंने तब भी विनम्रता से इसे अस्वीकार कर दिया। 11 दिसंबर 2002 को नानी पालकीवाला का स्वर्गवास हो गया।

- आजादी.मी